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Sindhu Jat Gotra | सन्धु जाट गोत्र हिस्ट्री

संधू – Sindhu Jat Gotra – सिन्धु जाट गोत्र हिस्ट्री

Sindhu Jat Gotra  यह जाटों का प्रसिद्ध, गौरवशाली और प्राचीनकाल से प्रचलित गोत्र है। इस वंश का शासन सिन्धु देश पर था। रामायण में भी इनका वर्णन है।

सुग्रीव ने सीता जी की खोज के लिए वानरसेना को अपने श्वशुर ‘सुषेण’ के नेतृत्व में पश्चिम दिशा को भेजा और सिन्धु देश में जाने का भी आदेश दिया (वा० रा० किष्किन्धा काण्ड, 42वां सर्ग)।

सिन्ध मजम्मल-उल-तवारीख वाक़ातए पंज हजारी साला में लिखा है कि दुर्योधन से 5000 वर्ष पहले सिन्ध देश पर मेद जाटों का राज्य उन्नति के पथ पर था।

जाट इतिहास अंग्रेजी अनुवाद पृ० 6 लेखक रामसरूप जून ने इसी लेख के आधार पर यही लिखा है। परन्तु वैदिक काल से ही इस देश पर जाटों का राज्य रहा है।

द्वापर में सिन्धु नामक विशाल जनपद था जिस पर इसी नाम का वैभवशाली सिन्धु राजवंश राज्य करता था। इस वंश के अधीन दस राष्ट्र थे। “सिन्धु राष्ट्रमुखानीह दश राष्ट्राणि यानीह” (कर्ण पर्व 2-23)।

उस समय जयद्रथ नामक राजा इस प्रदेश पर कठोरतापूर्वक शासन करता था। महाभारत “सिन्धु-सौवीरभर्तारं दर्पपूर्णं मनस्विनम्” (सभपर्व 22-9),

“पतिः सौवीरसिन्धूनां दुष्टभावो जयद्रथः” (वनपर्व 268-8), “जयद्रथो नाम यदि श्रुतस्ते सौवीरराजः सुभग स एव” (वनपर्व 266-12) आदि स्थलों पर जयद्रथ को सिन्धु सौवीर आदि जनपदों का नरेश लिखा है।

कई ऐतिहासिकों ने उपरोक्त दस राष्ट्रों की कल्पना करते हुए शिवि, वसाति, काकुस्थ, सौवीर,2 (चारों जाटवंश) आदि वंशों को भी सिन्धु राज्य के अन्तर्गत होना माना है।

इस विशाल सिन्धु राज्य का प्रबन्ध राजसभा, न्यायसभा और धर्मसभा के अधीन था। इसी कारण जयद्रथ अपने समय का उत्कृष्ट प्रबन्धक था।

इसी योग्यता से प्रभावित होकर राजा दुर्योधन ने अपनी बहिन दुःशला का विवाह जयद्रथ से करके सिन्धुओं को अपना मित्र बना लिया था।

संधू या Sindhu Jat Gotra – सिन्धु जाट गोत्र हिस्ट्री

युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के अवसर पर सिन्धु नरेश ने सुवर्णमालाओं से अलंकृत पच्चीस हजार सिन्धुदेशीय घोड़े उपहार में दिये थे। (सभापर्व, 51वां अध्याय)।

महाभारत युद्ध में एक अक्षौहिणी सेना लेकर जयद्रथ दुर्योधन की ओर से लड़ा था। यह सबको विदित है कि अर्जुन ने सूर्यास्त होते-होते जयद्रथ का वध कर दिया था।

सिन्धु राज्य की ध्वजा वराह (सूअर) चिह्न वाली थी (द्रोणपर्व 43-3)। यही ध्वजा प्रायः पश्चिम के सभी आर्य जनपदों की मानी गई। जयद्रथ के मरने के बाद उसका पुत्र सुरथ सिंधु देश का राजा हुआ।

महाभारत युद्ध के पश्चात् सम्राट् युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ किया। उस अवसर पर अर्जुन सिन्धु देश में पहुंचा। अर्जुन के वहां पहुंचने की सूचना सुनकर ही सिन्धुराज सुरथ की हृदय गति के रुक जाने से मृत्यु हो गई।

