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Mahendra Singh Tikait

baba Mahendra Singh Tikait उत्तर प्रदेश के किसानों का एक लोकप्रिय नेता थे।

baba रघुवंशी गोत्र में पैदा हुए जाट थे और जो कि बालियान खाप के प्रमुख थे |

उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर के गांव सिसोली के निवासी थे |

टिकैत उपाधि के रूप में 7 वीं शताब्दी में थानेसर, सम्राट हर्षवर्धन बैंस द्वारा बालियान खाप के प्रमुख को प्रदान किया गया था।

सम्राट हर्षवर्धन बैंस के समय से ‘टिकैत’ शीर्षक उनके नाम के साथ, पीढ़ियों तक खाप के चौधरी का उपयोग होता आया है।

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पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसानों के लिए 2 चेहरे ऐसे हैं जो अविस्मरणीय हैं।

चौधरी चरण सिंह अगर किसानों के राजनीतिक मसीहा थे तो चौधरी टिकैत प्रदेश के किसानों के आम मसीहा थे।

महेंद्र सिंह टिकैत ने जीवन भर किसानों के हितों का संघर्ष जारी रखा। एक वक्त वह भी था, जब वोट क्लब हुक्का क्लब में बदल गए थे।

baba टिकैत ने राजनीति को प्रभावित करते हुए भी खुद को हमेशा इससे दूर रखा।

टिकैत पिछले क़रीब 25 सालों से किसानों की समस्याओं को जोर शोर से उठाया था |

विशेष कर पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा के जाट किसानों में उनकी साख थी।

उनका दल “भारतीय किसान यूनियन” एक गैर राजनीतिक दल माना जाता हैं।

चौधरी टिकैत का जन्म मुजफ्फरनगर जिला के सिसौली गाँव में 6 अक्टूबर सन 1935 ई. को स्व.चौधरी चौहल सिंह के घर हुआ था।

इनके पिता जाटों की बालियान खाप के मुखिया और अपने क्षेत्र के सम्मानित व्यक्ति थे।

हम पढ़ रहे है baba Mahendra Singh Tikait

सन 1943 ई. में मात्र 8 साल की उम्र में अपने पिता के देहांत के बाद चौधरी टिकैत अपनी खाप की गद्दी संभाली।

  • किसी भी खाप के मुखिया को खाप के बाकी लोग baba कहते हैं।
  • बाबा शब्द जाट समाज में सम्मान का प्रतीक हैं।
  • इस प्रकार चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत baba टिकैत” भी कहलाते हैं।

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सन 1986 ई. जब किसानों के मसीहा चौधरी चरण सिंह का देहांत हुआ तो

चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत किसानों की आवाज बनकर उभरे। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान उनमे अपना मसीहा देखने लगे।

चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के किसानों के बीच बढ़ते असर का अनुमान सरकार को तब हुआ

जब baba टिकैत ने दिसंबर 1986 में ट्यूबवेल की बिजली दरों को बढ़ाए जाने के ख़िलाफ़ मुज़फ्फरनगर के शामली से एक बड़ा आंदोलन शुरु किया था।

इसी आंदोलन के दौरान एक मार्च 1987 को किसानों के एक विशाल प्रदर्शन के दौरान पुलिस गोलीबारी में दो किसान और पीएसी का एक जवान मारा गया था। इस घटना के बाद बाबा टिकैत राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आए।

उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरबहादुर सिंह ने चौधरी टिकैत की ताकत को पहचाना

और खुद सिसौली गांव जाकर किसानों की पंचायत को संबोधित किया और राहत दी।

इसके बाद से ही baba टिकैत पूरे देश में घूम घूमकर किसानों के लिए काम किया।

उन्होंने अपने आंदोलन को राजनीति से बिल्कुल अलग रखा और कई बार राजधानी दिल्ली में आकर भी धरने प्रदर्शन किए।

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baba Mahendra Singh Tikait

baba टिकैत ने चौधरी साहब के बाद मंद पड़े किसान आन्दोलन को नयी धार दी और ऐसी गति प्रदान की,

कि राज्य सरकार से लेकर केंद्र सरकार तक किसानों की ताक़त के आगे नतमस्तक हो गयी।

जब भी किसानों के मुद्दे पर सरकार से लोहा लेने की बात आई, चौधरी टिकैत हमेशा आगे रहे।

सन 1988 का मेरठ मार्च हो या 110 दिन लम्बा चलने वाला रजबपुर सत्याग्रह हो। baba टिकैत ने सरकार की नींव हिलाकर रख दी।

