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कालीरामण – कलकल – कालखंडे – औलक जाट गोत्र का इतिहास

कालीरामण – कलकल – कालखंडे – औलक जाट गोत्र का इतिहास
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Kaliraman Kalkal Kalkhande Aulak Jat Gotra History

कालाकालीधामनकालखण्डेकालीरामण (नागवंशी) –

यह गोत्र नागवंश की एक प्रसिद्ध शाखा है। मथुरा के समीप यमुना के किनारे इस वंश का राजा राज्य करता था।

कालीदेह नाम का इनका किला था जो खण्डहर की शक्ल में आज भी मौजूद है।

कृष्ण महाराज द्वारा किया गया कालीयदमन इसी वंश के प्रचण्ड पुरुषों का ही दमन था। उन्होंने बृज से इस वंश का शासन समाप्त कर दिया था।

पंजाब में इस वंश की छोटी रियासतें सिंहपुरा एवम भग्गोवाल थीं। इस वंश को भाषा-स्थानभेद से उक्त नामों के अतिरिक्त कालीरावण, कालीरावत, कालू भी कहते हैं। वास्तव में गोत्र एक ही है।

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इस वंश के जाटों के गांव निम्न प्रकार से हैं –

  • गोवर्द्धन के पास हकीमपुर आदि 20 गांव,
  • बुलन्दशहर में 4 गांव,
  • मेरठ में 2 गांव,
  • मुजफ्फरनगर में 6 गांव,
  • मुरादाबाद में लोदीपुर,
  • रोहतक में जसराना (आधा), डहर मुहाना, महावड़, अहेरीअछेज आदि 10 गांव,
  • हिसार में सबसे बड़ी सिसाय गांव (आधा),
  • पंजाब में जि० गुरदासपुर में कालू जाटों के 50 गांव हैं।

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4. औलक – ओला

यह जाटवंश नागवंश की शाखा है। द्वापर युग में उलूक नामक जनपद का शासक इस वंश का उलूक राजा था।

सभापर्व 27-11 तथा 27-58 महाभारत के इन श्लोकों से उलूक नरेश का महाराज युधिष्ठिर की सभा में आना प्रमाणित होता है।

उलूक देशवासियों की ‘औलिक’ नाम से प्रसिद्धि हुई। परम्परागत श्रुति और विद्वानों ने इनकी गणना नागवंश में की है।

पंजाब ही इनकी बहुलता का स्थान है। यहां इन लोगों की जनसंख्या 1941 ई० में इस प्रकार थी –

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इस वंश के सभी जाट सिक्ख थे। अब ये सब पंजाब में हैं। हिन्दू जाटों को औलक या औरे भी कहा जाता है। यू० पी० में भी ये लोग बसे हैं। जि० अम्बाला में भी इस जाटवंश के कई गांव हैं।

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5. कलकल –

यह जाटवंश भी नागवंश की शाखा है। यह प्राचीन वंश है। इस वंश का राज्य मध्य एशिया के वाकाटक (Vakataka) प्रदेश पर रहा।

इस वंश के सम्राट् परवरसेन प्रथम ने बुन्देलखण्ड से लेकर दक्षिण में हैदराबाद तक लम्बे समय तक राज्य किया।

विष्णु पुराण अंग्रेजी पृ० 382 लेखक विल्सन लिखता है कि “भविष्य में होने वाले पौरव (जाट) वंश के 11 राजाओं का शासन 300 वर्ष रहकर समाप्त हो जायेगा तब किलकिल यवन राज्य करेंगे जिनका सम्राट् विन्ध्यशक्ति नामक होगा।

इस वंश के 10 राजा 106 वर्ष राज्य करेंगे।” यह किलकिल जाटवंश है और इनका सम्राट् विंध्यशक्ति भी जाट था।

इसका प्रमाण यह है कि इस वंश के विवाह शादी के सम्बन्ध जाट धारण गोत्र के गुप्तों और भारशिव एवं टांक/तक्षक जाटों के साथ रहे। (बी० एस० दहिया, जाट्स दी एन्शन्ट रूलर्ज, पृ० 284)।

“ततः किलकिलेभ्यश्च बिन्ध्यशक्तिर्भविष्यति” वायु पुराण 258, ब्रह्माण्ड पुराण 178 के अनुसार वह राजा विंध्यशक्ति जो किलकिल के नाम से प्रसिद्ध था, किलकिला नदी के किनारे प्रतिष्ठित थी।

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यह नदी पन्ना नगर से नागौद जाते हुए लगभग 4 मील पर है। इनका शासनकाल ईस्वी पूर्व 248 वर्ष माना गया है। बुन्देलखण्ड पर इनका एकछत्र राज्य था।

 