अश्वमेध यज्ञ की स्मृति (यादगार) में अर्जुन ने मोहन (कृष्ण) और युधरो (युधिष्ठिर) के नाम पर मोहनजोदारो-मोहनजोदड़ो नामक नगर बसाया। (जाटों का उत्कर्ष पृ० 296, लेखक योगेन्द्रपाल

  1. अनटिक्विटी ऑफ जाट रेस पृ० 6 पर लेखक उजागरसिंह माहिल ने ठोस प्रमाणों द्वारा सिद्ध किया है कि ‘मेद’ शब्द गलत है, इसके स्थान पर मांडा (गोत्र) जाट समझो।
  2. जाट्स दी एन्शनट् रूलर्ज में बी० एस० दहिया ने पृ० 20 पर सौवीर को सोहल सिद्ध करके सोहल जाट गोत्र लिखा है।
  3. जाट इतिहास पृ० 693, लेखक ठाकुर देशराज ने लिखा है कि जयद्रथ के बाद सिन्धुदेश के एक बड़े प्रदेश पर श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर के पक्ष के लोगों ने अपना अधिकार जमा लिया और ज्ञातिराज्य की नींव डाली।

जहां उनकी राजधानी थी वह (मोहन + युधिष्ठिर के नाम) मोहन + युधरा कहलाती थी जो कालान्तर में मोहनजुधारो अथवा मोहनजोदारो के नाम से प्रसिद्ध हुई। सिन्धुवंश शिववंश का ही एक अंग है।

  1. जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-266

Sindhu Jat Gotra

इस समय से पहले भी Sindhu देश में जाटों का प्रजातन्त्री शासन था। सिन्धु देश का साहित्य इसका साक्षी है।

‘बंगला विश्वकोष’ जिल्द 7 पृष्ठ 6 पर लिखा है कि “प्राचीनकाल में Sindhu देश में जाटों का गणराज्य था और सिन्धु देश की जाट स्त्रियां अपने सौन्दर्य और सतीत्व के लिए सर्वत्र प्रसिद्ध हैं।”

महाभारत के बाद सिन्धु देश में विद्यमान सिन्धुवंश के जाटों ने महात्मा बुद्ध से प्रभावित होकर तथा मौर्य, कुषाण एवं धारण गोत्री गुप्त सम्राटों (तीनों जाटवंश) के प्रताप से सामूहिक रूप से बौद्ध-धर्म स्वीकार कर लिया और देर तक इसी धर्म में रहने से आने वाले नवीन ब्राह्मण धर्म की ओर अकस्मात् प्रवृत्त नहीं हुए।

नवीन ब्राह्मण धर्म जब पश्चिम में फैला तो ये Sindhu जाट, सिक्ख या मुसलमान हो गए। इसका विशेष कारण सिन्ध में ब्राह्मणों द्वारा जाटों पर किए गए अत्याचार थे। इसी कारण नवीन हिन्दू धर्म की ओर झुकने में अपना अपमान समझते थे।

(जाटों का उत्कर्ष पृ० 296 लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री)

एक चच ब्राह्मण को सिन्धु राजा साहसीराय द्वितीय ने अपने दरबार में रख लिया। इस राजा की रानी सुहानदी से चच ने अनुचित सम्बन्ध स्थापित कर लिया और नमकहरामी करके रानी की मदद से राज्य को हड़प लिया।

साहसीराय के मरने पर चच ने उस रानी से विवाह कर लिया। इस चच राजा ने सिन्धप्रदेश पर 40 वर्ष राज्य किया।

यह जाटों का इतना कट्टर एवं निर्दयी शत्रु था कि इसने उनकी आर्थिक, सामाजिक तथा मानसिक दशा को कुचल डाला।

(जाट इतिहास पृ० 14-15,लेखक कालिकारंजन कानूनगो; जाट इतिहास पृ० 697 लेखक ठा० देशराज; जाट्स दी एनशन्ट रूलर्ज पृ० 213 लेखक बी० एस० दहिया)।

Sindhu Jat Gotra – सिन्धु जाट गोत्र हिस्ट्री

बन्दा बैरागी के नेतृत्व के पश्चात् जब पंजाब में उच्चाकांक्षी वंशों ने 12 मिसलें (रियासतें) बनाकर प्रान्त से मुगल शासन समाप्त करके सिक्ख शक्ति स्थिर की तो सिन्धु वंश ने कन्हैया और सिंहपुरिया आदि कई मिसलों में प्रमुख भाग लेकर राज्यसत्ता प्राप्त कर ली।

