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Nandal Jat Gotra – नांदल जाट गोत्र हिस्ट्री

Nandal Jat Gotra – नांदल जाट गोत्र हिस्ट्री

शिशुनागवंश का अन्तिम राजा महानन्दी था। विष्णु पुराण, द्वितीय खण्ड, चतुर्थ अंश में लिखा है कि “महानन्दी का पुत्र महापद्म नन्द शूद्रा के गर्भ से उत्पन्न हुआ।

उसने बहुत क्षत्रियों का अन्त किया और बिना किसी बाधा के सम्पूर्ण पृथ्वी का शासक बना।” इन्हीं पुराणों के हवाले से कई इतिहासकारों ने इसे आर्य जाति में सर्वप्रथम शूद्र राजा लिखा है।

यह मगध साम्राज्य का शासक बना और एक चक्रवर्ती सम्राट् कहलाया। यह वंश नन्दवंश कहलाया जिसका संस्थापक महापद्म नन्द था।

राजा महापद्म नन्द को शूद्र लिखने वाली पुराणों तथा अन्य इतिहासकारों की बात मनगढंत, कपोलकल्पित तथा असत्य है। क्योंकि यह शिशुनागवंशज है जोकि चन्द्रवंशी परम्परा में कुरु जाटवंश की प्रणाली में है।

दूसरी बात इसके पूर्वज शिशुनाग वंश के प्रसिद्ध सम्राट् बिम्बसार एवं उसका पुत्र अजातशत्रु बौद्ध-धर्म के अनुयायी बन गये थे

जिससे नवीन हिन्दूधर्म के ब्राह्मणों (पौराणिकों) को यह बात खटकी, क्योंकि वे तो बौद्धधर्म के शत्रु थे और उसे मिटाना चाहते थे।

सो, इन पौराणिकों ने उन क्षत्रिय आर्यों को शूद्र, व्रात्य, अनार्य, पतित तथा नास्तिक, म्लेच्छ आदि कहा तथा लिख दिया, जो कि इनके दास नहीं बने।

यह बातें हमने विस्तार से लिखी हैं। सो यह बात सत्य है कि यह नन्द या नांदल बिना-सन्देह जाटवंश है जोकि कुरु जाटवंश का नन्द या नांदल नाम से शाखा जाटगोत्र है।

इसी तरह से जाटों के 2500 गोत्र हमने लिखे हैं वे सब आर्यवंशज हैं जब कि उनमें से एक भी शूद्र गोत्र नहीं है।

Nandal Jat Gotra – नांदल जाट गोत्र हिस्ट्री

महापद्म नन्द ने इक्षवाकु, कुरु, पांचाल, कौशल, मैथिल, अस्मक (अश्मक), शूरसेन आदि जनपद राज्यों का अस्तित्व मिटा दिया।

महापद्म नन्द के पण्डुक, पण्डुगति, भूतपाल, राष्ट्रपाल, गोविशांक, दशसिद्धक, कैवर्त और धनानन्द नामक 8 पुत्र थे।

इन्होंने अपने पिता के 22 वर्ष बाद 12 वर्ष तक शासन किया।

Nandal Jat Gotra

विष्णु पुराण के हवाले से लिख दिया है कि महापद्म नन्द और उसके पुत्रों का मगध साम्राज्य पर 100 वर्ष तक शासन रहेगा।

इन्हीं पिता पुत्रों के इस साम्राज्य को नवनन्दों के नाम पर प्रसिद्धि मिली।

सम्राट् सिकन्दर के भारतवर्ष पर आक्रमण के समय सम्राट् महापद्म नन्द मगध साम्राज्य पर शासन कर रहा था।

यूनानी लेखकों के अनुसार इसकी सेना में 2 लाख पैदल सेना, 20 हजार घुड़सवार, 2 हजार रथ और 4 हजार हाथी थे।

इसके पास धन की कमी नहीं थी।

कथासरित्सागर और मुद्राराक्षस के अनुसार नन्दों को 9-9 करोड़ मुद्राओं का अधीश्वर लिखा है।

मगध की इस शक्ति को देखकर यूनानी सेना ने व्यास नदी पार करने का साहस छोड़ दिया और सिकन्दर को वहां से वापस लौटना पड़ा।

नांदल जाट गोत्र हिस्ट्री

इस नन्दवंश के कठोर व्यवहार और अन्याय से जनता असन्तुष्ट रही। इस वंश का अन्तिम राजा धनानन्द था।

