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Ram Sarup Joon | a Jat historian | author of book History of the Jats

Ram Sarup Joon | a Jat historian |  author of book History of the Jats
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Ram Sarup Joon Jat historian जिला झज्जर हरियाणा से प्रतिष्ठित जाट इतिहासकार थे। वह History of the Jats पुस्तक के लेखक हैं |

Ram Sarup Joon Jat historian

प्रारंभिक जीवन Ram Sarup Joon Jat historian

उनका जन्म हरियाणा के झज्जर जिले के गांव नुना माज़रा में हुआ था। Ram Sarup Joon Jat historian लिखते हैं कि सन 1900 में ग्यारह वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी पढ़ाई शुरू की थी | जब उनके क्षेत्र में पहला स्कुल खोला गया था ।

उन्होंने 1938 में उर्दू में “जाटों का इतिहास” लिखा था, जिसका अनुवाद 1967 में अंग्रेजी में किया गया । अंग्रेजी संस्करण का अनुवाद उनके पुत्र लेफ्टिनेंट कर्नल दल सिंह, कुमाऊं रेजिमेंट ने किया गया था।

वह भारतीय सेना में थे और उनके पुत्र मेजर रिसाल सिंह भी भारतीय सेना की 3/9 जाट रेजिमेंट में थे, जिन्हें 1938 में नियुक्त किया गया था। उनके पुत्र मेजर रिसाल सिंह का निधन 21 जून 1940 को इम्फाल-कोहिमा में लड़ते हुए हो गया था |

सेना में Ram Sarup Joon Jat historian

Ram Sarup Joon Jat historian लिखते हैं कि 1935-36 के दौरान, जब ब्रिटिश जाटों की सैनिक सेवाओं को भूलने लगा था, तो सेना के सदस्यों को आर्य समाज के विचारों से दूर करने के लिए एक गुप्त सर्कुलर जारी किया गया और यह स्वाभाविक रूप से वैदिक पृष्ठभूमि के जाटों पर लागू होता था क्योंकि मुस्लिम और सिख जाटों में कोई आर्य समाज नहीं था।

उस समय मैं जाट स्क्वाड्रन का वरिष्ठ जेसीओ था और मैंने तब किंग जॉर्ज के लांसर्स में रिसलदार मेजर का कार्यभार संभाला हुआ था।

कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल आर. डोनिंग ने मुझे फोन किया और कहा, “मैं चाहता हूं कि आप मुझे सभी आर्य समाजी विचारों वाले सैनिकों की सच्ची लिस्ट दें। मुझे पूरा भरोसा है कि आप मुझे सही सूची देंगे।

हम पढ़ रहे है Ram Sarup Joon Jat historian

  • तब मैंने जवाब दिया “महोदय मैं आपको सभी नाम दूंगा,
  • परन्तु आप निराश ही होंगे क्योंकि
  • बेशक मुझ पर आप पूर्ण विश्वास रखते हैं,
  • पर जब से भले ही मैं सेना में शामिल हुआ
  • Ram Sarup Joon Jat historian
  • तब से मैं खुद भी एक कट्टर आर्य समाजी रहा हूँ |

जाट स्क्वाड्रोन में सभी व्यक्ति आर्य समाजी हैं और मुझे यकीन है कि भारतीय सेना में जितने भी जाट हैं सभी के सभी आर्य समाजी ही है इसके लिए कोई लिस्ट बनाने की जरूरत नही है | आप जिस जाट से मिलोगे वह आपको आर्य समाजी विचारधारा का ही मिलेगा | लेकिन वे पूरी तरह से अपनी डयूटी के प्रति वफादार हैं |

  • कमांडिंग ऑफिसर ने बहुत क्रोध में होकर कहा
  • ‘मैं बहुत ज्यादा सच्चाई नहीं सुनना चाहता था
  • और सर्कुलर के लिए उन्होंने खुद ही जवाब भेजा
  • कि जाट रेजिमेंट में कोई आर्य समाजी नहीं है ।
  • Ram Sarup Joon Jat historian

Ram Sarup Joon Jat historian आगे लिखते हैं कि जून 1951 में, मैं अपने दोस्त रिसलदार हरनारायण सिंह के साथ मेरे बेटे दल सिंह की परेड देखने के लिए देहरादून गया था ।

जनरल के.एस. थिममैया, जो वहां कमांडेंट थे, उन्होंने सभा में मौजूद मुख्यातिथि नेपाली मंत्री के सामने कहा:

