आरक्षण जाटों का संवैधानिक अधिकार है, खैरात नहीं

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सबसे पहले मजदूर या दलित जातियों को संविधान बनते ही आरक्षण का लाभ दिया गया जो 10 सालों के बाद रिव्यू होना था |

जो आज तक राजनीतिक स्वार्थों के कारण नहीं हो पाया और न ही भविष्य में होने की कोई आशा है ।

पहला पिछड़ापन आयोग सन् 1953 में पं० काका केलकर की अध्यक्षता में बनाया गया जिसने आरक्षण का आधार आर्थिक बनाने का प्रयास किया |

जिस कारण इस आयोग की रिपोर्ट गैर संवैधानिक समझी गई क्योंकि संविधान की धारा 340 के तहत आरक्षण के लिए केवल निम्नलिखित दो ही शर्तें हैं –

  1.  शैक्षणिक पिछड़ापन  (Educational Backwardness),
  2.  सामाजिक पिछड़ापन (Social Backwardness).

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दूसरा पिछड़ा आयोग सन् 1978 बी.पी. मण्डल की अध्यक्षता में बैठा गया जिसने अपनी रिपोर्ट 31 दिसम्बर 1980 को दी ।

यह रिपोर्ट लगभग 10 वर्ष तक धूल चाटने के बाद 13 अगस्त 1990 को राजनैतिक कारणों से ही लागू हुई न कि समाज के उत्थान के लिए लागू की गई ।

इस रिपोर्ट में जाटों को बार-बार पिछड़ा लिखा गया, यहां तक कि इस रिपोर्ट के चैप्टर नं० 8 के पहरा नं० 8.40 तथा 8.41 में जाट जाति को तथा चौ० चरणसिंह  को पिछड़ी जाति से बतलाया गया |

इसके बाद  जब आयोग ने राज्यवार पिछड़ी जातियों की अपनी रिपोर्ट तैयार की तो पंजाब और हरियाणा की सूचियों में ‘गुटका जाट’ और ‘चिल्लन जाट’ दर्शाया गया । जबकि समस्त भारत में न तो ऐसी कोई जाति है और न ही जाटों का गोत्र

इसके अतिरिक्त किसी भी राज्य के जाट के बारे में कोई उल्लेख नहीं किया गया । जबकि समस्त भारत का जाट मंडल कमीशन की रिपोर्ट तथा संविधान की शर्तों के अनुसार पिछड़ी जाति में गिना जाना चाहिए था ।

क्योंकि संविधान की पहली शर्त शैक्षणिक पिछड़ापन के बारे में स्वयं मण्डल कमीशन की रिपोर्ट के पेज नं. 28 पर यह प्रमाणित किया गया है कि गांव में रहने वाली सभी जातियां शैक्षणिक तौर पर पिछड़ी हैं ।

यह सर्वविदित है कि आज भी जाट समुदाय का 90 प्रतिशत हिस्सा गांव में ही रहता है और यह समुदाय पूरे उत्तर भारत में गांव में रहने वाला सबसे बड़ा समुदाय है ।

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सामाजिक पिछड़ेपन को मापने के लिए केवल एक ही मापदण्ड है जिसे हम सामाजिक तौर पर हुक्का-पानी कहते हैं ।

जो जातियां आपस में एक दूसरे का हुक्का-पानी बगैर किसी हिचक और भेदभाव के पीते हैं उनका आपसी सामाजिक स्तर बराबर का माना जाता है ।

आज भी जाट समाज की हुक्के-पानी की समानता और सम्बन्ध केवल उन जातियों के साथ है जिनको मण्डल कमीशन ने पिछड़ी जाति मानकर आरक्षण दिया हुआ है ।

उदाहरण के लिए अहीर, गूजर, सैनी, कुम्हार, लुहार, खाती, कम्बोज, नाई आदि यहां तक कि सुनार जाति जो अपना सामाजिक स्तर जाटों से ऊंचा मानती आई, उसको भी आरक्षण दिया हुआ है ।

भारतवर्ष की ऊंच जातियां ब्राह्मण, बनिया, खत्री, अरोड़ा, सिन्धी, कायस्थ, राजपूत और सुनार अपना सामाजिक स्तर जाटों से ऊंचा मानती आई इसी कारण इन्होंने लाहौर हाईकोर्ट से सन् 1932 में जाट जाति को शूद्र घोषित करवाया ।

मण्डल आयोग ने सभी किसान जातियों को पूरे भारत में समान रूप से आरक्षण दिया, जबकि जाट कौम के साथ यह अन्याय हुआ, तो अलग-अलग राज्य के जाटों ने आरक्षण के लिए अपना संघर्ष आरम्भ किया |

जिसमें राजस्थान के जाट को भरतपुर और धौलपुर जिलों को छोड़कर सन् 1999 में केन्द्र व राज्य स्तर पर दोनों जगह आरक्षण दिया गया जबकि उन्हें 1990 में मिलना चाहिए था । इनके 9 साल के नुकसान का कोई आंकलन नहीं है ।

अभी हाल में ही भरतपुर और धौलपुर के जाटों को आरक्षण दिया गया है जो 1990 से आज तक 27 साल के नुकसान का कोई हिसाब नहीं दिया गया है, जो भेदभाव यहाँ के जाट ने भुगता |

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इसके अतिरिक्त मध्य प्रदेश, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, बिहार और आन्ध्र प्रदेश के जाटों को अलग-अलग समय में राज्य स्तर पर आरक्षण दिया गया लेकिन इनको केन्द्र स्तर पर आरक्षण नहीं है ।

