शिवाजी महाराज़ के मित्र ताना जाट गौरवगाथा

shivaji maharaj & Tana Jat story

ताना जी, जिसका नाम कई पुस्तकों में ताना जी मलूसरे लिखा है, वह जाट थे। कविराज चौधरी ईश्वरसिंह गहलौत आर्य के भजन का कुछ अंश इस प्रकार है –

देखा है बहुत जमाना, है कहीं कहीं याराना।
वह जाट बहादुर ताना, शिवा की कैद कटाना।

औरंगजेब ने षड्यन्त्र द्वारा shivaji maharaj और उसके पुत्र शम्भाजी को आगरा दरबार में बुलाकर 12 मई 1666 को उन्हें कैद में डाल दिया और यह योजना बनाई कि कोई बहाना बनाकर उनका वध करवा दिया जाए।

shivaji maharaj व उनके पुत्र को औरंगजेब की कैद से निकालना ताना जाट की चतुराई व वीरता का काम था।

वह सफेद दाढी लगाकर मुसलमान वृद्ध हकीम बनकर शिवाजी से मिला और इलाज के बहाने कई दिन तक मिलता रहा।

उसने ठोस व कारगर योजना बनाकर मिठाइयों के टोकरों में बैठाकर दोनों को कैद से बाहर निकलवा दिया।

ताना जाट की अद्भुत वीरता – shivaji maharaj

छत्रपति शिवाजी का दक्षिणी भारत में राज्य स्थापित होने के पश्चात् औरंगजेब ने उसके सिंहगढ़ नामक दुर्ग पर अधिकार कर लिया।

एक दिन उसकी माता जीजाबाई ने, जो प्रतापगढ़ के किले में रहती थी, अपने पुत्र shivaji maharaj को राजगढ़ के दुर्ग से बुलाया और उसको अपना सिंहगढ़ का किला मुग़लों से वापिस लेने का आदेश दे दिया।

सिंहगढ़ के किले में मुगलों की बड़ी शक्तिशाली सेना का कब्जा था जिसका सेनापति राजपूत राणा उदयभान राठोड़ और वीर योद्धा सीदी बल्लाल था।

महाराज शिवाजी ने अपने जाट मित्र ताना जी मलसूरे को उसके गांव उमराठे में पत्र भेजा, जिसमें लिखा था कि अपने किसान दल को लेकर शीघ्र ही राजगढ़ दुर्ग में पहुंच जाओ।

ताना जी के पुत्र रायबा का विवाह था, उसको छोड़कर उसके कोली जाट गोत्र के कई हजार किसानों को एकत्र किया और उनको लेकर राजगढ़ दुर्ग में पहुंच गया।

ताना जाट की अद्भुत वीरता – shivaji maharaj

वहां शिवाजी तथा उसकी माता जीजाबाई ने उनका स्वागत किया और अस्त्र-शस्त्र देकर उनको युद्ध के लिए तैयार किया।

राजगढ़ से सिंहगढ लगभग 15 मील पर था। कोली जाटों की सेना, जिसका सेनापति वीर योद्धा ताना जी था, ने रात्रि के समय सिंहगढ़ को घेर लिया।

किले के भीतर जाना असम्भव था। ताना जी ने शिवाजी की प्रसिद्ध यशवन्त नामक चिपटण गौह को एक रस्सा बांधकर किले की दीवार पर छोड़ दिया।

वह ऊपर चढ़ गई और अपने पंजे दीवार की छत पर गाड़ दिये। उस रस्से पर से एक जवान चढा जिसने दूसरे रस्सों की सीढ़ी छत पर से नीचे लटका दी।

ताना जाट की अद्भुत वीरता – shivaji maharaj

उस पर से वीर सैनिक चढ़ गये जिन्होंने किले का दरवाजा खोल दिया। मुग़ल सैनिक शराब के नशे में चूर थे।

ताना जी अपने साथ 50 वीरों को लेकर सबसे पहले दरवाजे से अन्दर गया और मुगलों को गाजर मूली की तरह काटना शुरु कर दिया।

