सिक्ख मिसलों का संक्षिप्त वर्णन

19 जून, 1716 ई० को बन्दा बहादुर की मृत्यु के पश्चात् पंजाब में सिक्खों के संपीड़न का युग आरम्भ हुआ।

1716 ई० से लेकर 1747 ई० तक मुगल सम्राटों की ओर से नियुक्त किये गये पंजाब के सूबेदार अब्दुस्समद खां, जकारिया खां तथा याहिया खां ने हजारों सिक्खों को इस्लाम धर्म को अस्वीकार करने के कारण मौत के घाट उतार दिया।

परन्तु सिक्ख लोग इन अत्याचारों को असाधारण साहस तथा उत्साह से सहन करते गये।

1747 ई० में इनके सौभाग्य से अफगानिस्तान के शासक अहमदशाह अब्दाली ने पंजाब पर आक्रमण करने आरम्भ कर दिये।

1769 ई० तक उसने इस प्रान्त पर कुल दस आक्रमण किये। पहले पांच आक्रमणों के फलस्वरूप उसने इस प्रदेश में मुगलों और मराठों की शक्ति को कुचल डाला।

पिछले पांच आक्रमण उसने सिक्खों के विरुद्ध किये, परन्तु घोर प्रयत्न करने पर भी वह इनकी शक्ति का दमन करने में असफल रहा।

इसका परिणाम यह हुआ कि पंजाब के विभिन्न भागों में सिक्ख जत्थों ने अपने राज्य स्थापित कर लिये।

सिक्ख मिसलों का संक्षिप्त वर्णन

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सिक्ख मिसलों का संक्षिप्त वर्णन

इस प्रकार बारह सिक्ख मिसलों की उत्पत्ति हुई। मिसल अरबी शब्द है जिसका भावार्थ दल होता है।

प्रत्येक दल का एक सरदार होता था। इन मिसलों की संगठित बैठक का नाम गुरमता (गुरुमन्त्रणा) था।

गुरमता में मिसलों के सरदार बैठते थे। गुरमता में निश्चय हुए प्रस्तावों को मानने के लिए वे बाध्य थे।

सिक्खों की इन 12 मिसलों में 10 मिसलें जाटों द्वारा संस्थापित हुई थीं और उनमें शामिल होकर युद्ध करने वालों में अधिकतर संख्या जाटों की ही थी।

दो मिसलों के संस्थापक खत्री सरदार थे, परन्तु उनके जत्थों में अधिक संख्या जाटों की थी।

इन मिसलों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है –

 

  1. भंगी मिसल – इस मिसल के मनुष्य भंग का अधिक व्यवहार करते थे इसलिए ही उन्हें भंगड़ी अथवा भंगी नाम से पुकारा जाने लगा।

सन् 1716 ई० में चौ० छज्जासिंह ढ़िल्लों गोत्र के जाटवीर ने इस मिसल की स्थापना की थी।

इसके पुत्र हरिसिंह के समय में इस मिसल की संख्या 12,000 से बढ़कर 20,000 हो गई थी।

उसने इन सैनिकों का नेतृत्व करके गुजरात, झंग, मुलतान, सियालकोट, कसूर, डेरा गाजीखान आदि को जीतकर सूबा लाहौर के तीन-चौथाई भाग से मुग़लों का शासन पूर्ण रूप से समाप्त करके यहां अपना अधिकार जमा लिया।

सरदार हरिसिंह ने अमृतसर में राजधानी स्थिर करके वहां एक विशाल किला बनवाया।

 

इसने जम्मू पर चढ़ाई की थी और दूर-दूर तक काफी लूटमार की। इस सरदार ने कन्हिया और रामगढ़िया मिसलों को साथ लेकर लाहौर पर अधिकार कर लिया था जो कि अब्दाली ने इनसे छीन लिया।

अब्दाली के भारत से चले जाने पर फिर इस मिसल ने लाहौर पर अधिकार कर लिया। इसने पटियाला के सरदार आल्हासिंह पर भी आक्रमण कर दिया, जिस युद्ध में सरदार हरिसिंह मारा गया।

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इसके पुत्र झण्डासिंह और गण्डासिंह भी बड़े वीर योद्धा थे। अब झण्डासिंह इस मिसल का सरदार बना।

उसने 1766 से 1772 तक अनेक युद्ध किये और कई स्थानों पर विजय प्राप्त की। इस वीर सरदार ने रामनगर पर आक्रमण करके अहमदशाह अब्दाली की सेना से दमदमा नामक तोप छीन ली जो कि बाद में ‘भंगी तोप’ के नाम से प्रसिद्ध हुई।

सरदार झण्डासिंह ने जम्मू के राजा रणजीतसिंह डोगरा पर आक्रमण किया। झण्डासिंह जम्मू के दूसरे युद्ध में स्वर्गीय हुआ।