“मैंने 1927 के बाद से जाटों के साथ काम किया है। मुझे जाट सैनिको की उस भावना ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया है कि जाटों में सबसे मुश्किल परिस्थितियों में भी हंसते रहने और निडरता से मुकाबला करने की उनकी क्षमता थी।

कोई डर तो जाट को कभी छू भी नहीं सकता है | प्रथम विश्व युद्ध के दौरान उनके असाधारण प्रदर्शन के कारण अब सेना में उनकी संख्या बढ़ गई है।”

जाट पैसे के लिए नौकरी नहीं करते Ram Sarup Joon Jat historian

Ram Sarup Joon Jat historian लिखते हैं कि 1 मई 1907 को जब मैं सेना की 5वीं कैवलरी में शामिल हुआ, उस समय प्रति सैनिक का वेतन नौ रुपये था, जो हर तीसरे वर्ष अच्छा आचरण रहने पर बढ़ता था।

जब मुझे नामांकित किया गया तो मुझे घोड़े और खच्चर खरीदने के लिए एडवांस में 500 रूपये जमा करने पडे और किश्तों पर घोड़े का साज सामान (काठी) मिल गई थी | Ram Sarup Joon Jat historian

हम लगभग चार या पांच सैनिक इकट्ठे रहते थे और एक साथ खाना पकाया करते थे। एक लंगर ही का इस्तेमाल करते थे, लेकिन खाना बहुत खराब था। सेवा के ढाई साल बाद मैं लांस दफादार बन गया ।

अब रैंक बढने के साथ कटौती भी बढ़ जाती है और मैं महीने के अंत में केवल आठ आन्ने (50 पैसे) ही बचा पाता था। मैंने सोचा था कि यह नौकरी करने लायक नहीं है और तब नौकरी छोड़ने के लिए आवेदन किया था।

मेरे स्क्वाड्रन कमांडर मेजर विलियम्स ने मुझे पुरानी कहावत का इस्तेमाल करते हुए कहा कि जाट पैसे के लिए नौकरी नहीं करते इसलिए तुम्हे एक दिन रेजिमेंट का रिसालदार मेजर बनने के लिए डटे रहना चाहिए। इसके बाद मैं 39 साल और 4 महीने तक वही डटा रहा और एक दिन यह कहावत सच हो गई।

Ram Sarup Joon Jat historian लिखते हैं कि

Ram Sarup Joon Jat historian

मेरे बेटे लेफ्टिनेंट कर्नल दल सिंह ने भी अपनी छोटी सी उम्र में ही भारत पाक युद्ध में बड़ा योगदान दिया। वह जम्मू और कश्मीर के चौकीबल इलाके में 8 कुमाऊं के कंपनी कमांडर थे। उनकी बटालियन पाकिस्तानी घुसपैठियों से मुकाबला करने के लिए अग्रिम मोर्चे पर थी| उसी 7 अगस्त से 13 अगस्त 1965 तक पाकिस्तानी सैनिकों से उनकी बड़ी मुडभेड हुई ।

जिसके बाद उसके सीओ मारे गए और 2 आईसी गंभीर रूप से घायल हो गए थे। अब मेजर दल सिंह ने बटालियन की कमान संभाली और एक अनिश्चित दिखने वाली हार को जीत में बदलते हुए पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर की दो महत्वपूर्ण चौकियों पर कब्जा कर लिया | उसने एक मुश्किल समय में सफलतापूर्वक बटालियन का नेतृत्व किया ।

मेजर जनरल एच.एस. गहलौत Ram Sarup Joon Jat historian का दामाद दिल्ली के नांगलोई गांव का रहने वाला था । वह एक बेहतरीन खिलाड़ी भी रहे और 1939 से 1942 तक ऑल इंडिया वॉलीबॉल टीम के कप्तान रहे। उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध में दिलेरी से काम किया और जंग में गंभीर रूप से घायल हो गए |

