shahid bhagat singh in hindi – शहीद भगत सिंह संधू

shahid | bhagat singh in hindi | शहीद भगत सिंह संधू

7 अक्टूबर सन 1930 की ट्रिब्यूनल द्वारा लाहौर षड़यंत्र केस (द्वितीय) का निर्णय सुना दिया गया

जिसके अनुसार shahid भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव को फासी की सजा मिली |

शिव वर्मा, किशोरीलाल , गयाप्रसाद, महावीर सिंह बी. के. सिन्हा और के. एन. तिवाड़ी को आजीवन कारावास के लिए भेजा गया|

कुंदनलाल को 7 वर्ष , प्रेमदत और जयदेव को 5-5 वर्ष की सजाएं तथा अजय  घोष और जीतेन्द्र सान्याल को बरी कर दिया गया |

फैसले के बाद शिववर्मा आदि आजीवन कारावासियो को लाहौर में भगतसिंह और उनके साथी शिववर्मा की अंतिम मुलाकात का वर्णन इस प्रकार किया हैं :

” अब शिव वर्मा shahid भगतसिंह की काल – कोठरी के द्वार पर थे |

बेड़ी की झनझनाहट सुन भगतसिंह जाग उठे और कूद कर जंगले से आने लगे |

उन्होंने अपनी भुजाये जंगले से बाहर निकाली और शिव वर्मा ने अपनी भुजाए जंगले के अन्दर डाली भुजाओ के बीच में लोहे की सलाखे थी,

पर भुजाओ ने दोनों को एक जगह समेट दिया था | … यह गहरे सुख की घडी थी |

जीवन – मरण के दो साथी अचानक आ मिले थे | यह दारुण दुख की घडी थी |

जीवन – मरण के दो साथी सदा के लिए बिछुड़ रहे थे | आखो, आखो को आखिरी बार देख रही थी |  कान बातो को आखिरी बार सुन रहे थे |

  • देह , देह आखिरी स्पर्श कर रही थी |
  • दोनों एक दुसरे में समाये खड़े थे |

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शिव वर्मा की आँखें बरस पड़ी, shahid भगतसिंह हंस कर बोले – क्रांतिकारी पार्टी में आते ही मैंने सोचा था

अगर मैं इन्कलाब जिंदाबाद के नारे को देश के कौने कौने में पहुंचा सका तो समझूंगा मेरे जीवन का मूल्य मुझे मिल गया है,

पर आज तो इस फांसी को कोठरी में भी अपने इस नारे को सुन रहा हूँ |

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उन्होंने आलिंगन को थोडा ढीला करके शिव वर्मा के दोनों कंधें पकड़ लिए और पुरे आत्मविश्वास और आत्म गौरव की ज्योति जगमगा कर कहा

  • मैं समझता हूँ इस छोटी सी जिन्दगी का इससे अधिक मूल्य और क्या हो सकता है |

शिव वर्मा के हाथ भी ढीले पड गये और उन्होंने भगतसिंह का हाथ अपने हाथ में ले लिया |

अमर shahid भगतसिंह ने उनका लाड़ और उत्साह दबाते हुए कहा

  • मैं तो कुछ दिनों में सारे झंझटों से छुटकारा पा जाऊंगा,
  • लेकिन तूम, लोगों को लम्बा सफर करना है |

मैं विश्वास करता हूँ, तुम इस लम्बे अभियान में थककर रास्ते में नही बैठ जाओगे |

एक बार दोनों फिर पूरी गर्मी से मिले और फिर अलग हो गये, फिर कभी भी न मिलने के लिए |

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मैं सैनिक हूं देश का फिर भी?
विषम परिस्थितियों से जूझ रहा हूं,
मैं सबसे ये सवाल बूझ रहा हूं,

गद्दियों पे बैठे हैं जो नवाब,
मांगता हूं उनसे जवाब,
देना होगा मेरे हिस्से का हिसाब ।

मैं सैनिक, हर बार जब लौटता हूं छुट्टी,
मिलती है घर पर गाय की छान टूटी,
बापूजी की खत्म हुई दवाई की शीशी,

मां के टूटे चश्मे के कांच,
चूल्हे में मंदी पड़ती आंच,
बच्चों की फीस के स्मरण-पत्र
मिलते हैं ढेरों काम मुझे, यत्र तत्र सर्वत्र।

मैं बॉर्डर पर पड़ा रहता हूं,
घनघोर घन, शीत आतप सहता हूं,
मैं जो जाता हूं जब भी काम पर,
सिल जाते हैं होंठ बीवी के,

भर जाती है आंख मां की,
और पापा वापस आएंगे का
चर्चा रहता है बच्चों की जुबान पर।

शहीद होकर वह जब भी घर आता है
लाश पर राजनीती करने जग आता है
अगले दिन भूलकर तेरी शहादत
#देशवाल अपने स्वार्थ में फंस जाता है |

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Randhir Deswal

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