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ਦੇਸ਼ਵਾਲ ਪੁਤ ਪੰਜਾਬ ਦਾ

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चौ० साहब की विचारधारा धीरे-धीरे लेकिन बड़े सशक्त तरीके से संयुक्त पंजाब punjab में ही नहीं पूरे उत्तर भारत (जाट बाहुल्य क्षेत्र) में अपना रंग ला रही थी ।

इसकी शुरुआत इन्होंने सन् 1911 में ही आगरा में अपनी वकालत की पढ़ाई पूर्ण करते ही शुरू कर दी थी और उन्होंने आगरा में जाटों के बच्चों के लिए होस्टल बनवाया ।

उसके बाद 1911 में जार्ज पंचम के आगमन पर सोनीपत तहसील को दिल्ली जिले से निकालकर रोहतक के साथ मिलाने पर वे सन् 1912 में रोहतक आकर वकालत करने लगे ।

उन्होंने सन् 1913 में रोहतक जाट हाई स्कूल की स्थापना करवाई ।

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कहने का अर्थ यह है कि उनकी विचारधारा का प्रथम बिन्दु था वह बिंदु आधुनिक शिक्षा था ।

चौ० साहब यह भली भांति जानते थे कि उनकी जाट कौम गांव में रहती है और शिक्षा में पिछड़ी हुई है ।

जब 6 नवम्बर 1920 को उन्होंने रोहतक जिले के कांग्रेस अध्यक्ष पद को इसलिए त्याग दिया क्योंकि वे कर्मचन्द गांधी और सावरकर के असहयोग आन्दोलन के कट्टर विरोधी थे ।

इसके कारण, बोलना ले सीख और दुश्मन को पहचान ले लेख में पहले ही विस्तार से लिख दिया है ।

चौ० साहब जानते थे कि शिक्षा और आर्थिक स्तर एक दूसरे के पूरक हैं इसलिए उन्होंने शिक्षा के साथ-साथ अपनी विचारधारा को पूरी तरह आर्थिक पर केन्द्रित कर लिया था ।

कांग्रेस छोड़ने के बाद उन्होंने सर फजले हुसैन से मिलकर पंजाब में यूनियनिस्ट पार्टी (जमींदारा पार्टी) का गठन किया जिसके द्वारा अपनी विचारधारा को अमलीजामा पहनाया जा सके ।

वैसे सन् 1916 से ही संयुक्त पंजाब में गैर राजनीतिक जमींदारा एसोसिएशन बनी हुई थी जो सिख जाटों ने बनाई थी जिसमें कुछ हिन्दू भी सम्मिलित हो गए थे ।

लेकिन जमींदारा पार्टी में सभी जाट इकट्ठे हो गए थे ।

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उन्होंने अपनी विचारधारा को जाट जन तक पहुंचाने के लिए सन् 1916 में उर्दू साप्ताहिक जाट गजट निकालना शुरू किया

जो उनकी विचारधारा का आईना था । क्योंकि दूसरे हिन्दू अखबार जाट विरोधी थे (आज भी हैं) |

स्वयं हिन्दू महासभा भी अंग्रेज़ समर्थक थी । वे जाट गजट में ‘ठगी के बाजार की सैर’, ‘बेचारा जमींदार’, तथा ‘जाट नौजवानों के लिए नुस्खे’, आदि नामों से लेखमाला निकालते रहे ।

उनके संदेश धीरे-धीरे गांवों के जाटों तक पहुंचने में लगे थे । हालांकि गांव के अनपढ़ जाटों तक पहुंचने के लिए बड़ी परेशानी थी

क्योंकि हिन्दू अखबार चौ० साहब के विरोध में धड़ाधड़ लिख रहे थे और गांवों में रहने वाली हिन्दूवादी जातियां इनका धुआंधार प्रचार करती थी ।

यहां एक बनाम अनेक की लड़ाई थी । इसी कारण चौ० साहब को पहला चुनाव सन् बादली से 22 मतों से हारना पड़ा था लेकिन दूसरी बार सन् 1923 में कई हजार मतों से जीते ।

