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जाट रेजिमेंट और चौधरी छोटूराम

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द्वितीय विश्वयुद्ध के समय जाट रेजिमेन्ट सेन्टर बरेली के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल पोटर साहब जाट सैनिकों से ईर्ष्या एवं द्वेष रखते थे।

अतः उन्होंने जाट सैनिकों को निकालकर उनके स्थान पर अन्य जातियों की भर्ती करने की पुरजोर सिफारिश आर्मी हैडक्वाटर तक कर दी।

        जब यह सूचना

सर छोटूराम 

    • को मिली तब वे लाहौर से 23 सितम्बर, 1943 ई० को बरेली पधारे।

उनके आदेश पर अंग्रेज आफिसरों ने एक दरबार किया जो कि “सर छोटूराम का एक ऐतिहासिक दरबार” कहलाता है।

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इस दरबार में लगभग 25,000 सैनिक उपस्थित थे, जिनमें ब्रिटिश एवं इण्डियन ऑफिसर भी शामिल थे।

इस अवसर पर कर्नल पोटर नहीं था क्योंकि वह तो सर छोटूराम से डरकर छुट्टी ले गया था।

    चौधरी साहब ने सब बातों का सही भेद ले लिया था जिसमें कर्नल पोटर की जाटों के प्रति अन्याय एवं द्रोह की भावना थी।

सर छोटूराम ने वहां अपने अध्यक्षीय भाषण में ब्रिटिश आफिसरों की ओर मुखातिब होकर कहा कि “तुम गोरी छोकरी जाट वीरों को कमाण्ड करने आ गई

जबकि तुमको इनके प्राचीन एवं आधुनिक इतिहास तथा इनकी वीरता के कारनामों का पता नहीं है।

    तुमको जाट भर्ती करने नहीं आते क्योंकि तुमको जाटों की शक्ल, बनावट, डील-डौल, शक्ति तथा निडरता का भेद व पहचान नहीं।

यही कारण है कि तुम जाटों की बजाए युद्ध में डरने वाली जातियों को भर्ती कर लेते हो,

जो समय आने पर डरकर भागते हैं और फिर जाटों को बदनाम करते हो।

    कहां है वह पोटर, उठकर जाटों की गलती तो बताओ?” मगर पोटर तो वहां आया ही नहीं था।

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सर छोटूराम ने वहीं पर निडरता से कह दिया था कि जाटों को कोई नहीं निकाल सकता।

आज से ही कर्नल पोटर किसी भी जाट पलटन में नहीं होगा। उसी समय एक मेजर को कमांड संभालने का आदेश दे दिया।

    • आते व जाते समय उनके स्वागत के लिए अंग्रेज आफिसर, उनको एक खुली जीप में बैठाकर

बरेली

     छावनी से रेलवे स्टेशन तक, उस जीप को रस्सों द्वारा अपने हाथों से खींचकर ले गये थे।

पूरे रास्ते के दोनों ओर, लगभग 2 मील तक, सैनिकों की कतार खड़ी हुई थी जो “सर छोटूराम की जय” के नारे गुंजा रहे थे।

बरेली से सर छोटूराम सीधे दिल्ली पहुंचे और लार्ड वेवल को बड़ी निडरता से ये सब बातें बतलाईं

और लार्ड वेवल से आदेश दिलवाया कि जाटों को जाट रेजिमेन्ट में रखा जायेगा और कर्नल पोटर उन पर कमांड नहीं करेगा।

    कर्नल पोटर तो फिर न जाने कहां गया। यह थी सर छोटूराम की जाटों के प्रति सहानुभूति तथा अंग्रेजों के विरुद्ध निडरता और साहस।

इससे स्पष्ट हो जाता है कि सर छोटूराम अंग्रेजों के दास, पिट्ठू तथा सहायक बिल्कुल नहीं थे।

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वे तो सिद्धान्त के धनी, किसानों, गरीबों और जाट जाति के हितों के रक्षक थे।

इनके हितों के विपरीत होने पर बड़े से बड़े अंग्रेज पदाधिकारी से निडरता से टक्कर लेकर अपनी बात मनवा लेते थे।

यह घटना होने पर कहावत प्रचलित हुई कि “हुक्म जाट का, अंगूठा लाट का।”

तात्पर्य है कि चौ० छोटूराम के आदेशों की स्वीकृति एवं पालन अंग्रेज उच्च पदाधिकारियों को भी करना पड़ता था।

    सर छोटूराम ने उन सैनिकों में से 10 सैनिकों को इशारा कर-करके आगे बुला लिया जिनका आकार जाटों से नहीं मिलता था।

सर छोटूराम ने उनसे उनकी जाति पूछी तो पता लगा कि वे दसों युद्ध में डरनेवाली जातियों के थे।

    इस तरह से आपने अंग्रेज आफिसरों को यह प्रत्यक्ष प्रमाण देकर सबको फटकारा। आपकी तीव्र बुद्धि से सब चकित रह गए।