इसका भाई गण्डासिंह कन्हिया मिसल मिसल के साथ पवनकोट में लड़ता हुआ मारा गया।

इसके पश्चात् चड़तसिंह, देशूसिंह, करमसिंह आदि सरदार एक के बाद दूसरा नेता बने जो कि सुकरचकिया मिसल के सरदार महासिंह द्वारा मारे गये।

सन् 1799 ई० में महाराजा रणजीतसिंह ने इस मिसल से लाहौर छीन लिया और फिर उसने अमृतसर पर अधिकार कर लिया।

सिक्ख मिसलों का संक्षिप्त वर्णन

सिक्ख मिसलों का संक्षिप्त वर्णनसिक्ख मिसलों का संक्षिप्त वर्णन

  1. कन्हिया मिसल – लाहौर के कान्हा गांव के सिन्धुवंशी जाट चौ० खुशालसिंह के पुत्र सरदार जयसिंह ने अपने गांव कान्हा के नाम पर इस मिसल का प्रारम्भ किया था।

कांगड़े के राजा सरदारचन्द ने, नवाब शेफ अली खां किलेदार के विरुद्ध सरदार जयसिंह को अपनी सहायता के लिये बुलाया।

जयसिंह ने किले पर अधिकार कर लिया और राजा संसारचन्द्र को भी धमका दिया। जम्मू के इस आक्रमण में रणजीतसिंह व उसके पिता स० महासिंह ने जयसिंह की सहायता की थी।

जम्मू के लूट के माल पर इनकी अनबन हो गई और इनका युद्ध छिड़ गया। जयसिंह ने हार से बचने के लिए बुद्धिमानी से काम लिया।

उसने अपनी पोती का विवाह रणजीतसिंह से करके उनके पिता महासिंह को अपना सम्बन्धी बना लिया।

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थोड़े दिन बाद अपने पुत्र गुरबक्ससिंह की मृत्यु के शोक में जयसिंह की मृत्यु हो गई। इसके बाद गुरबक्ससिंह की पत्नी सदाकौर राज्य की मालिक हुई।

रानी सदाकौर बड़ी निपुण और योग्य शासक थी। वह अनेक युद्धों में भी शामिल हुई थी।

स० महासिंह के मरने पर इस रानी ने दोनों ही राज्यों का काम संभाला था। वह रणजीतसिंह की बड़ी देख-रेख रखती थी।

इस रानी का राज्य अमृतसर से उत्तर की ओर पहाड़ी प्रदेश में था। उसमें कांगड़ा, कलानौर, नूरपुर, पठानकोट, कोरहा, हाजीपुर, दीनानगर, यकरियान, अटलगढ़ आदि प्रसिद्ध नगर थे।

जवान होने पर महाराजा रणजीतसिंह ने अपनी सास रानी सदाकौर से उसका राज्य छीन लिया।

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  1. नकिया मिसल – इस मिसल की स्थापना सिन्धुवं शी जाट चौधरी हेमराज के पुत्र हीरासिंह ने की थी।

जब उसने 1750 ई० में नक्का नामक प्रदेश पर अधिकार कर लिया तब यह मिसल नकिया नाम से प्रसिद्ध हुई।

सरदार हीरासिंह ने 8000 सवारों का सैन्य दल लेकर भड़वाल, चूनिया, दयालपुर, कानपुर, जेठपुर, खण्डिया, शेरगढ़, मुस्तफाबाद, देवसाल, फिरोजाबाद, मन्द्रा, मागठ आदि प्रदेशों पर अधिकार कर लिया था।

उस समय पाकपट्टन में शेख सुजान कुर्रेशी का अधिकार था। वहां गोवध खूब होता था। इसको बन्द करने के लिए हीरासिंह ने शेख पर चढ़ाई कर दी।

इस युद्ध में वह वीरगति को प्राप्त हुआ। इसके बाद नाहरसिंह, वजीरसिंह, भगवानसिंह और ज्ञानसिंह राज के मालिक बने।

ज्ञानसिंह के मरने पर महाराजा रणजीतसिंह ने इस राज्य पर अधिकार कर लिया।

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  1. करोड़ियानया/ करोड़सिंहया मिसल – इस मिसल का संस्थापक पंचगढ़ का रहने वाला जाट सरदार करोड़सिंह था।

उसने 12,000 सैनिकों को लेकर नादिरशाह को लूटा और मुगलों से 10 लाख रुपये आय के प्रदेश को छीन लिया।

जालन्धर के चारों ओर का प्रदेश इस मिसल के अधीन हो गया। अहमदशाह अब्दाली का जब पटियाला में सिक्खों से युद्ध हुआ, तब करोड़सिंह ने अब्दाली के कोष को लूटा।

