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हिन्दू धर्म और इस्लाम धर्म कितने प्राचीन और उनमें आपसी क्या विवाद है?

HINDU धर्म और ISLAM धर्म कितने प्राचीन और उनमें आपसी क्या विवाद है?

सम्पूर्ण प्राचीन भारतीय साहित्य में कहीं भी HINDU शब्द या HINDU धर्म का उल्लेख नहीं है।

सम्राट अशोक के शासक पुत्र बृहद्रथ बौद्ध राजा की हत्या उसी के विश्वासपात्र सेनापति पुष्यमित्र ब्राह्मण ने धोखे से की थी और उसके बाद उसने ब्राह्मण धर्म को राजकीय धर्म बनाया।

पुष्यमित्र शुंगवंशी ब्राह्मण थे। इनके वंशज द्युमत्सेन तथा शशांक आदि बहुत ही कट्टरपंथी शासक हुए जिन्होंने बौद्ध धर्म के विरोध में अर्थात् इसे पीछे छोड़ने के लिए अपने शासनकाल में ब्राह्मण साहित्य की रचना करवाई जो आज पुराणों, स्मृतियों व अन्य धार्मिक ग्रन्थों के रूप में जाने जाते हैं।

HINDU

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जिसका एक ही उद्देश्य था कि भारत से बौद्ध धर्म को पूर्णतया समाप्त कर दिया जाए और वे इस कार्य में सफल भी हुए।

इतिहासकारों का स्पष्ट मत है कि बौद्धकाल में सम्पूर्ण भारत में गणतान्त्रिक शासन व्यवस्था थी लेकिन ब्राह्मणराज में तथा बाद में राजपूत राजाओं ने एकतंत्र राज्यों की स्थापना की।

इन पुराणों और स्मृतियों में भी HINDU धर्म का प्रयोग नहीं है लेकिन बाद में इनके भाष्यों तथा टीका-टिप्पणियों में हिन्दू शब्द या धर्म को घसीटा गया है।

पुराणों में सबसे प्राचीन पुराण स्कन्द पुराण को बतलाया गया है जो लगभग 1200 वर्ष पुराना है। इससे पहले केवल तीन वेदों की रचना की गई थी तथा चौथा वेद इसके बाद लिखा गया।

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इन वेदों में कहीं भी HINDU शब्द या धर्म का नाम नहीं है। इन पुराणों में सत्य कम असत्य ज्यादा लिखा गया है जिसको कई इतिहासकारों ने माना है।

स्वामी दयानन्द जी ने पुराणों को सिरे से नकार दिया और इन्हें गपोड़ कहा। इसी प्रकार भारत का प्राचीन इतिहास रहा लेकिन कहीं भी HINDU शब्द या HINDU धर्म का नाम नहीं।

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इसलिए हमें इन तथ्यों को जानने के लिए लगभग 1600 वर्ष पूर्व चीनी यात्री फाह्यान के यात्रा वृत्तान्त की ओर लौटना होगा जिसने सन् 399 से सन् 414 तक भारत की यात्रा की।

हालांकि उसकी यात्रा का मुख्य उद्देश्य बौद्ध धर्म का अध्ययन करना था। लेकिन फिर भी उसने भारत में धार्मिक, आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था पर बेबाक टिप्पणियां की हैं जिसमें उसका कोई स्वार्थ या पक्षपात प्रतीत नहीं होता और न ही उसे ऐसा करने की आवश्यकता थी।

उन्होंने अपना लेखन चीनी भाषा में किया जिसका अंग्रेजी और दूसरी भाषाओं में अनेक इतिहासकारों ने अनुवाद किया जिनमें से एक महत्त्वपूर्ण लेखक और इतिहासकार जैम्स लिग्गी का अंग्रेजी में अनुवाद उपलब्ध है जिसका संक्षेप में हिन्दी अनुवाद इस प्रकार है-