(यह घटना उन सैनिकों की जबानी है जो उस दरबार में उपस्थित थे, जिनमें से आज भी कई जीवित हैं)।

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पहला महायुद्ध (1914-18) में 6 जाट पल्टन जर्मन सेना के विरुद्ध फ्रांस की भूमि पर लड़ी।

ये जवान शत्रु पर दूर से गोलियां बरसाने की बजाय धावा बोलकर संगीन से हाथों-हाथ युद्ध करना ज्यादा पसन्द करते थे।

    • जब ये जवान

जाट बलवान् जय भगवान्

     का रणघोष बोलकर शत्रु पर धावा करते थे तो जर्मन सेना का दिल दहल जाता था
    और वे मोर्चे छोड़कर भाग भी जाते थे। सबसे निराली और डरावनी इनकी संगीन की लड़ाई थी।

ये धावा बोलकर जर्मन सेना के मोर्चों में कूद पड़ते थे और शत्रु को अपनी संगीन में पिरोकर मोर्चे से बाहर इस तरह से फेंक देते थे जैसे कि किसान अपनी जेली से पूलियों को फेंकता है।

इस 6 जाट पल्टन से जर्मन सेना इतनी भयभीत हुई कि इनके सामने खड़े रहने का साहस छोड़ दिया।

  • पूरे यूरोप में जाटों की बहादुरी की धाक बैठ गई। जर्मन सेना की हार का सबसे बड़ा कारण 6 जाट की अद्वितीय बहादुरी थी।

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भारतीय सेना के ले० जनरल के. पी. कैण्डेय ने सन् 1971 के युद्ध के बाद कहा था – अगर जाट न होते तो फाजिल्का का भारत के मानचित्र में नामोनिशान न रहता ।

 इसी लड़ाई (सन् 1971) के बाद एक पाकिस्तानी मेजर जनरल ने कहा था – चौथी जाट बटालियन का आक्रमण भयंकर था जिसे रोकना उसकी सेना के बस की बात नहीं रही ।

पूर्व कप्तान हवासिंह डागर गांव कमोद जिला भिवानी हरयाणा जो 4 बटालियन की इस लड़ाई में थे,

उन्होंने बतलाया कि लड़ाई से पहले बटालियन कमाण्डर ने भरतपुर के जाटों का इतिहास दोहराया था जिसमें जाट मुगलों का सिहांसन और लाल किले के किवाड़ तक उखाड़ ले गये थे ।

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पाकिस्तानी अफसर मेजर जनरल मुकीम खान पाकिस्तानी दसवें डिवीजन के कमांडर थे ।)

 भूतपूर्व राष्ट्रपति जाकिर हुसैन ने जाट सेण्टर बरेली में भाषण दिया –

जाटों का इतिहास भारत का इतिहास है और जाट रेजिमेंट का इतिहास भारतीय सेना का इतिहास है ।

पश्चिम में फ्रांस से पूर्व में चीन तक ‘जाट बलवान्-जय भगवान्’ का रणघोष गूंजता रहा है ।

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6 जाट के कर्नल साहब एवं जरनलों ने यह कहा कि किस-किस को विक्टोरिया क्रास दिलायें, 6 जाट के सब जवान ही विक्टोरिया क्रास के हकदार हैं।”

सन् 1962 ई० में हुए भारत-चीन युद्ध में 5वीं जाट बटालियन लद्दाख की सीमा पर चीनियों से युद्ध कर रही थी।

इन जाट जवानों ने चीनियों के बड़े-बड़े शक्तिशाली आक्रमणों को असफल कर दिया और अपनी सरहद में न घुसने दिया।

इस अवसर पर मेजर जनरल श्योदत्तसिंह साहब ने 5वीं जाट पल्टन के दरबार में हार्दिक बधाई देते हुए कहा कि

“इस लद्दाख क्षेत्र में चीनियों के बड़े पैमाने पर किए गए खूंखार व पुरजोर आक्रमणों को आपकी जाट प्रसिद्ध बहादुर पल्टन ने पूरी तरह असफल किया।

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जाट बड़ी बहादुरी से लड़े।” जनरल साहब ने दूसरे महायुद्ध में फील्ड मार्शल रोमेल साहब द्वारा जाटों की बहादुरी की सराहना करने की याद दिलाते हुए कहा

  • “The Great Rommel has said, in North Africa the Jats were among the best fighters in defence.”
    अर्थात् “महान् रोमेल ने कहा था कि उत्तरी अफ्रीका में जमकर लड़ने में जाट अच्छे लड़ाका हैं।”
    जनरल साहब ने कहा कि “सचमुच वे बहादुर थे, जैसा कि उन्होंने लद्दाख में भी दिखा दिया है।”

एक बार भारत के भूतपूर्व प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू ने विदेशियों की इस बात के कहने का कि “भारतीय सेना से चीनी सेना अधिक शक्तिशाली है” उत्तर दिया था कि

“चीनी ऐसे बहादुर थे तो लद्दाख के मोर्चों व चुशूल हवाई अड्डे को क्यों नहीं जीत लिया?