हिन्दू महासभाई पंजाबी अखबार चौ० साहब द्वारा कांग्रेस छोड़ने के कारण अंग्रेजों के दास, पिट्ठू, टोडी, देशद्रोही, गद्दार व विश्वासघाती आदि पदवियों से सुशोभित करते थे ।

चौ० साहब इन सबका उत्तर यह कहकर देते थे – ‘जाट भाइयों जब तक ये अखबार मेरी बुराई करते हैं तब तक समझते रहना कि मैं तुम्हारे हित में लगा हूं ।

जिस दिन ये मेरी प्रशंसा करने लगे तो समझना कि मैंने तुम्हारा साथ छोड़ दिया है और मैं बिक चुका हूँ ।’

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लेकिन इस दुष्प्रचार से हमारे जाट भाई भी अछूते नहीं रह पाए और इसी कारण आज भी हमें कुछ ऐसे जाट मिल जाएंगे जो चौ० साहब के लिए ऐसे ही शब्दों का प्रयोग करते हैं । ये जाट भाई अज्ञानी और मूर्ख हैं या स्वयं किसी के पिट्ठू हैं ।

रोहतक से एक चौधरी रामसिंह जाखड़ जो स्वयं ‘हरियाणा तिलक’ पत्र के संपादक नेकीराम शर्मा के पिट्ठू थे, ने तो चौ० साहब के विरोध में एक पूरी पुस्तक ही लिख डाली ।

यह पुस्तक आज भी जिला पुस्तकालयों में उपलब्ध है क्योंकि इसका वितरण 1991 में सरकारी पैसे से कराया गया था ।

जिसके विरोध में रोहतक के जाटों ने फैसला लिया कि जिसे भी रामसिंह जाखड़ मिले उसके मुंह पर थूका जाए ।

लेकिन अभागा रामसिंह दो साल के भीतर ही चल बसा लेकिन नेकीराम शर्मा के किसी पिट्ठू ने उसकी मौत पर एक आंसू तक नहीं बहाया ।

इसलिए यह सच्चाई है कि जिसे अपनी कौम धिक्कार देगी उसे कोई दूसरा कभी गले नहीं लगायेगा ।

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सन् 1923 में रोहतक जिले की एक सभा में चौ० साहब ने नारा दिया – ‘राज करेगा जाट’ ।

इसी तर्ज पर बाद में चौ० साहब ने पेशावर की एक सभा में साफ-साफ कह दिया था – ‘पंजाब में अरोड़ा खत्री रहेंगे या जाट और गक्खड़।’

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यह सुनकर इन लोगों के दिल की धड़कन तेज हो जाती थी । लेकिन ये अपने अखबारों में चौ० साहब के विरोध में कभी लिखना नहीं छोड़ते थे ।

  • उन्होंने कभी भी चौ० साहब का पूरा नाम नहीं लिखा ।
  • कहीं छोटू लिखते थे तो कभी छोटूखान ।

कई बार उन्होंने चौ० साहब को हिटलर लिखा । इसके जवाब में चौ० साहब कहते ‘जहां यहूदी रहेंगे वहां हिटलर तो अवश्य होगा ।’

ये लोग चौ० छोटूराम को पश्चिमी पंजाब में जाने पर चौधरी देवीलाल जैसे नौसिखिये नेता को आगे करके उन्हें काले झण्डे दिखाया करते थे और ये झण्डे इन्होंने पक्के तौर पर बनवाकर अपने घरों में रख लिये थे ।

उन्हीं में से आज भी कुछ लोग हरयाणा के बाजारों में मेहंदी से चितकबरा सिर किए अपना बुढ़ापा काट रहे हैं ।

इन्होंने अवश्य ही अपनी उस टुच्ची विरासत को अपनी लुटेरी संतानों को दे दिया है ।

चौ० साहब ने जाटों की गरीबी के कारण ढूंढ लिए थे । पूरे संयुक्त पंजाब में महाराजा रणजीत सिंह का राज्य जाने के बाद 55 हजार सूदखोर पैदा हो गए थे

जिनकी 100 साल से ब्याज की कमाई बढ़कर पंजाब राज्य के सालाना बजट से तीन गुणा अधिक थी ।

