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indian muslim | بھرتیے مسلم

indian muslim | بھرتیے مسلم سماج | क्या भारतीय मुस्लिम पेशेवर आतंकी है ?

पहले स्थानीय फैजाबाद के लोगों के अतिरिक्त लगभग शेष भारत के आम लोग इस बात से अनजान थे कि

अयोध्या में कोई बाबरी मस्जिद श्री रामजन्मभूमि के स्थान पर बनी है और यह भी नहीं जानते थे कि वहां कोई विवाद है।

इस बात को केवल वहां के स्थानीय निवासियों हिन्दू और मुसलमान को ही पता था कि वहां कोई विवादित स्थल है।

लेकिन जब सन् 1984 से इस मसले को राजनैतिक मसला बनाकर बार-बार उछाला गया तो साधारण लोगों को भी पता चलता गया और हिन्दू समाज की भावना इससे जुड़ती चली गई।

इसी प्रकार भारत के मुस्लिम समाज की भी स्थिति बनती गई। भारत के अधिकतर मुसलमानों ने इस प्रचार के बाद ही बाबरी मस्जिद का नाम सुना था।

सच्चाई तो यह है कि न ही तो पूरा हिन्दू समाज राम जन्मभूमि से परिचित था न ही कोई अधिक मुसलमान बाबरी मस्जिद से।

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इस मस्जिद में बनने के बाद बहुत ही कम मुसलमान नवाज पढ़ने गए होंगे लेकिन प्रचार ने मुस्लिम समाज की भावनाओं को इस मस्जिद से जोड़ दिया

और यह मसला उनके लिए हिन्दुओं की तरह उनकी अस्मत और स्वाभिमान का प्रतीक बन गया।

जब 6 दिसम्बर को बाबरी मस्जिद के गिराए जाने पर स्वाभाविक था कि केवल भारत में ही नहीं संसार के समस्त मुस्लिम समाज में इसकी तीव्र प्रतिक्रिया हुई जहां सन् 47 के दंगों में भी कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई थी।

उदाहरण के लिए काश्मीर और हरियाणा का मेवात क्षेत्र। सन् 47 के दंगों में काश्मीर में कोई हुडदंग नहीं मचा

और न ही एक आदमी तक कोई घायल हुआ और यही स्थिति मेवात क्षेत्र की थी।

मेवात क्षेत्र के मुसलमान हिदुओं की तरह दीवाली और होली आदि त्यौहारों को मनाते आए थे।

महाराजा सूरजमल और महाराजा जवाहर सिंह आदि की सेनाओं में भी मेवात मुसलमानों की अच्छी खासी संख्या रहती थी जिसमें बहुत से ओहदेदार भी थे।

यही स्थिति जम्मू-कश्मीर की थी जिसमें राजा गुलाब सिंह से लेकर राजा हरिसिंह तक (राजपूत डोगरा हिंदू) की सेनाओं के साथ भी ऐसा ही था।

लेकिन बाबरी मस्जिद की ध्वस्त होने की घटना ने यहां के मुसलमानों की भावनाओं को सन् 47 में उत्पन्न हुई भावनाओं से भी कहीं अधिक उग्र बना दिया था

और यहां के मुसलमानों ने इस घटना की प्रतिक्रिया में वहां छोटे-मोटे मंदिरों को जलाया और नुकसान पहुंचाया।

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इसी घटना की प्रतिक्रिया में भारतवर्ष के काफी मुसलमानों में अधिक घातक विचार पैदा होने लगे जो स्वाभाविक था।

इसी घटना के कारण भारत के कुछ मुसलमानों में हिन्दुओं के प्रति यहां तक की देश के प्रति भी नफरत पैदा हो गई।

मैं 7 जून 86 से 23 मार्च 1992 तक की अधिक अवधि में उग्रवाद के समय पंजाब में तैनात रहा और इस उग्रवाद को निकट से देखा और झेला था।

लेकिन कहीं भी एक भारतीय मुसलमान को पंजाब के उग्रवाद में लिप्त नहीं पाया गया।

जब कि बिहार से खेती मजदूर बनकर पंजाब में आने पर उनमें से कुछ ने अपनी आस्था सिख धर्म में रखी और उनमें से कुछ उग्रवादी बन गए थे।

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यह सर्वविदित है कि पंजाब के उग्रवाद का पालन पोषण करने वाली इस्लामिक देश पाकिस्तान की सरकारी एजेंसी आई.एस.आई. थी

लेकिन यह एजेंसी एक भी भारतीय मुसलमान को (जम्मू-कश्मीर क्षेत्र छोड़कर) कभी भी उग्रवादी नहीं बना पाई और न ही उग्रवाद का समर्थक।

इसी प्रकार इस घटना से पहले कोई भी भारतीय हिन्दू आतंकी कार्यवाहियों में सम्मिलित नहीं पाया गया

