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Simranjit Singh | Shiromani Akali Dal Mann

Simranjit Singh Mann

सरदार सिमरनजीत सिंह मान (जन्म 20 मई 1945) पंजाब के सिख जाट राजनेता हैं। वह सिख राजनीतिक दल शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) के अध्यक्ष रहे हैं। Singh मान दो बार संसद सदस्य भी रहे हैं |

1989 में तरण तारन और 1999 में संगरूर से जीते थे। उन्हें कुल 30 बार से अधिक बार हिरासत में लिया गया है लेकिन उसे कभी दोषी नहीं ठहराया जा सका |

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simranjit singh mann 1945 में Shimla में पैदा हुए है। उनके पिता, लेफ्टिनेंट कर्नल जोगिंदर सिंह मान, 1967 में Punjab Legislative Assembly (पंजाब विधानसभा) के स्पीकर थे।

उनका विवाह गीतांदर कौर मान से हुआ है। मान की पत्नी और कैप्टन अमरिंदर सिंह की पत्नी महारानी प्रनीत कौर बहनें हैं। वह  Bishop Cotton School, शिमला और सरकारी कॉलेज Chandigarh में पढ़े थे। वह “इतिहास” विषय में स्वर्ण पदक विजेता थे।

उनके एक बेटा इमान सिंह और दो बेटियां, पवित कौर और नानकी कौर हैं। कुछ समाचार एजेंसियां उनके बेटे का नाम Imaan Singh Mann लिखती हैं। उनका बेटा भी एक राजनेता है |

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भारतीय पुलिस सेवा simranjit singh mann

वह 1966 में केंद्रीय सेवा परीक्षा के लिए उपस्थित हुए थे और बाद में वह 1967 में भारतीय पुलिस सेवाओं में शामिल हो गए और उन्हें “पंजाब कैडर” आवंटित किया गया।

उन्होंने कई भारतीय पुलिस सेवा पदों पर काम किया, जिनमें Assistant Superintendent of Police Ludhiana, Senior Superintendent of Police Ferozepur, Senior Superintendent of Police Faridkot,  रेलवे Inspector-General of Police, पटियाला, सतर्कता ब्यूरो चंडीगढ़ के उप निदेशक, पंजाब सशस्त्र पुलिस के कमांडेंट और औद्योगिक सुरक्षा बल बॉम्बे के समूह Commandant

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उन्होंने पंजाब के सहायक Deputy Commissioner गवर्नर के रूप में भी कार्य किया। Golden Temple पर भारतीय सरकार के सैनिकों के हमले (जिसे Operation Blue Star भी कहा जाता है) के खिलाफ विरोध करने के लिए उन्होंने 18 जून 1984 को  Indian Police Service से इस्तीफा दे दिया।

हम पढ़ रहे है Simranjit Singh Mann

राजनीतिक कैरियर

1984 में, उन्होंने 1984 anti-Sikh riots के विरोध में बॉम्बे में केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल के कमांडेंट के रूप में अपनी पद से इस्तीफा दे दिया और ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान सबसे पवित्र मंदिर Harmandir Sahib (Golden Temple) पर हमला किया |

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assassinate Prime Minister Indira Gandhi की साजिश के साथ अन्य चीजों के अलावा मान पर आरोप लगाया गया था। भारतीय सेना द्वारा हिरासत में लिया गया था।

जेल से ही चुनाव लडे और पंजाब राज्य में भारी जनादेश द्वारा भारत की संसद में चुने गए थे, और बिना शर्त से “राज्य के हित में” रिहा किए गए थे | सभी आरोपों को ख़ारिज कर उन्हें नवंबर 1989 में जेल में पांच साल रहने के बाद छोड़ दिया गया था।

उन्हें इस आधार पर एक भारतीय पासपोर्ट से इंकार कर दिया गया कि वह “भारत की सुरक्षा और अखंडता के लिए खतरा” थे।

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मान ने उस समय  Indian Parliament में प्रवेश से इनकार कर दिया गया था जब उन्होंने उनके साथ तलवार लाने का आग्रह किया था, और एक स्वीकार्य छोटे Kirpan रखने से इंकार कर दिया था।

मई 1993 में, जालंधर उपचुनाव के दौरान एक उम्मीदवार के समर्थन में प्रचार करते समय, एक बंदूकधारक ने simranjit singh mann की हत्या का प्रयास किया।

उन्होंने इस बारे में पुलिस में कोई भी प्राथमिकी शिकायत दर्ज़ नहीं कराई थी ।

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जाट लेखक कमान्डेंट हवासिंह सांगवान जी का निजी अनुभव नीचे लिख रहा हूँ

मैं यहाँ यह कहना चाहूंगा कि मैंने अपने साढे-34 वर्ष के सेवाकाल (विवरण लेखक के परिचय में पढें) भारत वर्ष में लगभग सभी जगह जहाँ-जहाँ उग्रवाद व आंदोलन चले, सेवा की।