फाह्यान ने अफगानिस्तान से होकर स्वात घाटी में प्रवेश किया। वहां से पेशावर पहुंचा। इसके बाद चलकर मथुरा पहुंचा, जिसे उसने मोरों का शहर लिखा है।

HINDU

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वहां से वह बनारस गया उसके बाद वह पटना व बौद्धगया में गये। लगभग 14 वर्ष तक इस क्षेत्र में भ्रमण किया और अध्ययन करता रहा। इसके बाद वह सीधा श्रीलंका पहुंचा जहां से समुद्र के रास्ते अपने वतन चीन पहुंच गया।

अनुवादक जेम्स लिग्गी स्वयं एक इतिहासकार थे, ने अफगानिस्तान से लेकर बनारस तक के क्षेत्र को जट-जट्टु का क्षेत्र – अर्थात् जाट बाहुल्य क्षेत्र लिखा है । उस समय तक राजपूत जाति का उद्भव नहीं हुआ था।

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उसने अफगानिस्तान से लेकर बौद्ध गया तक के क्षेत्र में बौद्ध विहारों का वर्णन किया है जहां इनमें हजारों हजार बौद्ध भिक्षु रहते थे। जहां की स्थानीय जनता स्वेच्छा से भिक्षुओं के लिए राशन पानी का प्रबन्ध करती थी।

इस क्षेत्र में कहीं भी जीव हत्या नहीं होती थी, नशे का नाम तक नहीं था केवल चाण्डाल जाति के लोग मच्छी पकड़ते थे जिन्हें धीरे-धीरे पुजारी बनाया जा रहा था।

  • हर तरफ खुशहाली थी।
  • लोग घी दूध का अधिक प्रयोग करते थे।

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इस क्षेत्र में कुछ लोग वैष्णव पंथ को मानने वाले थे। फाह्यान ने इसे धर्म नहीं, पंथ लिखा हैं। कहीं-कहीं ब्राह्मण थे जो छोटे-छोटे मन्दिरों में पूजा किया करते थे, जिसे उसने केवल ब्राह्मणवाद ही कहा है। अनुवादक ने अंग्रेजी में ‘Heretics Brahmans’ अर्थात् ‘विधर्मी ब्राह्मण’ बतलाया है।

अनुवादक ने धर्म के आधार पर लोगों की जनसंख्या लिखी है जिसमें HINDU न लिखकर ब्राह्मणवादी लिखा है। वैष्णव, बौद्धों तथा जैनियों की जनसंख्या अलग-अलग बतलाई है।

मथुरा, बनारस, पटना और गया आदि को बौद्ध धर्म के केन्द्र लिखा है। अपने इस चौदह वर्ष के प्रवास के दौरान फाह्यान कभी भी अयोध्या नहीं गया जिससे प्रतीत होता है कि उस समय अयोध्या का कोई महत्त्व नहीं था।

हालांकि आज भी अयोध्या में बौद्ध धर्म व उसके मठों के अवशेष देखे जा सकते हैं। इससे स्पष्ट है कि उस समय तक उत्तर भारत में HINDU और HINDU धर्म का कोई प्रचलन नहीं था। दक्षिण भारत का फाह्यान ने कोई उल्लेख नहीं किया।

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तो फिर HINDU धर्म व शब्द का प्रचलन कैसे हुआ?