बुन्देलखण्ड से जो कलकल हरियाणा आये उन्हें कालखंडे कहा जाता है |यह पढ़े  kalkhande khap

इस वंश की जि० मेरठ में यादनगर एक अच्छी रियासत थी। यहां के जाट अपने वंश किलकिल को कलकल बोलते हैं।

अलीपुर, उपैड़ा, लुकलाड़ा में भी इसी वंश के जाट हैं।

यह वंश केवल जाटों में ही है। हरयाणा में दादरी तहसील में इमलोटा गांव कलकलवंशी जाटों का है। यह कलकल वंश चन्द्रवंशी है।

पाण्डवों की दिग्विजय में अर्जुन ने उत्तर दिशा के अनेक देशों के साथ कालकूट (कालखण्डे) देश को भी जीत लिया था

(महाभारत सभापर्व, अध्याय 26)। यह कालकूट देश चीनी तुर्किस्तान में था जिस पर कालखण्डे गोत्र के जाटों का राज्य था।

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इतिहास मनुष्य समाज की उन्नति एवं पतन की सत्य कहानी होता है। उसे पढ़कर पिछली गलतियों से अपने को बचाना और अगले सुकार्यों के लिए प्रेरणा प्राप्त करना मनुष्य का कर्त्तव्य माना जाता है। इसी के आधार पर जन-समाजों का अस्तित्व सुरक्षित रह सकता है।

उन्नति की इच्छुक प्रत्येक जाति को इतिहास की अत्यन्त आवश्यकता है। क्योंकि जनसमूह जितना प्राचीन गौरवपूर्ण गाथाओं को सुनकर प्रभावित होता है, उतना भविष्य के सुन्दर से सुन्दर आदर्श की कल्पना से नहीं होता।

इतिहासशून्य जातियां न उठीं हैं और न उठ सकती हैं। पूर्वजों के महान् कारनामों से लाभ उठाना और आगे बढ़ते जाना इतिहास से ही सीखा जा सकता है।

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जिन लोगों ने देशनिर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान देना है और जिनकी रगों में आर्यों का शुद्ध रक्त प्रवाहित है उन सम्पूर्ण क्षत्रिय जातियों एवं भारतवासियों को एक मंच पर लाकर संगठित करना स्वाधीन देश की सुरक्षा के हित में परमावश्यक है।

मेरे शिक्षा काल से ही मेरे रुचि धार्मिक एवं ऐतिहासिक बातें जानने की रही है। यह रुचि मेरे यौवन काल में भी रही। 32 वर्ष सेना में देश सेवा करके मैं 19 मार्च 1969 को पेन्शन आ गया।

घर आकर मैंने साहित्य का अध्ययन करना आरम्भ किया। साथ-साथ मेरे रुचि इतिहास की ओर भी रही। मैंने विद्यालयों, महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों को पढ़ाई जाने वाली इतिहास की पाठ्य-पुस्तकें पढ़ीं।

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मुझे ज्ञात हुआ कि इन पुस्तकों में जाट वीरों के शासन एवं वीरता के कारनामे तो दूर, इनका नाम तक भी नहीं लिखा गया है। इन पुस्तकों में विदेशी आक्रमणकारी लिखा है |

उपर्युक्त पाठ्य-पुस्तकें शुंग ब्राह्मण और पाखंडी शन्कराचार्य जबकि कुछ अंग्रेजों के शासन काल में उनके द्वारा लिखित इतिहास पुस्तकों की नकल है।

इनके अतिरिक्त अन्य अनेक इतिहासज्ञ विद्वान् कहे जाने वाले लेखकों ने भारत तथा विदेशों के इतिहास लिखे हैं जो कि अंग्रेजों के लेखों का अनुकरण है, जिनमें जाट वीरों का जिक्र तक भी नहीं है।

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इनमें से एक “इतिहास शिरोमणि” कहलाने वाले श्री ईश्वरीप्रसाद एम० ए०, एल० एल० बी०, डी० लिट् हैं जिन्होंने मध्यकालीन भारत का संक्षिप्त इतिहास सन् 1969 ई० में लिखा।

इस लेखक ने अपनी इस पुस्तक में इस्लाम का जन्म तथा प्रसार से शुरु करके मुगल साम्राज्य का पतन तक का इतिहास लिखा है।

परन्तु मुसलमान शासकों एवं भारतवर्ष पर आक्रमणकारियों के साथ जाटों के युद्धों का कोई वर्णन नहीं किया गया है, जबकि इन सभी के साथ जाट वीरों ने अनेक युद्ध किए। इस पुस्तक में जाटों का नाम तक भी नहीं मिलता।

निवेदक: केप्टन दिलीप अहलावत 

गाँव – डीघल जिला रोहतक (वर्तमान जिला झज्जर)

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