जबकि आज अनेक जेलों में बंद हैं और हिन्दुओं ने कई आतंकी संगठन गुप्त रूप से स्थापित कर दिए हैं।

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वहीं दूसरी ओर इस्लाम धर्मी संगठन ‘सिमी’ के सदस्य जेहादी हमलों में लिप्त पाए गए। जब कुछ कश्मीरियों ने पाकिस्तान के इशारे पर

सन् 1988 में वहां उग्रवाद शुरू किया तो सन् 1992 तक (मस्जिद के ध्वस्त होने तक) सभी प्रयासों के बावजूद कभी जेहादी कश्मीर से बाहर नहीं निकल पाए थे |

जबकि इस घटना के बाद भारत में जगह-जगह उनको पनाह देने वाले उत्पन्न हो गए और इसी कारण जेहादी देश के कोने-कोने तक वारदात करने में सफल रहे।

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भारत सरकार भी इन दोनों तरफ की प्रतिक्रिया स्वरूप उत्पन्न स्थितियों का कोई ठोस प्रतिबंध या समाधान नहीं कर पाई

सरकार की इस बारे में ढुलमुल नीति के कारण हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही कम और ज्यादा आतंकी कार्यवाहियों में लिप्त हो गए।

यह सब इसी रामजन्मभूमि और बाबरी मस्जिद के विवाद का ही परिणाम है।

बाबरी मस्जिद की घटना की सबसे बड़ी प्रतिक्रिया 23 मार्च 1993 को हुई जिसमें पहली बार भारत के ही मुस्लिम नागरिकों ने मुम्बई में बहुत ही योजनाबद्ध तथा गोपनीय तरीके से बड़े पैमाने पर भयंकर बम विस्फोट किए

जिसमें 296 भारतीय नागरिकों की जानें गई जिसमें सभी धर्मों के भारतीय नागरिक थे।

मुम्बई के बड़े-बड़े स्थलों को निशाना बनाया गया जिसमें देश का प्रमुख स्टॉक एक्सचेंज भवन भी शामिल था।

इसके बाद काश्मीरी आतंकवादी देश के कोने-कोने तक पहुंच गए जिनके साथ शेष भारत के मुसलमानों के नाम भी जुड़ने तथा पकड़े जाने लगे।

उत्तर प्रदेश के कई कस्बों का नाम तो इसी कारण भारत में ही नहीं भारत से बाहर भी विख्यात हो गया

जहां के दर्जनों इस्लाम धर्मी स्कूल कॉलेजों में जाने वाले लड़के इन आतंकी कार्यवाहियों में लिप्त हो गए।

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इन्हीं के सहयोग से बंगलौर, कलकत्ता, बनारस, मुम्बई, अहमदाबाद, जयपुर और दिल्ली तक अलग-अलग सार्वजनिक स्थानों जैसे कि

रेलवे स्टेशन और रेलगाड़ियां, भीड़ भरे बाजार और मंदिरों तक में विस्फोट किए गए जिनमें सैकड़ों लोग मारे जा चुके हैं और उससे भी अधिक घायल हुए।

इसी बाबरी मस्जिद के ध्वस्त होने पर आतंकियों ने भारतीय मुसलमानों की भावनाओं के मद्देनजर हिन्दू धर्म स्थलों पर एक के बाद एक आक्रमण किए।

उदाहरण के लिए 30 मार्च 2002 को जम्मू के 150 साल पुराने रघुनाथ मन्दिर पर हमला हुआ जिसमें 10 लोग मारे गए,

24 सितम्बर 2002 को गुजरात के अक्षरधाम मन्दिर पर हमले में 24 लोग मारे गए थे।

यहां तो आतंकवादियों ने श्रद्धालुओं को भी बंधक बना लिया था, जिसके लिए एन.एस.जी. के कमांडो तक को बुलाना पड़ा था।

24 नवम्बर को दुबारा फिर रघुनाथ मन्दिर पर हमला हुआ जिसमें 12 लोग मारे गए।

इसी कड़ी में आतंकवादी 5 जुलाई 2005 को इसी अयोध्या में इसी विवादित जगह पर पहुंच गए।

हालांकि सी.आर.पी.एफ. के जवानों की सतर्कता के कारण वहां पांचों आतंकवादियों को बगैर कोई नुकसान पहुंचाए ढेर कर दिया गया।

यह स्पष्ट है कि धार्मिक स्थलों को निशाना बनाने के पीछे आतंकवादियों का ध्येय देश में धार्मिक दंगे भड़काना होता है।

लेकिन साथ-साथ उनका उद्देश्य भारत के मुसलमानों की सहानुभूति बटोरने के लिए बाबरी मस्जिद के बदले की भावना को भी प्रदर्शित करना होता है।

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इसके पीछे जबरदस्त मनोविज्ञान काम करता है जिसके तहत मुस्लिम आतंकवादी भारतीय मुस्लिम नागरिकों को जो बाबरी मस्जिद ध्वस्त होने से दुःखी और कुंठित हुए थे, को