पंजाब के जाट को आरक्षण की कभी बात नहीं की गई लेकिन हरयाणा के जाट को भारत में सबसे पहले गुरनाम सिंह आयोग की रिपोर्ट के तहत 7 फरवरी 1991 को आरक्षण लागू किया ।

इस रिपोर्ट की पेज नं० 28 पर बड़ा साफ-साफ लिखा है कि जाट समुदाय की आर्थिक स्थिति अहीर और सैनी समुदाय से काफी बदतर है ।

आयोग ने यह भी लिखा है कि जाट समुदाय को किसी धर्म या पंथ के नाम से नहीं बांटा जा सकता है ।

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हरयाणा के जाट को हरयाणा सरकार के नोटिफिकेशन क्रमांक डब्ल्यू एम.सी.बी.सी., डी-एच आर 299-एस डब्ल्यू(1) 91 दिनांक 07-02-1991 के तहत पूरे भारतवर्ष में जाटों को सबसे पहले आरक्षण दिया गया |

लेकिन मई 1991 में भजनलाल सरकार आने पर एक षड्यन्त्र के तहत करनाल ब्राह्मण सभा की तरफ से राजकुमार गौतम (पूर्व विधायक नारनौंद) तथा भारत भूषण शर्मा ने जाटों का आरक्षण समाप्त कराने के लिए भारत के सर्वोच्च न्यायालय में एक नहीं 3 याचिकाएं 326/91, 360/91, 51/92 लगाईं ।

जब सर्वोच्च न्यायालय ने हरयाणा सरकार को नोटिस दिया तो इसी के उत्तर में हरयाणा सरकार ने हल्फनामा दायर किया जिसमें लिखा कि उसने आयोग की रिपोर्ट को स्थगित कर दिया है और इसे भविष्य में लागू नहीं करेगी ।

इसी आधार पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश दिनांक 07-02-1994 को इस आयोग की रिपोर्ट को हमेशा के लिए दफन कर दिया और जाट जाति के साथ-साथ पांच अन्य जातियों को भी उनके संवैधानिक अधिकार से वंचित कर दिया।

करनाल ब्राह्मण सभा ने इस पुरानी कहावत को फिर दोबारा से प्रमाणित कर दिया कि बुरा ब्राह्मण से हो। वरना जाटों के आरक्षण से ब्राह्मण जाति को किसी प्रकार का कोई नुकसान नहीं था ।

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इसके अतिरिक्त आज तक यह दुष्प्रचार होता रहा है कि हरयाणा सरकार में जाट समाज के अधिकारी अधिक हैं जबकि आयोग की रिपोर्ट के पेज नं० 71 में जातिवार अधिकारियों की संख्या में (राजपत्रित प्रथम व द्वितीय)

साफ लिखा है कि जाट मात्र 11.9 प्रतिशत अधिकारी हैं जबकि ब्राह्मण हरयाणा में 7 प्रतिशत जनसंख्या होते हुए भी 12.21 प्रतिशत अधिकारी हैं ।

अरोड़ा खत्रियों की जनसंख्या हरियाणा में 8 प्रतिशत है जबकि अधिकारी 36.94 प्रतिशत हैं और इसी प्रकार अग्रवाल बनियों की जनसंख्या मात्रा 5 प्रतिशत है जबकि उनके अधिकारी 15.33 प्रतिशत हैं । यह झूठा प्रचार भी हरियाणा में मनुवादियों ने चला रखा है ताकि जाट समुदाय भ्रमित रहे ।

कुछ राजनैतिक नेता लोगों को भ्रमित करते रहते हैं कि आरक्षण आर्थिक आधार पर होना चाहिए । उनको ज्ञात होना चाहिए कि आर्थिक आधार गैर संवैधानिक है |

इसलिए भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने क्रिमिलेयर का प्रावधान शुरू किया जिसमें पिछड़ी जातियों के आरक्षण का लाभ वही उठा सकता है जिसकी सालाना आय साढ़े 4 लाख से कम हो ।

बड़ी हैरानी की बात है कि हरियाणा के बड़े राजनेता (जाट समाज के) तो यह भी नहीं जानते कि आरक्षित जातियों के सदस्य मैरिट में आने पर सामान्य वर्ग में गिने जाते हैं ।

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जाट कौम 13 साल से इस अधिकार की मांग गांधीवादी तरीके से कर रही है । अभी परीक्षा की घड़ी आ गई है कि भारत सरकार यदि अहिंसा में विश्वास करती है तो जाटों को यह संवैधानिक अधिकार तुरन्त दे दिया जाए | जब जाटों ने अंग्रेजों के समय महारानी की सत्ता को स्वीकार नहीं किया तो अब कैसे करेंगे?

जब देखा गया कि सम्पूर्ण भारत के जाटों के साथ सरासर अन्याय और सरकारी षड्यन्त्र हो रहा है जिसमें जाट कौम को आरक्षण के अपने संवैधानिक अधिकार से वंचित रखकर जाटों को तरह-तरह से मीडिया के द्वारा बदनाम किया जा रहा है |

जब तक भारत के सम्पूर्ण जाट समाज चाहे वे किसी धर्म या पंथ को मानने वाले हों, उनको संवैधानिक अधिकार नहीं मिल जाता है कौम अपना संघर्ष जारी रखेगी । क्योंकि आरक्षण जाटों का संवैधानिक अधिकार है कोई खैरात नहीं ।

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हवासिंह सांगवान - एक बेहतरीन जाट लेखक   

हवासिंह सांगवान – एक बेहतरीन जाट लेखक 

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Randhir Deswal

Hi, I am Randhir Singh a Solo Travel Blogger form Rohtak Haryana. I am a writer of Lyrics and Quotes.

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