बाकी सैनिक भी अन्दर घुस गये और हाथों-हाथ युद्ध बड़े जोरों से होने लगा।

ताना जी ने सीदी बल्लाल तथा उदयभान के 12 पुत्रों को मौत के घाट उतार दिया। फिर राजपूत उदयभान राठोड़ ने स्वयं ताना जी से युद्ध किया, जिसे ताना जी ने मौत के घाट उतार दिया और मुग़ल सैनिक घबराकर भागने लगे।

उनको एक-एक को मार दिया और सिंहगढ़ पर शिवाजी का झण्डा फहरा दिया गया। परन्तु इस युद्ध में ताना जाट वीरगति को प्राप्त हुआ।

यह सूचना मिलने पर shivaji maharaj ने कहा था कि “मैंने सिंहगढ़ को नहीं जीता है, परन्तु गढ़ (किला) को जीता है लेकिन सिह (शेर) को खो दिया है।”

ताना जी की वीरता का यह अद्वितीय उदाहरण है।

shivaji maharaj ने ताना जी के पुत्र रायबा के लिए दूसरी लड़की की तलाश की और उसका विवाह बड़ी धूमधाम से स्वयं शिवाजी ने किया।

नोट shivaji maharaj बलवंशी जाट थे

7 फरवरी 1986 साप्ताहिक पत्र सर्वहितकारी के पृ० 8 व 4 पर हरयाणा सर्वखाप पंचायत रिकार्ड ग्राम शोरम जि० मुजफ्फरनगर के हवाले से, लिखा गया है कि शिवाजी बलवंशी (बलियानवंशी) जाट थे। इसके संक्षिप्त प्रमाण इस प्रकार से हैं –

महाराज शिवाजी के दादा बलवंशी (बालियान) मालोजी भोंसले चित्तौड़ वंश में से थे। आपसे 7-8 पीढ़ी पहले शिवराव राणा चितौड़वंश के पुत्र भीमसिंह ने भोंसला नामक दुर्ग में भागकर जान बचाई थी।

इसी कारण से यह वंश भोंसला नाम से ख्याति प्राप्त कर गया। यह बात लगभग 1360 वि० स० (सन् 1303) अर्थात् अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ विजय किया, उस समय की है।

मालोजी भोंसले के पिता सम्भाजी भोंसले दौलताबाद के समीप वेरूल में रहते हुए कई ग्रामों की जमींदारी करते थे। 25 वर्ष की आयु में मालोजी अहमदनगर राज्य में 5000 घुड़सवारों के अफसर नियुक्त हुए।

1651 वि० स० (सन् 1594) में आपके पुत्र शाहजी का जन्म हुआ तथा 1661 वि० स० (सन् 1604) में मालोजी भोंसले को सूपा तथा पूना के परगने जागीर में मिले। आपका काल 1609 वि० स० से 1675 वि० स० (सन् 1552 ई० से 1618 ई०) है।

शाहजी भोंसले महाराणा चित्तौड़ के बलवंशी मालोजी के पुत्र थे। आप बीजापुर नवाब के यहां ऊँचे पद पर रहते थे।

जाटवंश की रानी जीजाबाई के उदर से शिवाजी का जन्म अप्रैल 20, 1627 ई० को पुणे के उत्तर में शिवनेर के किले में हुआ।

ताना जाट की अद्भुत वीरता – shivaji maharaj

उसने अपनी माता तथा अपने गुरु समर्थ रामदास की शिक्षा को प्राप्त कर एक महान् वीर साहसी तथा छापामार युद्ध के धुरन्धर योद्धा बनकर ख्याति प्राप्त की।

आपने दक्षिण भारत में एक स्वतन्त्र राज्य की स्थापना की। उसके राज्य में पश्चिम घाट तथा कोंकण के सूरत से लेकर गोआ तक के सभी प्रदेश, पूर्व में बगलान, चन्दूर पूना, सतारा तथा कोल्हापुर के प्रदेश तथा सुदूर दक्षिण-पूर्व में बेलारी, सीरा, वैलार तथा जिंजी के प्रदेश सम्मिलित थे।