यह संदेश देना चाहते हैं कि वे भारत के हिन्दुओं के बड़े से बड़े धर्मस्थलों को भी निशाना बनाने की हिम्मत रखते हैं। इस सबके मध्य बाबरी मस्जिद ध्रुवीकरण ही घूमता है।

जबकि दूसरी ओर इन्हीं आतंकवादियों ने काश्मीर में अपने ही धर्म स्थलों तक को नहीं बख्शा।

वे बार-बार जान बूझकर वहां मस्जिद और दरगाहों में पनाह लेने की खबर सुरक्षाबलों तक पहुंचा कर उनके हाथों इन धार्मिक स्थलों को तबाह करने का न्योता देते हैं ताकि सुरक्षा बलों को बदनाम किया जा सके।

इसी कड़ी में चौदहवीं सदी में बनी काश्मीर में संत शेख नुसरुद्दीन वली की दरगाह विख्यात चरारे-शरीफ तक को मई 2001 में ध्वस्त कर डाला था।

इसके पीछे भी इनका यही उद्देश्य था, लेकिन बर्बादी का दोष सुरक्षा बलों पर डालने में पूर्णतया विफल रहे

लेकिन फिर भी कश्मीर का साधारण मुस्लिम नागरिक इन बातों को पूर्णतया समझ नहीं पाता और सुरक्षाबलों के विरोध में खड़ा हो जाता है।

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इसके बाद सन् 2002 में गुजरात के गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के कोच (डिब्बा) संख्या एस-6 में आग लगी या लगाई गई

जिसमें 59 हिन्दू लोग मारे गए या झुलस गए जिसकी प्रतिक्रिया में पूरा गुजरात ही झुलस गया।

यह सब क्रिया की ही प्रतिक्रिया थी।

गुजरात में हजारों बेगुनाह मुस्लिम-धर्मी मारे गए और घायल हुए और कितने ही अपने ही देश और प्रदेश में बेघर हो गए।

जिस पर नानावटी आयोग तथा पूर्व न्यायाधीश यू.जी. बर्नी समिति बनाई गई जिनकी रिपोर्टों पर कारवाई होना शेष है।

जो भी हो, गुजरात के तत्कालीन मुख्यमन्त्री तक बुरी तरह आरोपों के घेरे में हैं।

इन सभी घटनाओं के पीछे रामजन्मभूमि बाबरी मस्जिद की घटना कार्य कर रही है जिसके लिए कौन दोषी है? बड़ा स्पष्ट है।

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मुम्बई में 23 मार्च 1993 के बंम धमाकों की अब जांच पूर्ण हो चुकी है तथा अपराधियों को सजा मिल चुकी है

केवल उनको छोड़कर जो इस अवधि में स्वर्ग सिधार गए और देश से भगोड़े हैं।

उदाहरण स्वरूप मुख्य अपराधी दाऊद इब्राहिम।

मैं पाठकों को याद दिला दूं कि रघुनाथ मन्दिर पर दोनों हमले, गुजरात में अक्षरधाम पर हमला, यहां तक कि आतंकवादी संसद के दरवाजे तक पहुंच गए, जो सभी भारतीय जनता पार्टी के काल में हुआ।

5 जुलाई 2005 का अयोध्या पर हमला कांग्रेस पार्टी के काल में हुआ। इसके अतिरिक्त कई जगहों पर बम ब्लास्ट दोनों ही पार्टियों के शासनकाल में हुए थे।

हर बार भारत की सभी राजनैतिक पार्टियों ने इनकी निंदा की लेकिन अयोध्या के हमले पर हमारी कुछ राजनैतिक पार्टियों से पहले ही पाकिस्तान ने तत्पर निंदा की।

भाजपा के समय हमलों में विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने भाजपा के किसी बड़े नेता व सरकार से त्यागपत्र की मांग नहीं की थी।

लेकिन भाजपा ने अयोध्या हमले पर गृहमन्त्री से त्याग पत्र की मांग की थी तथा इसी प्रकार दिल्ली में बम ब्लास्ट होने पर की थी।

26-11-2008 को मुम्बई हमले पर तो केन्द्रीय गृहमन्त्री तथा महाराष्ट्र के मुख्यमन्त्री और गृहमन्त्री को त्यागपत्र देने के लिए विवश किया गया और उन्होंने त्यागपत्र दे दिया।

यह सच है कि जिम्मेदारी तो निश्चित होनी चाहिए लेकिन इन हमलों पर राजनीति क्यों ?

साभार

लेखक सीआरपीएफ कमान्डेंट हवासिंह सांगवान 

Randhir Deswal

Hi, I am Randhir Singh a Solo Travel Blogger form Rohtak Haryana. I am a writer of Lyrics and Quotes.

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