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इनके बाट बट्टे और ताखड़ी नकली और काणी होती थी । जब सन् 1938 में ‘पंजाब कृषि उत्पादन मार्केट एक्ट’ पर पंजाब सदन में बहस हुई

तो इन हिन्दू पंजाबियों के नेता डॉ० गाकुलचन्द नारंग ने कहा ‘इस बिल के पास होने से रोहतक का दो धेले का जाट लखपति बनिये के बराबर मार्केट कमेटी में बैठेगा ।’

इसके उत्तर में चौ० साहब ने गरजकर कहा, ‘नारंग जी आप तो एक दिन एक बैठक में कह रहे थे कि जाट तो राष्ट्रवादी कौम है, उसके अपने अधिकार हैं फिर आज उनके अधिकार कहां चले गए?’

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चौ० साहब बहुत हाजिर जवाब थे और अपनी बात को दृढ़ता और आत्मविश्वास से कहते थे ।

चौ० साहब इस बात को बार-बार दोहराते थे कि जाट कौम बोलना सीखे और दुश्मन को पहचाने ।

उनके निशाने पर दो दुश्मन थे – मंडी और पाखण्डी । लेकिन अफसोस है कि चौ० साहब ने इन दुश्मनों के विरुद्ध जो कानून बनवाए उनको हम न तो गति दे पाए और न ही याद रख पाए ।

उन्होंने अपने समय में इस लुटेरे वर्ग को नंगा कर दिया था और एक कोने में लगा दिया था ।

वे यह भी भली-भांति जानते थे कि अंग्रेजों से कैसे और कब काम लेना है । उन्होंने अपनी कौम के फायदे का कोई एक अवसर भी नहीं गंवाया ।

एक तरफ तो वे अपने जाट गजट में अंग्रेजों की शासन प्रणाली की बखिया उधड़ते थे तो दूसरी तरफ इसी ‘जाट गजट’ के लिए अंग्रेजों से ग्रांट भी लेते थे ।

चौ० साहब बहुत ही बुद्धिमान और पक्के इरादे वाले जाट थे जिन्होंने बड़ी सफाई से अंग्रेजों को दूहा और कांग्रेस को धोया ।

पंजाब में तो कांग्रेस का इन्होंने लगभग सफाया ही कर दिया था । इसी कारण निठल्ला सावरकर, नेहरू, गांधी पंजाब में उनके देहान्त तक कांग्रेसी सरकार के लिए मुंह ताकते रहे ।

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उधर अंग्रेज जान गए थे कि चौ० साहब के बगैर पंजाब में पत्ता भी हिलने वाला नहीं ।

इसीलिए दूसरे विश्वयुद्ध में जब अंग्रेज युद्ध के लिए चंदा इकट्ठा कर रहे थे तो चौ० साहब ने समय की नजाकत को भांपते हुए गेहूं का मूल्य 6 रुपये प्रति मन से बढ़ाकर 10 रुपये प्रति मन की मांग कर डाली ।

इस पर पंजाब के गर्वनर ने सभी राज्यों के कृषिमन्त्री या प्रतिनिधियों को अपने दफ्तर बुलाया

जिसमें दक्षिण राज्य के पाखंडी पंडित श्री राजगोपालाचार्य ने गेहूं का भाव न बढ़ाने के लिए समर्थन किया

तो चौ० साहब ने तड़ाक से कहा कि ये दक्षिण वाले हैं, ये चावल बोते हैं, गेहूं नहीं ।

इस पर भी जब गर्वनर नहीं माना तो चौ० साहब ने उनकी टेबल पर मुक्का मारकर कहा यदि गेहूं का भाव 10 रुपये प्रति मन नहीं किया गया तो वे पंजाब के खेतों में खड़े गेहूं को आग लगवा देंगे और उठकर चले गए ।

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क्या कोई पिट्ठू अपने शासक पर इस प्रकार का व्यवहार करने की हिम्मत रखता है ?

क्या आज भी इस आजाद देश में मुख्यमन्त्री या मंत्री या किसान नेता अपनी मांग को इस प्रकार मनवा सकता है ?