परिणामस्वरूप पाखंडी चाणक्य विष्णुगुप्त कौटिल्य ने कुटिल षड्यंत्र के बल से लगभग 321 ई० पू० में इस राजा धनानन्द का विनाश करके चन्द्रगुप्त मौर्य या मौर जाट को मगध का शासक बनाया। इस तरह से मगध पर मौर्य या मौर शासन की नींव रखी।

नन्दवंश नांदल जाटवंश है इसके प्रमाण –

जाट्स दी ऐनशन्ट रूलर्ज पृ० 256 पर, बी० एस० दहिया ने लिखा है कि “यह कहना उचित है कि मौर्य शासन से पहले जो नन्द जाट थे वे आज नांदल/नांदेर जाट कहलाते हैं।”

आगे वही लेखक पृ० 305 पर लिखते हैं कि “नांदल जाटों ने भारतवर्ष में जो साम्राज्य स्थापित किया वह नन्द मगध साम्राज्य कहलाया।”

नांदल गोत्र के जाटों का निवास आज भी भारतवर्ष में है।

Nandal Jat Gotra – नांदल जाट गोत्र हिस्ट्री

इस गोत्र के जाटों के गांव निम्नलिखित हैं –

  1. जिला रोहतक में गांव बोहर तथा इसी के निकट गढ़ी है जिसे बोहर गढ़ी कहते हैं। इस गोत्र के अन्य सभी गांवों का निकास इसी बोहर गांव से है।
  2. जिला रोहतक में नान्दल गांव आधा
  3. रिठाल गांव का एक ठौला
  4. महराना गांव आधा
  5. जटवाड़ा में 50 घर
  6. चीमनी में 50 घर
  7. जिला सोनीपत में ज्यसीपुर गांव आधा,
  8. जिला पानीपत डाहर
  9. जाटल
  10. मंढाणा कलां
  11. मंढाणा खुर्द

जिला बुलन्दशहर तहसील खुर्जा (उ० प्र०) में इस गोत्र के 12 गांव पास-पास मिलकर बसे हुए हैं।

जिनके नाम –  भुन्ना, गोहनी, रकराना, शाहपुर, धर्मपुर, छिछरौली,  रामगढ़ी, नोरंगा, हबीपुर, फिरोजपुर, भूतगढी, जलोखरी।

यू० पी० में बोहर गांव से जाकर बसने के कारण वहां ये नांदल जाट, बोहरिये कहलाते हैं। यूपी में इन्हें नादर जाट भी कहा जाता है जो केवल भाषा भेद की वजह से है |

नांदल जाट गोत्र हिस्ट्री

बोहर गांव का अति प्रसिद्ध नांदल जाट –

द्वितीय महायुद्ध के समय मैंने दिल्ली के लाल किले में एक बड़ा पत्थर रखा हुआ देखा था।

उस पर यह लेख खुदा हुआ था कि “बोहर गांव में एक कुआं खोदते समय यह भारी पत्थर उस कुएँ से अकेले एक बोहर गांव के जाट ने बाहर निकाला था।”

उस पर उस जाट का नाम भी था परन्तु मुझे खेद है कि मैं उस पहलवान व्यक्ति का नाम भूल गया हूं।

अनुमान है कि उस पत्थर का वजन लगभग 10 मन था। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद वह पत्थर वहां से हटा दिया गया।

मैंन हाल में ही लाल किले में जाकर उस पत्थर को खोजने का प्रयत्न किया किन्तु नहीं मिला।

नोट- Nandal Jat Gotra – नांदल जाट गोत्र हिस्ट्री

महाभारत युद्ध से पूर्व जब महाराज श्रीकृष्ण जी जाटवंशों के साथ व्रज से द्वारिका गये, उस समय केवल व्रज में ही जो कि 84 कोस में सीमित है, 9 नन्दवंश के, 7 वृष्णि वंश के और 2 शूर वंश के राज्य थे।

इनके अतिरिक्त अन्धक, नव, कारपश्व भी इसी 84 कोस के भीतर राज्य करते थे। ये सब जाटवंशज हैं।

(ठाकुर देशराज जाट इतिहास (उत्पत्ति और गौरव खण्ड) पृ० 85-87)।

इसके बाद का नन्द या नांदल जाटों के इतिहास का तथा सम्राट् महापद्म नन्द से पहले का कुछ ब्यौरा प्राप्त नहीं हो सका।

 आधार पुस्तकें –

  • जाटों का उत्कर्ष पृ० 58-59, लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री
  • तारीख हिन्दुस्तान उर्दू पृ० 149-152
  • जाट्स दी ऐनशन्ट रूलर्ज, पृ० 256 व 305 लेखक बी० एस० दहिया
  • जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-477

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