सूर्यवंशी प्रहलाद के पुत्र विरोचन हुये, उनके पुत्र बलि हुए जो बड़े प्रतापी राजा थे। उन्हीं की प्रसिद्धि के कारण सूर्यवंशी आर्यों का संघ उनके नाम पर बल या बालायन वंश प्रचलित हुआ जो कि जाटवंश है।

इस बलवंश का राज्य बलभीपुर में वीर योद्धा भटार्क ने अपने बलवंश के नाम पर स्थापित किया जो सिंध के मुसलमान शासकों ने सन् 757 ई० में जीत लिया।

वहां से बलवंशी जाट बाप्पा रावल या गुहादित्य मेवाड़ में आया और उसने अपने नाना मान मौर्य जो कि चित्तौड़ का शासक था, को मारकर चित्तौड़ का राज्य हस्तगत कर लिया।

यह घटना सन् 713 ई० की है। बाप्पा रावल ने जो कि बलवंश का जाट था, अपना चित्तौड़ पर राज्य गुहिल-गहलौत नाम से प्रचलित किया।

गहलौत जाटों का राज्य चित्तौड़ व मेवाड़ पर 713 ई० से 14वीं शताब्दी तक लगभग 600 वर्ष तक रहा।

ताना जाट की अद्भुत वीरता – shivaji maharaj

राजपूत संघ तो 14वीं शताब्दी में प्रकाश में आया। इससे पहले इनकी शक्ति स्थापित नहीं हुई थी। इसी बलवंश के गहलौत जब राजपूत संघ में मिल गये तब वे राजपूत कहलाने लगे।

इस तरह से गहलौतों की दो श्रेणी जाट और राजपूत बन गईं जिनका रक्त एक ही है और ये बलवंशी जाट हैं। इन्हीं की शाखा सीसौदिया बन गई और उपाधि राणा हो गई।

शिवाजी के पूर्वज शिवराम राणा चित्तौड़ के पुत्र भीमसिंह गहलौत बलवंशी जाट थे और उनसे 7-8 पीढी बाद शिवाजी के दादा बलवंशी मालो जी भौंसले चित्तौड़ वंश में से थे।

बलवंशियों की एक शाखा बरार के भोंसला राजवंश की थी जिसके मूल पुरुष राधो जी थे। इनकी राजधानी नागपुर में थी। इनको पेशवा बाजीराव ने 1797 वि० सं० (सन् 1740) में बरार का राज्य दिया था।

इन बलवंशी भोंसलों का बरार पर शासन राधो जी प्रथम से लेकर राधो जी भोंसला तृतीय तक 8 पीढ़ी सन् 1740 से सन् 1863 तक 123 वर्ष रहा।

ताना जाट की अद्भुत वीरता – shivaji maharaj

मेवाड़ बलवंश की एक शाखा बल-उच स्थान जो बलोचिस्तान कहलाया, वहां जा पहुंची। वहां पर ये लोग मुसलमान बन गये।

दूसरी शाखा नेपाल में जितने ब्राह्मण हैं, वे कान्यकुब्ज हैं तथा जितने क्षत्रिय हैं, वे सूर्यवंशी बलवंशी जाटवंशज हैं। दोनों यही से नेपाल गये है | जाटों का सम्बन्ध महाराणा उदयपुर से है।

प्रमाण पुस्तके :-

  1. राजस्थान के राजवंशों का इतिहास पृ० 27 लेखक जगदीशसिंह गहलौत ने भी लिखा है कि shivaji maharaj चित्तौड़ के सीसौदिया वंश के थे। जो कि बलवंश (बाल्यान) की शाखा है।

2. जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-530

Randhir Deswal

Hi, I am Randhir Singh a Solo Travel Blogger form Rohtak Haryana. I am a writer of Lyrics and Quotes.

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