इसका उत्तराधिकारी सरदार बघेलसिंह धारीवाल गोत्री जाट बना। इसने 30,000 सवार सैनिकों को साथ लेकर सन् 1768 ई० में सीमा प्रान्त की ओर आक्रमण करके मुगल, पठानों की सत्ता समाप्त की |

उसके बाद मेरठ, खुर्जा, अलीगढ़, बिजनौर, बुलन्दशहर, मुरादाबाद, चन्दौसी, हाथरस, इटावा, फर्रूखाबाद आदि नगरों पर आक्रमण करके लूट में बहुत सा धन प्राप्त किया।

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सन् 1781 ई० में सरदार बघेलसिंह ने 70,000 सेना के साथ दिल्ली पर आक्रमण करके वहां खूब लूटमार की।

उसने दिल्ली में मुस्लिम वध का आदेश दिया और किले पर अधिकार कर लिया। परन्तु आपसी कलह के कारण, किले को लूटकर बाहर निकल गए।

बेगम समरू की बघेलसिंह ने प्राण-रक्षा की थी, इस कारण उस बेगम ने शाह आलम से कहकर सिक्खों को तीन लाख रुपया और दिल्ली में गुरु तेगबहादुर का गुरुद्वारा बनाने की आज्ञा दिलवा दी।

सन्धि के अनुसार सरदार बघेलसिंह कोतवाली के प्रबन्ध और चुंगीकार ग्रहण करने के लिए अपने सैनिकों के साथ दिल्ली में ही रहे।

उसने तेलीवाड़े देहली में माता सुन्दरी और साहबदेवी (धर्मपत्नी गुरुगोविन्दसिंह जी) की स्मृति में और गुरु तेगबहादुर की शवभूमि रकाबगंज में गुरुद्वारे बनवाए।

इस सरदार ने शीशगंज गुरुद्वारे की नींव का चबूतरा भी बनवा दिया। कुछ समय बाद बादशाही खिलअत प्राप्त करेके पंजाब में लौट गया।

इस वीर योद्धा का सन् 1801 ई० में स्वर्गवास हो गया। महाराजा रणजीतसिंह ने इनके प्रदेश को अपने साम्राज्य में मिला लिया।

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  1. शहीद या शहीदान मिसल – इस मिसल का गठन बन्दा बैरागी के समय सरदार शहदीपसिंह सिंघु गोत्री जाट ने किया।

वह 1762 ई० में अपनी सेना की सरदारी करते हुए अब्दाली के साथ अमृतसर युद्ध में शहीद हो गया।

इसके बाद लाहौर के चौ० वीरसिंह सिन्धु जाट के पुत्र करमसिंह को इस मिसल का प्रमुख बनाया गया।

उसने अपनी सेना के साथ सुदूर सीमाप्रान्त (पाकिस्तान) के जलालाबाद, लुहारी, सहारनपुर जिले के रणखण्डी और बडवाजमी का बड़ा प्रदेश भी 30 वर्ष तक अपने अधिकार में रखा। इस मिसल का प्रदेश सीधा ब्रिटिश सरकार को गया।

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  1. फैजुल्लापुरी या सिंहपुरिया मिसल – चौ० कपूरसिंह वरिकवंशी (विर्क) जाट सरदार ने इस मिसल की स्थापना की थी।

सर्वप्रथम फैजुल्लापुर पर ही इस दल ने अधिकार किया था। इस कारण इस नाम पर ही ये प्रसिद्ध हुए।

संवत् 1790 (1733 ई०) में दिल्ली के शाह की ओर से सरदार कपूरसिंह को एक लाख की जागीर और ‘नवाब’ की पदवी मिली।

इस वीर ने अपनी तलवार से 500 मुसलमानों का वध किया था। उसके धर्मोपदेश के कारण अगणित जाटों ने सिक्ख धर्म अपनाया।

इसी की प्रेरणा से पटियाला राज्य के संस्थापक सिद्धू जाटवीर योद्धा आल्हासिंह ने सिक्खधर्म ग्रहण किया था।

तीन हजार सवार नवाब कपूरसिंह की आज्ञा पर धर्म पर बलिदान होने के लिए प्रत्येक समय तैयार रहते थे।

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इन जाट वीरों ने भी दिल्ली तक छापे मारकर काफी लूट मचाई। इस मिसल ने मुसलमानों से जालन्धर का बहुत सा प्रदेश जीत लिया।

सरदार कपूरसिंह ने मरते समय अपना उत्तराधिकार स० जस्सासिंह अहलूवालिया को ही दे दिया।

इस प्रकार यह मिसल जाटों के अधिकार से कलालों के अधिकार में चली गई। कपूरसिंह ने जिस कपूरथला राज्य की स्थापना की थी |

उस पर भी सरदार जस्सासिंह अहलूवालिया के वंशधरों की ही परम्परा चलती रही थी।

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