कर्नल जेम्स टॉड ने इन सिन्धु जाटों की प्राचीन प्रतिष्ठा एवं राज्यगौरव का ध्यान रखते हुए सिंधुवंश को 36 राजवंशों में गिनाया है।

राजस्थान के 36 राजकुलों की सूची में टॉड समेत 6 लेखकों की सूची हैं। चन्द्रबरदाई ने भी अपनी सूची में सिन्धु वंश को राजकुलों में लिखा है।

लाहौर, लायलपुर, शेखूपुरा जिलों में Sindhu जाटों की बहुत उन्नत स्थिति थी। स्वतन्त्रप्रियता इस वंश की विशेषता है।

शान्तिकाल में क्रान्ति की प्रतीक्षा करते हुए उत्तम कृषि करना और क्रान्ति में अग्रगण्य भाग लेते हुए प्रमुखता प्राप्त कर लेना Sindhu जाटों की अपनी विशेषता है।

समस्त पंजाब में ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध सर्वप्रथम क्रान्ति करने वाले सरदार अजीतसिंह सिंधु थे जिन्होंने देशहित के लिए विदेशों में रहकर घोर कष्ट सहना स्वीकार किया।

इन्हीं के भाई देशभक्त सरदार किशनसिंह के पुत्र अमर शहीद सरदार भगतसिंह के कारण भारतीय क्रान्ति का इतिहास अत्युज्जवल है। Sindhu वंश के नायक रूप में इस वीर को स्मरण किया जाएगा।

इस प्रकार सिंधुवंश जाटों में अत्यन्त प्रतिष्ठाप्राप्त राजवंश है। अमर शहीद भगतसिंह सिंधु पर ने केवल जाटों को ही, परन्तु समस्त भारतवासियों को गर्व है।

बैडमिंटन सनसनी पीवी सिन्धु आज पुरे देश का नाम दुनिया में रोशन कर रही है |

संधू या Sindhu Jat Gotra – सिन्धु जाट गोत्र हिस्ट्री

भारत की स्वतन्त्रता से पूर्व Sindhu जाटों की रियासतें (जागीरें) कलसिया, फतेहगढ़, सिरानवाली, बड़ाला, भड़वाल, ठोठर, पधाना, चुनिया, भड़न, कालयावाला, मौकल आदि थीं।

  • इस जाटवंश की अधिक संख्या सिक्खों में है।
  • किन्तु इस Sindhu वंश के हिन्दू जाट भी हैं।
  • ये जि० मेरठ, मुरादाबाद, हिसार और रोहतक में बसे हैं।
  • जि० मेरठ में अक्खापुर गांव Sindhu जाटों का है।
  • जिला हिसार में खांडा-खेड़ी, व नारनोंद
  • जि० रोहतक में खेड़ी साध गांव सिन्धु जाटों के हैं।
  • कई स्थानों पर यह गोत्र संधू और सिन्धड़ भी कहा जाता है।
  • जि० करनाल में करनाल शहर, गांव खेड़ी मानसिंह, गगसीना, जुल्लापुर हैं।
  • असंध करनाल के पास जयसिंहपुर सिंधड का गाँव है |

सिन्धुवंश के जाटों की अतिप्रसिद्ध घटनाओं का संक्षिप्त ब्यौरा –

  1. ईसा से 600 वर्ष पूर्व महान् सम्राट् साइरस ने बेबिलोनिया के लोगों से युद्ध करना पड़ा था। साइरस ने सिन्धु जाटों के सम्राट् सिन्धुराज से इस युद्ध के लिए सहायता प्राप्त की। Sindhu सेना की सहायता से साइरस की विजय हो गई।

कर्नल टॉड ने इस समय की जाट जाति के वैभव के लिए निम्नलिखित शब्दों का प्रयोग किया है – “साइरस के समय में ईसा से 600 वर्ष पहले इस महान् जेटिक (जाट) जाति के राजकीय प्रभाव की यदि हम परीक्षा करें तो यह बात हमारी समझ में आ जाती है कि तैमूर की उन्नत दशा में भी इन जाटों का पराक्रम ह्रास (कम, नीचे) नहीं हुआ था।”

  1. जिस समय सिकन्दर ईरान पर आक्रमण करने के लिए बढ़ रहा था, उस समय वहां के शासक शैलाक्ष (सेल्यूकस) ने सिन्धु देश के राजा सिन्धुसेन जो कि सिन्धु जाटों के गणतंत्र अध्यक्ष थे, से सहायता मांगी।