रिटायर्मेंट के बाद Ram Sarup Joon Jat historian

  • Ram Sarup Joon Jat historian लिखते हैं
  • कि मार्च 1947 में जब देश का बंटवारा हुआ
  • चारों तरफ हिन्दू मुस्लिम दंगे भडके हुए थे
  • उस समय कुछ दवाइयां खरीदने के लिए
  • मैं दिल्ली के हमदर्द दवाखाना गया
  • मुझे एक मुस्लिम क्षेत्र से गुजरना पड़ा
  • जीवन के 50 साल यानि आधी जिन्दगी मैं सेना में काम कर चूका था
  • Ram Sarup Joon Jat historian
  • मुझे नहीं पता था कि डर क्या होता है
  • मेरे हाथ में केवल एक चमडे से लिपटी हुई लोहे की छड़ी थी
  • दवाखाना के मुस्लिम कर्मचारियों ने मुझे आश्चर्य से देखा
  • और उनमें से एक ने मुझसे पूछा, “तुम क्यों आए हो”
  • मैंने उत्तर दिया “बस कुछ दवा खरीदने के लिए।”
  • फिर उसने मुझसे पूछा ‘; “आप एक सैनिक लगते हैं”,
  • मैंने उत्तर दिया “हां, मैं पेंशनभोगी सैनिक हूं”
  • जल्द ही एक और सवाल आया, “क्या आप अकेले हैं?”
  • उस आदमी ने मुझे याद दिलाया कि वह बुरे दिन थे
  • चारों तरफ हिन्दू मुस्लिम के बीच मार-काट मची हुई थी
  • और मुझे इस समय यहाँ नहीं आना चाहिए था “
  • उन्होंने पूछा कि क्या मेरे पास रिवाल्वर है ?

we are reading Ram Sarup Joon Jat historian

  • मैंने उन्हें अपना सामान दिखाया और कहा कि
  • मेरे पास केवल यह छड़ी ही एकमात्र हथियार है।
  • फिर उन्होंने बैठने के लिए मुझे एक कुर्सी दी,
  • मुस्लिम लोग चारों तरफ खड़े हो गये और मुझसे पूछा
  • कि ग्रामीण इलाकों में अब कैसी स्थिति है ?
  • और मुझे हिंदुओं और मुसलमानों के बीच
  • बेहतर रिश्ते बनाने की कोशिश करनी चाहिए|
  • मैंने उन्हें स्पष्ट बताया कि जिन्ना की मुस्लिम लीग ने
  • शहरी इलाकों के मुसलमानों को भटका दिया है
  • और इसका परिणाम बहुत भयानक होगा।
  1. शहरी इलाकों में रहने वाले हिंदु व्यापारी पंजाबियों ने
  2. ग्रामीण लोगों का शोषण किया है
  3. और वह एक भयानक गलती थी।
  4. ग्रामीण आबादी दंगों से नही डरती और
  5. यदि दंगे भडके तो वे शहरों के हिंदू और मुस्लिम
  6. दोनों धर्म के पूंजीपतियों’ को लूट लेंगे।
  • मैंने उन्हें यह स्पष्ट किया कि वे मुस्लिम खंजरों से नहीं डरते ।
  • मैं कहता हूं कि उन्हें ग्रामीण लोगों की विशाल ताकत का अंदाजा नहीं है,
  • जो कस्बों में मुसलमानों की हत्या करेंगे |
  • वे केवल ब्रिटिश सेना की गोली से डरते है
  • सच्चाई यह थी कि ब्रिटिश मुस्लिम लीग की मदद कर रहे है।
  1. लाल कुआँ दवाखाना के मुस्लिम कर्मचारियों ने सिर हिलाकर हामी भरी
  2. और मैंने उन्हें जो कुछ कहा उन्होंने उसे स्वीकार कर लिया।
  3. इसके बाद उन्होंने कहा कि सभी मुसलमान बुरे नहीं होते
  4. उन्होंने मुझे सलाह दी कि मैं ध्यान से घर वापस लौटूं।

जाट इतिहास के लेखक Ram Sarup Joon Jat historian

Ram Sarup Joon Jat historian एक अग्रणी जाट इतिहासकारों में से एक थे । हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओँ में उनके जाट इतिहास को जनता द्वारा सराहा गया । The Jat History English by Ram Sarup Joon is available online at Jatland Wiki History of the Jats.

संपादकीय नोट Ram Sarup Joon Jat historian

Ram Sarup Joon Jat historian ने विश्व युद्ध में ब्रिटिश भारतीय सेना में नौकरी की। उन्होंने विश्व युद्ध और भारत का विभाजन को देखा जब उन्होंने सेना छोड़ दी तो उन्होंने 1938 में उर्दू में अपनी किताब लिखी | जिसका सन 1967 में अंग्रेजी भाषा में अनुवाद किया गया।

History of the Jats/Chapter X में वह घटनाएं शामिल हैं जैसे ब्रिटिश छल कपट द्वारा हिंदू मुस्लिम विभाजन और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की छोटी सोच जिसकी वजह से देश का बंटवारा हुआ | इसमें उन सभी बातों को लिखा जिसका उन्होंने खुद के अनुभव के आधार पर अध्ययन किया था |

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  6. Ram Sarup Joon Jat historian
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