उच्चारण भेद के कारण हम एक ही शब्द को अलग-अलग जगह में उसका अलग-अलग उच्चारण करते हैं।

उदाहरणार्थ छोटे से राज्य हरियाणा में ‘कहां’ शब्द का रोहतक क्षेत्र में ‘कड़ै’, अहीरवाल क्षेत्र में ‘कठै’, भिवानी क्षेत्र में ‘कित’, तथा हिसार क्षेत्र में ‘कड़ियां’ बोला जाता है।

यही शब्द पंजाब में ‘कित्थे’ तथा जम्मू व हिमालच क्षेत्र में ‘कुत्थे’ हो जाता है। इसी प्रकार हमारे देश के उत्तर पूर्वी राज्यों में ‘ट’ अक्षर की जगह ‘त’ इस्तेमाल किया जाता है और ये ट्रेन (रेलगाड़ी) को ‘त्रेन’ बोलते हैं।

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इसी प्रकार बिहार के मैथिली क्षेत्र में ‘ड़’ की जगह ‘र’ बोला जाता है तो दक्षिण के मालाबार क्षेत्र में ‘ज’ की जगह ‘श’ का प्रयोग होता है।

फाह्यान यात्री ने स्वयं सिंधु नदी का उच्चारण सिन्थु Shin-thu तथा यमुना नदी को ‘फुहा’ Poo-ha लिखा है।

चीनी लोग भारत को सिन्थु देश ही कहते हैं। इसी प्रकार अरबी उच्चारण में ‘स’ की जगह ‘ह’ का इस्तेमाल होता है।

इसी प्रकार ‘सप्ताह’ और ‘हफ्ता’ उच्चारण भेद है जो इसका प्रमाण है।

इसलिए अरबवासी सिंधु नदी को HINDU नदी बोलते थे। इसी प्रकार इस नदी के क्षेत्र में रहने वाले लोगों को भी HINDU कहा जाने लगा। इसलिए एक प्राचीन कहावत बनी-

हर कोस-कोस पर बदले पानी।

हर बीस कोस पर बदले वाणी।।

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इस समय तक इस क्षेत्र में केवल बौद्ध धर्मी, जैन धर्मी, वैष्णव पंथी तथा ब्राह्मण पंथी लोग ही रहते थे। जब बौद्ध धर्म धीरे-धीरे लुप्त होता गया या किया गया तो इन ब्राह्मणपंथी व वैष्णव पंथियों को HINDU कहा जाने लगा।

इसी प्रकार उसी ब्राह्मण साहित्य और ब्राह्मण धर्म को HINDU कहा जाने लगा। इसी बीच वैदिक काल को भी ब्राह्मण धर्म से जोड़ दिया गया। वरना वैदिक धर्म ब्राह्मणवाद से भिन्न था।

इस प्रकार HINDU शब्द को सिंधु शब्द से अपहरण करके सम्पूर्ण हिन्दुत्व तैयार हुआ और यह सभी इस्लामधर्मी आक्रमणकारी आने के बाद फैला।

लगभग 1500 वर्ष पहले इस्लाम धर्म का जन्म अरब में हो चुका था तथा हजरत मोहम्मद साहब इसके पहले पैगम्बर थे।

इस धर्म की विचारधारा चाहे कितनी भी सरल और स्पष्ट क्यों न हो, लेकिन खलीफाओं ने इस विचारधारा को एक मिशनरी के तौर पर कम तथा तलवार के बल पर अधिक फैलाने का प्रयास किया |

जो तरीका यूरोप में पूर्णतया असफल रहा लेकिन मध्य एशिया, सिंध तथा कुछ सीमा तक भारत में सफल रहा।

इसमें सबसे बड़ी कठिनाई यह रही कि खलीफाओं में श्रेष्ठता के लिए आपस में भयंकर युद्ध होते रहे।

सिंध और पश्चिमी पंजाब के जाटों ने ब्राह्मणवादी कट्टर नीति और अंधविश्वासी विचारधारा के कारण तथाकथित HINDU धर्म (ब्राह्मणपंथ) को छोड़कर इस्लाम धर्म अपनाया, जिनके साथ कुछ अन्य जातियों ने भी इसे अपना लिया।

HINDU

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इसके बाद शेष भारत में भी कुछ लोगों ने इसे डर और लालच में भी अपनाया जैसे कि काश्मीर आदि में। जाटों ने इस धर्म को डर और लालच में कभी नहीं अपनाया बल्कि कट्टर ब्राह्मणवादी व पाखण्डी विचारधारा के कारण अपनाया।