महाराजा ने तीर-कमान और बर्छे धारण करने वाले Sindhu जाट सैनिकों को उसकी सहायता के लिए ईरान भेज दिया।

हेरोडोटस ने इस लड़ाई के सम्बन्ध में लिखा है कि “सिकन्दर की सेना के जिस भाग पर जेटा (जाट) लोग धावा बोलते थे, वही भाग कमजोर पड़ जाता था।

ये योद्धा रथों में बैठकर तीर-कमानों से लड़ते थे। सिकन्दर को स्वयं इनके मुकाबले के लिए सामने आना पड़ा था।”

इसी समय बलोचिस्तान में राजा चित्रवर्मा राज्य करता था जिसकी राजधानी कलात थी। (जाट इतिहास पृ० 695-696, लेखक ठा० देशराज)।

  1. जाटवीरों द्वारा महान् सम्राट् अकबर के आदेश को ठुकरा देने का अद्वितीय उदाहरण – सिन्धुवंशी जाट चंगा ने लाहौर से 15 मील दूर पधान नामक गांव बसाया था।

Sindhu Jat Gotra

फिरोजपुर जिले में दोलाकांगड़ा नामक गांव में धारीवाल जाटगोत्र का चौधरी मीरमत्ता रहता था। उसकी पुत्री धर्मकौर बड़ी बलवान एवं बहुत सुन्दर थी।

एक बार सम्राट् अकबर दौरे पर उस मीरमत्ता के गांव के समीप से जा रहा था। उसने देखा कि मीरमत्ता की इस सुन्दर पुत्री ने पानी का घड़ा सिर पर रखे हुए अपने भागते हुए शक्तिमान् बछड़े को उसके रस्से पर पैर रखकर उस समय तक रोके रखा जब तक कि उसके वीरमत्ता ने आकर उस रस्से को न पकड़ लिया।

अकबर यह दृश्य देखकर चकित रह गया। सम्राट् अकबर इस लड़की के बल एवं सुन्दरता को देखकर मोहित हो गया और चौधरी मीरमत्ता को उसकी इस पुत्री का अपने साथ विवाह करने का आदेश दे दिया।

मीरमत्ता ने जाट बिरादरी से सलाह लेने का समय मांग लिया। सर लिपैन ने लिखा है कि “मीरमत्ता धारीवाल जाट ने 35 जाटवंशों (खापों) की पंचायत एकत्रित की जिसके अध्यक्ष जाट चंगा चौधरी थे।

पंचायत ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास किया कि अकबर बादशाह को लड़की नहीं दी जायेगी। यह प्रस्ताव लेकर चौधरी चंगा Sindhu और मीरमत्ता अकबर के दरबार में पहुंचे।

Sindhu जाट चंगा ने निडरता व साहस से अकबर को पंचायत का निर्णय सुनाया कि जाट आप को लड़की नहीं देंगे।

इस अद्वितीय उदाहरण तथा चंगा की निडरता से प्रभावित होकर अकबर बादशाह ने चंगा जाट को ‘चौधरी’ का खिताब (उपाधि) दे दिया और आपसी मेलजोल स्थापित किया।”

Sindhu Jat Gotra – सिन्धु जाट गोत्र हिस्ट्री

चंगा के पुत्र को भी यह उपाधि रही। परन्तु चंगा Sindhu के पौत्र देवीदास से हत्या के अपराध में जहांगीर बादशाह ने यह उपाधि छीन ली।

जिस सम्राट् अकबर के सामने सिर झुकाकर राजस्थान के बड़े-बड़े कई राजपूत राजाओं ने अपनी पुत्रियों का डोला उसको दे दिया, साधारण ग्रामीण जाटों ने उसके जाट लड़की के साथ विवाह करने के आदेश को ठुकरा दिया।

यह है जाटवीरों की अद्वितीय विशेषता। इतिहास में कोई ऐसा उदाहरण नहीं मिलेता कि जाटों व जाट शासकों ने अपनी पुत्रियों का विवाह किसी मुसलमान बादशाह या मुस्लिम व ईसाईधर्मी लोगों के साथ किया हो।

मुसलमान बादशाहों के जाटों की सर्वखाप पंचायत के सामने झुकने के अनेक उदाहरण हैं |

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