हमारे बहादुर जवानों ने इनके दांत खट्टे कर दिए थे।”

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3 नम्बर जाट बटालियन का डोगराई पर अधिकार – डोगराई गांव में पाकिस्तान के लगभग एक ब्रिगेड का जमाव (defence) था।

उन्होंने चारों ओर कांटेदार तार एवं बारूदी सुरंगें लगा रखी थीं और 18 मशीनगनें (M.M.G.), 6 पेटन टैंक एवं भारी तोपें लगाईं थीं।

3 जाट पलटन ने 21-22 September 1965 ई० को डोगराई पर रात के समय अपना युद्धघोष जाट बलवान जय भगवान् बोलकर धावा बोल दिया।

गोलियों की वर्षा व तोपों के गोलों की परवाह न करते हुए शत्रु के मोर्चों पर टूट पड़े।

हाथों हाथ संगीनों की लड़ाई में ऐसे पैंतरे दिखाए कि दुश्मन का दिल दहल गया।

पाकिस्तानी सेना जाटों से इतनी भयभीत हुई कि मोर्चे छोड़कर भाग गई या शस्त्र डालकर बहुत से कैदी हो गये और काफी मारे गये।

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सब सामग्री, 3 जाट पलटन के हाथ आई। इस पलटन ने भारतीय तिरंगा झण्डा इच्छोगिल नहर पर पहरा दिया।

एक पलटन द्वारा इतना शक्तिशाली शत्रु का मोर्चा जीतने की ऐसी मिसाल संसार में कोई भी न मिलेगी।

डोगराई की विजय पर प्रधानमन्त्री लालबहादुर शास्त्री जी, रक्षामंत्री श्री यशवन्तराव चव्हाण,

चीफ आफ आर्मी स्टाफ जनरल जे० एन० चौधरी, ब्रिगेडियर रणसिंह अहलावत ,

ले० जनरल हरबख्शसिंह आदि ने स्वयं पधारकर बटालियन को शाबासी व हार्दिक बधाई दी।

बाद में महाराष्ट्र, मैसूर, पंजाब और मध्यप्रदेश के गवर्नर भी पधारे थे।

इस अवसर पर ले० जनरल हरबख्शसिंह साहब ने अपने भाषण में कहा था कि

“आप की 3 जाट बटालियन ने एक महान् जीत प्राप्त की है जो ऐसी किसी पलटन ने नहीं की।

इसके लिए पूरे भारतवर्ष को गौरव है।”

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3 जाट बटालियन के डाक्टर एस० जी० रेड्डी के अनुसार – “घायल जाट जवानों को मरहम पट्टी करते समय मैंने किसी को ‘आह’ कहते हुए कभी नहीं सुना।”
पाकिस्तानी कैदी ले० कर्नल गोलवाला के शब्दों में – “जाटों को रोकना हमारे लिए असम्भव था।”

जाटों का आदर्श वाक्य (Motto) है कि “जब तक जीवन है, वीरता से रहना और जब मृत्यु आए तो हंसते-हंसते मरना।

मृत्यु आए तो युद्ध में आए जिससे हम स्वर्ग में जायें जबकि बिस्तर पर पड़कर मरने से तो नरक मिलेगा।”

विदुर नीति में भी लिखा है कि “अपने देश की रक्षा के लिए शत्रु से लड़ते-लड़ते मरने वाले वीर को स्वर्ग प्राप्त होता है।”

जाट शब्द का मन में विचार आते ही या सुनते ही जाटवीर की चालढाल देखकर प्रत्येक मनुष्य को सहज ही बोध हो जाता है कि वास्तव में जाट एक कुशल योद्धा, निडर तथा वीर सैनिक, साहसी, परिश्रमी, चरित्रवान और देशभक्त नागरिक है।

इसमें तलवार चलाने व हल चलाने की समान चतुराई है। जाटवीरों के एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में हल की मूठ (हथेहली) रहती है।

प्राचीनकाल में जाटवीरों ने तीर व तलवार का बल दिखाकर और हल चलाकर एशिया और यूरोप की भूमि पर,

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पूर्व में मंगोलिया और चीन, पश्चिम में स्पेन और इंग्लैण्ड, उत्तर में स्कैण्डेनिविया और नौवोगोर्ड

और दक्षिण में भारतवर्ष, ईरान और मिश्र की भूमि पर जाट बलवान्, जय भगवान् का रणघोष लगाकर अपने नाम की प्रसिद्धि की।

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Randhir Deswal

Hi, I am Randhir Singh a Solo Travel Blogger form Rohtak Haryana. I am a writer of Lyrics and Quotes.

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