लेकिन अंग्रेजों ने उनकी मांग को मानना पड़ा । चौ० साहब ने अपने राजनीतिक जीवन में अनेक किसान हितैषी कानून बनवाए जिनको इस लेख में लिखना सम्भव नहीं है ।

याद रहे चौ० छोटूराम भारतवर्ष के प्रथम कृषि दार्शनिक |

कुछ लोग कहते थे कि चौ० छोटूराम आजादी के पक्षधर नहीं थे । यह प्रचार उनके विरोधियों ने शुरू किया था क्योंकि उन्होंने सन् 1929 में कहा था –

हम गौरे बनियों का राज बदलकर काले बनियों का राज नहीं चाहते अर्थात् उनके विचार में बनिया तो बनिया ही है, चाहे काले हो या गौरे ।

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उन्होंने तो सिर्फ हमें लूटना है । जब लुटना ही है तो कोई भी लूटे, इसमें क्या फर्क है ?

ऐसी ही टिप्पणी एक बार शहीदे-आजम भगतसिंह ने भी की थी ।

चौ० साहब अच्छी तरह जानते थे कि उस समय यदि आजादी मिली तो वह सत्ता हस्तांतरण होगा और यह सत्ता बनियों को मिलेगी |

यह शत-प्रतिशत सच हुआ क्योंकि इस देश के प्रधानमन्त्री का चयन करने वाला असल में कर्मचन्द गांधी बनिया जाति से था ।

चौ० साहब चाहते थे कि किसान और मजदूर का राज हो जिसमें जाट स्वयं ही सर्वोपरि होगा ।

इसलिए वे चाहते थे कि जाट कौम पहले शिक्षित हो ताकि देश आजाद होने पर सत्ता पर कायम रह कर अच्छी तरह से शासन करे ।

इसलिए उन्होंने आजादी के लिए कभी भी हड़बड़ी और जल्दबाजी नहीं दिखलाई । विरोधी यह भी कहते हैं कि चौ० साहब कभी जेल नहीं गए ।

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मोहम्मद जिन्ना तो कभी एक दिन के लिए भी जेल नहीं गए फिर वे पाकिस्तान के राष्ट्रपति कैसे बने ?

यह जानने का विषय है कि पंडित सावकार, नेहरू और गांधी को जेलों में जो सुविधाएं मिली वे सुविधाएं आज तक हमारे घरों में भी हमें नहीं मिलती

और इसका उदाहरण पाकिस्तानी हत्यारा कसाब से भी लिया जा सकता है जिसको उसकी सुरक्षा में लगे सिपाहियों से कहीं बेहतर खाना मिलता रहा ।

चौ० साहब भली भांति जानते थे कि उसी समय सत्ता मिलने पर कौन लोग सत्ता पर काबिज होंगे । इसलिए उन्होंने एक दिन कहा था,

‘बड़ी विचित्र बात है कि आज भी भारत पर 12 प्रतिशत उच्च जाति के लोगों का राज 88 प्रतिशत भारतीय जनता पर है ।’

हम सभी जानते हैं कि किस प्रकार सावरकर, नेहरू और गांधी ने जिन्ना की पाकिस्तान की मांग के सामने घुटने टेक दिए थे

जबकि उसी जिन्ना को जो पंजाब में पाकिस्तान की तलाश करने गया था को चौ० साहब ने रातोंरात पंजाब से खदेड़ दिया था |

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9 मई 1944 को लायलपुर की एक विशाल जनसभा में चौ० साहब ने जिन्ना को चैलेंज किया था कि

वह उसके इक्यासी मुस्लिम विधायकों में से किसी एक को भी तोड़ कर दिखाए, पाकिस्तान बनाने की तो बात ही छोड़ो ।

इसी दम पर चौ० साहब ने 14 अगस्त 1944 को गांधी को एक पत्र विस्तार से लिखा था कि उन्हें जिन्ना के बहकावे में नहीं आना है ।

लेकिन अफसोस, कर्मचन्द गांधी उस पत्र का उत्तर ही नहीं दे पाए और इसका इन्तजार करते-करते चौ० साहब चले गए ।

Randhir Deswal

Hi, I am Randhir Singh a Solo Travel Blogger form Rohtak Haryana. I am a writer of Lyrics and Quotes.

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