मेरा मानना है कि जो भी व्यक्ति अपनी जाति, वर्ग व देश के लिये आंदोलन करते हैं वे कभी गलत नहीं होते, फिर चाहे वह अमर शहीद भगतसिंह, बृषा मुण्डा, तात्या भील, चारु मजूमदार, कान्नू सान्याल, जनरल फिजो, लाल डेंगा, शेखअब्दुल्ला, संत जरनेलसिंह भिण्डरवाला व सरदार सिमरनजीतसिंह मान आदि क्यों ना हों।

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Simranjeet Singh Mann face to face with a police officer outside DMC Ludhiana

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यह अलग बात है कि उनमें से कुछ के आंदोलन गलत हाथों में व गलत रास्ते पर चले गये। मुझे याद है कि जिस ‘लाल डेंगा’ को, जो कभी आसाम रजि० में हवलदार थे |

उनको अनुशासनहीनता के कारण नौकरी से बाहर निकाल दिया गया था, को पकड़ने व मारने के लिए मिल्ट्री व पैरामिल्ट्री के हम लोग रात-दिन मिजोराम के जंगलों की खाक छानते फिरते थे।

उसी व्यक्ति को हमने 30 जून 1986 में हथियारबंद सलामी दी तथा आज भी उनकी मजार पर फूल चढ़ाने जाते हैं। इसी दिन तत्कालीन प्रधानमन्त्री राजीव गांधी ने स्वयं समझौते के लिए वहां जाना पड़ा था।

वही शेख अब्दुल्ला जिनको सन् 1953 में कूद में एक ड्रामे के तहत पं० नेहरू ने नजरबन्द करवाया तथा सी.आर.पी.एफ. को उनकी हिफाजत में लगाया |

उसी महापुरुष को हम सन् 1975 में एक नजर से देखने के लिए टूट पड़े थे और जम्मू कश्मीर की कांग्रेस सरकार भारी बहुमत में होते हुए स्वयं इन्दिरा गांधी ने इसे शहीद घोषित करना पड़ा था।

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Simranjit Singh Mann’s daughter Pavit Kaur.

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वहीं ‘फिजो’ साहब जो कभी सड़क के किनारे नागालैण्ड में एक छोटी सी दुकान में लोगों की गाडि़यों की मुरम्मत किया करते थे, को मिल्ट्री व पैरामिल्ट्री उनको पकड़ने व मारने के लिए उनके जीवन उपरांत भी पीछे पड़ी रही और आज उसी के अनुयाइयों से बात करने के लिए भारत सरकार का दूत पदन्नाभईया दूसरे देशों में जाते हैं। यदि ये गलत थे तो फिर ऐसा क्यों?

सरदार simranjit singh mann जो कभी फरीदकोट में एस.एस.पी. होते थे और उनको हम सलाम किया करते थे, उसी व्यक्ति को मैंने सन् 1986 में भागलपुर की सैन्ट्रल जेल में कैदी के तौर पर सुरक्षा दी।

मुझे याद है कि जब उनके पिता सरदार जोगिन्द्रसिंह भूतपूर्व विधानसभा अध्यक्ष पंजाब व उनकी माता जी तथा उनकी पत्नी अपने दोनों बच्चों के साथ जब जेल में मिलने आते थे तो बिहारी लोग घण्टों तक मई-जून की तपती धूप में उनको जेल के बाहर एक अपराधी के तौर पर खड़ा रखते थे।

जब मैं वहाँ के जेल सुपरिटेंडेंट श्री गांगुली से इसकी शिकायत करता था तो उनका कहना होता था कि जब तक कोई पंजाबी जानने वाला अधिकारी नहीं आ पायेगा वे मुलाकात नहीं करवा पायेंगे।

जब मैं कहता था कि मैंने पंजाबी पढ़ी है और पंजाबी को समझ सकता हूँ तो उनका उत्तर होता था कि ‘आप तो हरयाणा के रहने वाले हैं और हरयाणा और पंजाब के लोगों की तो आपसी दुश्मनी रही है।’

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अब मैं कैसे समझा पाता कि हमारा एक खूनी रिश्ता है। ये बड़ी विस्तृत घटनायें हैं जिनका वर्णन मैं कभी बाद में ही करूंगा। लेकिन याद रहे, यही सिरमनजीतसिंह मान बाद में संसद सदस्य बने तो हम उन्हें फिर सलाम किया करते थे।

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अभी पाठक ही बतलायें कि कौन कितना उचित या अनुचित था या है।

सरहद पर विदेशी पहरे की बात मत करो गुलामी की बू आती है।
झुकने-झुकाने की हद होती है, हमारी पीठ बिकने की बू आती है॥

तो दोस्तों यह था हमारा आज का लेख simranjit singh mann

जय योधेय सत श्री अकाल

Randhir Deswal

Hi, I am Randhir Singh a Solo Travel Blogger form Rohtak Haryana. I am a writer of Lyrics and Quotes.

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