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इसका दूसरा कारण जाट मूर्तिपूजक नहीं था तथा ईश्वर की निराकार एकेश्वर शक्ति में विश्वास रखता था जो इस्लाम धर्म की विचारधारा से मेल खाती थी।

इसी कारण पूर्वी पंजाब में जाटों ने पाखण्डी विचारधारा के विरोध में सिख धर्म को अपनाया। क्योंकि गुरु नानक जी की विचारधारा स्पष्ट तौर पर पाखण्डवाद और भेदभाव के विरुद्ध थी और जहां तक यह विचारधारा पहुंच पाई उसे खुले दिल से अपनाया गया।

HINDU

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शेष भारत के जाट काफी समय तक बौद्ध धर्म को समाप्त होने पर भी उसी विचारधारा अनुसार चलते रहे।

जब जाटों ने पाखण्डवादी विचारधारा के विरुद्ध स्वामी दयानन्द को पाया तो जाट उनके साथ हो लिए और आर्यसमाजी कहलाए।

जबकि जाट स्वामी जी के पूर्ण उद्देश्य को नहीं समझ पाए क्योंकि ये आर्यसमाज परिष्कृत ब्राह्मणवाद या हिन्दूवाद ही था।

यदि ऐसा नहीं था तो फिर स्वामी जी के विरोध के बावजूद HINDU शब्द को क्यों अपनाया गया?

हालांकि मूलरूप से इस आर्यसमाज का धर्म भी वैदिक धर्म रहा है, जो पाखण्डवाद और पुराणवाद का विरोधी था।

लेकिन यही आर्यसमाज वैदिक धर्म को अलग से स्थापित करके मान्यता नहीं दिलवा पाया जिस कारण जाट बीच मंझधार में ही फंस गए।

इसलिए आज ये शेष जाट न तो वैदिक रहा और न ही ब्राह्मणवादी अथवा न HINDU। इसी कारण आज इन जाटों को इसी ‘हिन्दू कोड’ (HINDU मैरिज एक्ट 1955) के कारण गौत्र विवाद में अपमानित होना पड़ रहा है।

यह ऐतिहासिक दस्तावेजों से स्पष्ट है कि जाट न तो HINDU हैं और न ही वर्ण व्यवस्था के आधीन।

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जैन धर्म और बौद्ध धर्म ढाई हजार वर्ष प्राचीन और समकालीन हैं। ईसाई धर्म को आज 2018 साल पूरे होने वाले हैं जबकि इस्लाम धर्म और यहूदी धर्मों को 1500 वर्ष हो चुके हैं।

लेकिन यहूदी अपने धर्म को ईसाई और इस्लाम से पुराना तथा इन धर्मों का जनक मानते हैं। वैष्णव धर्म तथा ब्राह्मण धर्म समकालीन हैं

और HINDU कहा जाने वाला धर्म इन्हीं की उपज है जो केवल सिख धर्म से पुराना है इसलिए इसे सनातन धर्म (प्राचीन धर्म) कहना उचित नहीं।

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वैसे देखा गया है कि मन्दिरों में पुजारी भेंट की जगह भिक्षा मांगते हैं जो अन्य किसी धर्म में इतना भिखारीपन नहीं है।

जहां तक दोनों धर्मों के आपसी विवाद की बात है, ऐसे दस्तावेज कहीं उपलब्ध नहीं हैं कि इनमें आपस में कभी धर्म के नाम से कोई लड़ाई लड़ी गई हो।

औरंगजेब को एक कट्टर मुस्लिम के नजरिये से देखा जाता है लेकिन जब हम इतिहास में झांक कर देखते हैं तो पाते हैं कि