चौधरी टिकैत ने किसानों की उन समस्याओं को उठाया जो सरकार को बहुत छोटी लगती थी, जैसे बिजली, पानी, खाद इत्यादि।

चौधरी टिकैत ने हमेशा किसानों के हित को सर्वोपरि रखा चाहे वो किसान की काश्तकारी से जुड़े मुद्दे हो या भूमि अधिग्रहण का मुद्दा।

baba टिकैत खेती में कॉर्पोरेट संस्कृति के महाविरोधी थे। भूमि अधिग्रहण के मुद्दे पर टिकैत कहते थे कि :-

किसान का रोजी रोटी का सवाल सिर्फ ज़मीन से हैं। जरूरत में तो हाथ की रोटी भी दी जा सकती हैं पर जोर जबरदस्ती से कोई किसान की ज़मीन नही ले सकता।

अधिग्रहण के क़ानून में बदलाव होना चाहिए कि ज़मीन देने में किसान ख़ुशी से रजामंद हो

और उसे अपनी ज़मीन की वाजिब कीमत मिले जिससे उसका और उसके बच्चों का भविष्य सुधर सके।”

baba Mahendra Singh Tikait

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चौधरी टिकैत ने किसानों के लिए बहुत सी लड़ाई लड़ी हैं, लेकिन कभी सरकार के अन्याय के सामने घुटने नहीं टेके।

यह baba टिकैत का ही दम-ख़म था कि मुख्यमंत्री और मंत्री दिल्ली और लखनऊ से निकलकर उनके दरवाजे पर ख़ुद सिसौली आते थे।

वह किसान नेताओं और किसान दलों की एकजुटता के पक्षधर थे। कई बार ऐसे मौके आये कि उन्होंने सभी किसान नेताओं को एक मंच पर इक्कठा किया।

मुख्यमंत्री हो या प्रधानमंत्री चौधरी टिकैत के हुक्के की गडगडाहट से सभी भली भांति परिचित थे।

बाबा टिकैत ने सिर्फ किसानों या जाटों के मुद्दे ही नहीं उठाये बल्कि वह क्षेत्र में सामजिक एकता के भी पक्षधर थे।

सन 1989 में भोपा क्षेत्र की मुस्लिम युवती नईमा के इन्साफ के लिए उनके द्वारा चलाये गये आन्दोलन ने देश की राजनीति में भूचाल ला दिया था।

अपने आंदोलनों के चलते कई बार चौधरी टिकैत जेल भी गए पर उनकी ताक़त कम होने की बजाय हमेशा बढती ही रही और सरकार को हमेशा उनके आगे झुकना पड़ा।

baba Mahendra Singh Tikait

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आन्दोलन के साथ ही साथ टिकैत को कई बार आरोपों और विवादों का सामना भी करना पड़ा

पर अपने करिश्माई व्यक्तित्व के कारण उनके विरोधियों को हमेशा पीछे हटना पड़ा।

इतने बड़े किसान नेता चौधरी टिकैत सरल स्वभाव के थे और अपनी देहाती शैली के कारण क्षेत्र में उनकी अलग पहचान थी।

कई बार तो उनकी सरलता के कारण उन्हें विवादों में रहना पड़ा।

सन 2008 में मायावती से हुए विवाद से जहाँ वह राष्ट्रीय मीडिया और सरकार के निशाने पर आ गये थे

वही उनके समर्थकों के अपार समर्थन से वह न सिर्फ पूरे मामले से बाहर आये बल्कि उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती को पीछे हटना पड़ा था।

सन 2010 में टप्पल में किसानों की भूमि अधिग्रहण को लेकर लड़ी गयी लड़ाई उनकी अंतिम लड़ाई थी।

76 साल की उम्र में केंसर से पीड़ित होते हुए भी बाबा टिकैत अंतिम दिनों तक टप्पल में किसानों के संघर्ष में कदम से कदम मिलते रहे।

15 मई 2011 में मुज़फ्फरनगर में baba टिकैत का देहांत हो गया।

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baba Mahendra Singh Tikait

उनकी मृत्यु से उत्तर प्रदेश के किसानों का मसीहा छिन गया और क्षेत्र में किसान की आवाज बुलंद करने वाला कोई नहीं रहा।

आज क्षेत्र का किसान अपने वजूद की तलाश में प्राकृतिक और राजनीतिक हर ओर से छला जा रहा हैं और आत्महत्या करने को मजबूर है।

अगर आज baba चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत होते तो क्या किसान इस कगार पर खड़े होते?

Randhir Deswal

Hi, I am Randhir Singh a Solo Travel Blogger form Rohtak Haryana. I am a writer of Lyrics and Quotes.

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