जब वह सत्ता के लिए अपने भाई दाराशिकोह से लड़ा जो एक सर्वविदित हिन्दू-परस्त था, के साथ HINDU कहे जाने वाले राजा उसके साथ न होकर औरंगजेब के साथ थे और उनके सेनापति भी थे।

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इसी प्रकार हम देखते हैं कि जब सन् 712 में बिन-कासिम ने सिंध पर धावा बोला तो उसकी जीत का श्रेय मंत्री ज्ञानबुद्ध ब्राह्मण HINDU को जाता है।

मो० गजनी का सेनापति तिलक ब्राह्मण था तो पानीपत की पहली लड़ाई में बाबर का साथी रैमीदास ब्राह्मण था (विदेशी इतिहासकारों ने इसे नाई भी लिखा है)।

इसी लड़ाई में इब्राहिम लोधी के साथ राजा राणा सांगा था। जब अकबर ने महाराणा प्रताप पर चढ़ाई की तो जयपुर के राजपूत राजा मानसिंह तथा स्वयं राणा प्रताप का सगा भाई शक्तिसिंह अकबर के साथ थे। लेकिन राणा प्रताप का सेनापति हाकिम सूर मुस्लिम धर्मी था।

औरंगजेब और शिवाजी के युद्ध में राजपूत राजा जसवंत और जयसिंह औरंगजेब के सेनापति थे। लेकिन शिवाजी के तोपखाने का सेनापति मुकीन पठान मुस्लिम धर्मी था।

इसी प्रकार महाराजा रणजीत सिंह तथा महाराजा सूरजमल की सेनाओं में एक तिहाई सैनिक और ओहदेदार मुस्लिम धर्मी थे।

इस प्रकार के अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं जिनसे स्पष्ट होता है कि कभी कोई HINDU मुस्लिम संघर्ष नहीं था ये केवल सत्ता के लिए संघर्ष थे जो हमेशा चलते रहे।

यदि वास्तव में देखा जाए तो राम जन्मभूमि उर्फ बाबरी मस्जिद संघर्ष भी सत्ता का ही संघर्ष है, इसके अतिरिक्त कुछ नहीं।

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इसलिए तो भारतीय जनता पार्टी जो पहले कहा करती थी कि राम मन्दिर बनाने के लिए वे हर तरह की कुर्बानी देंगे

लेकिन सत्ता में आते ही उन्होंने कहना शुरू कर दिया कि इसके लिए हम अपनी सत्ता को कुर्बान नहीं कर सकते और रामजन्मभूमि का मसला न्यायालय के सुपुर्द कर दिया।

HINDU व मुस्लिमधर्मियों में कभी भी धर्म के लिए कोई लड़ाई नहीं लड़ी गई जबकि प्रथम स्वतन्त्रात संग्राम 1857 में HINDU मुसलमान दोनों ने ही कंधे से कंधा मिलाकर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी।

इसी कारण अंग्रेजों ने इनमें फूट डालने के लिए यह खुराफात की। इसी का परिणाम है कि पहली बार सन् 1915 में हिन्दुओं ने अपनी HINDU महासभा बनाई।

सन् 1925 में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आर.एस.एस.), सन् 1951 में जनसंघ, सन् 1964 में विश्व हिन्दू परिषद्, सन् 1966 में शिव सेना, सन् 1980 में भाजपा और सन् 1984 में बजरंग दल की स्थापना की गई।

इस प्रकार हम देखते हैं कि हिन्दुओं के सम्पूर्ण संगठन अंग्रेजी काल या उसे बाद बने हैं, यही इसके प्रमाण हैं।

उपरोक्त तथ्यों से यह स्पष्ट हो जाता है कि HINDU धर्म सनातन धर्म नहीं है और न ही कभी HINDU धर्म और ISLAM धर्म में विवाद था।

लेख आधार पुस्तक ;

Randhir Deswal

Hi, I am Randhir Singh a Solo Travel Blogger form Rohtak Haryana. I am a writer of Lyrics and Quotes.

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