क्या पी.वी. सिन्धु जाट है | P V Sindhu Badminton Player

क्या पी.वी. सिन्धु जाट है | P V Sindhu Badminton Player

इतिहास पर शोध चलते रहते हैं और खोजी शिक्षार्थी पी. एच. डी. करते रहते हैं।

पुरातत्त्व विभाग लाखों व करोड़ों रुपये खर्च करके जमीन की चीरफाड़ करता रहता है, जहां कभी जैन साधुओं की तो कभी महात्मा बुद्ध की मूर्तियाँ मिलती रहती हैं |

फिर अनुमान पर ज्यादा जोर लगाया जाता है कि ये फलाँ युग व सन् की थी, जबकि ऐसा पाया जाने के पीछे पौराणिक ब्राह्मणवाद ही कारण है, जिसका विवरण कभी भी नहीं बतलाया जाता कि ये जमीन में इतनी नीचे कैसे पहुंच गई।

जाटों का इतिहास जीवंत अवस्था में आज भी देश भर में फैला है, जिसकी कभी किसी इतिहासकार, पत्रकार व सरकार ने सुध नहीं ली। इसके यहाँ मैं दो उदाहरण पेश कर रहा हूँ –

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(1) दक्षिण में हैदराबाद के गोलकुण्डा किले को फतह करना औरंगजेब के लिए एक बड़ी चुनौती थी। इसके लिए उसे कोई उपाय नहीं सूझ रहा था।

अन्त में उसने एक तोपखाना खड़ा करने तथा छापामार टुकड़ी बनाने का निर्णय लिया। लेकिन इसके लिए उसे दिलेर सैनिकों की आवश्यकता थी।

जब उसने इसके लिए अपनी नजर दौड़ाई तो उसको दिल्ली तथा इसके आसपास केवल बहादुर जाट ही नजर आये और उसने इसके लिए जाटों से आह्वान किया।

दिल्ली व उसके आसपास से इस उद्देश्य के लिए 700-800 जाटों की अलग से एक सेना बनाई।

इस लड़ाई में जाटों ने चमत्कारिक बहादुरी दिखलाई और गोलकुण्डा किले को फतह कर लिया।

गोलकुण्डा की स्थाई सुरक्षा तथा जीत की खुशी में औरंगजेब ने इन जाटों को हैदराबाद के पास मुफ्त में जमीन देकर उन्हें यहाँ बसाया।

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समय अपनी गति से चलता रहा, राज-रजवाड़े बदलते रहे और वहीं जमीन घटती रही, लेकिन जाट बढ़ते रहे और वह समय आ गया जब ये जाट छोटे किसान और मजदूर बनकर रह गये।

आज यही जाट लगभग 50 हजार की जनसंख्या में हैदराबाद के रामदेवगुड़ा से नलगुण्डा तक लगभग 65 कि. मी. में फैले अपनी बहादुरी का इतिहास अपने सीने में छिपाये हैं और भारत सरकार व आन्ध्र प्रदेश की बेवफाई पर आंसू बहा रहे हैं।

अभी-अभी की सरकार ने इनको पिछड़े वर्ग में शामिल किया है। इनके गोत्र हैं सिन्धु, मान, गुलिया, माथुर, खैनवार, नूनवार, जकोदिया, ब्यारे, हतीनजार व दुर्वासा आदि।

जैसे इनका रंग बदलता गया वैसे गोत्र भी, लेकिन जाट ‘Genes’ (रक्त) इनमें आज भी कायम है।

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श्रीमती रेणुका चौधरी पूर्व में केन्द्रीय मन्त्री

श्रीमती रेणुका चौधरी पूर्व में केन्द्रीय मन्त्री और पीवी सिन्धु इसी समाज से सम्बन्धित हैं।

इन गोलकुण्डा विजेताओं के इतिहास को भूला दिया गया जबकि मुगलों के हिन्दू सेनापतियों का इतिहास पढ़ाया जा रहा है। इस समाज में पर्दाप्रथा नहीं है।

आज इस जाट समाज के प्रधान दुर्वासा कासीराम सिंह हैं जिनका पता हैः- मकान नं. 9-5-106 गाँव – रामदवे गुड़ा व डॉक. – सिविल लाइन्स, हैदराबाद -31 (तेलंगाना राज्य )  सम्पूर्ण इतिहास इन्हीं से जानें।

भारत वर्ष की विशेष पहचान सांस्कृतिक विभिन्नता से है । देश के विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न समाज हैं जिनकी सामाजिक परम्परायें और संस्कृतियों में पूर्ण विभिन्नता है ।

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उदाहरण के लिए दक्षिण के राज्यों में विशेषकर तमिलनाडू और तेलगु क्षेत्र के हिन्दू समाज में अपनी बहिन, भुआ (बुआ) व मामे की लड़की/लड़के से विवाह करना उत्तम सम्बन्ध माना जाता है जबकि उत्तर भारत की स्थानीय जातियों में इनको भाई-बहन का दर्जा प्राप्त है ।

उत्तर पूर्वी राज्यों में सम्पत्ति की मालिक स्त्री है तो मेघालय में दूल्हे की बजाए दुल्हन बारात लेकर आती है ।

इस प्रकार के अनेक उदाहरण हैं लेकिन इसका मुख्य कारण दक्षिण व उत्तर-पूर्व की समाज मातृ-प्रधान संस्कृतियां हैं तो उत्तर भारत पितृ-प्रधान संस्कृति है ।

इसी का प्रमाण है कि दक्षिण भारतीय कोई भी कर्मचारी अपने परिवार को साथ रखने के समय अपनी मां की बजाए अपनी सास को साथ रखता है ।

इसी प्रकार हिन्दू धर्म में भी अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग मान्यताएं हैं जो एक-दूसरे के विपरीत हैं ।

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हमें तो एक दूसरे की संस्कृतियां बहुत ही हैरान करने वाली लगती हैं लेकिन सभी को अपनी-अपनी संस्कृतियां प्रिय व सम्मानीय हैं ।

चूँकि दक्षिण भारतीय क्षेत्र स्त्री सत्तात्मक समाज है वहां परिवार की मुखिया माता होती है और उस परिवार को माँ के वंश पर ही जाना जाता है |

बच्चे अपनी दादी की जगह अपनी नानी के प्रभाव में रहते है क्योंकि उनकी नानी ही उनके साथ रहती है |

इसके उल्टा उत्तर भारत में पिता सत्तात्मक समाज है यह किसी भी बालक की पहचान पिता के वंश के आधार पर तय की जाती है और उन्ही का वंशज नाम  इस्तेमाल किया जाता है |

चूँकि सिन्धु का पिता एक जाट और माँ तेलगु देवगन समाज से है,  इसलिए उत्तर भारत में उनकी पहचान पिता के वंश पर ही होती पर वो दक्षिण क्षेत्र से है इसी कारण p v sindhu खुद को अपनी माँ के वंश के आधार पर बताती है |

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जाट कौम ने अपनों को किया पराया ! p v sindhu

पाणिनि ऋषि ने हजारों साल पहले अपनी अष्टाध्यायी में लिखा- जट् झट् संघाते अर्थात् जाट बड़े जल्दी संघ बनाते हैं ।

उनका तात्पर्य यह था कि जाट अपनी चौधर (राजद) स्थापित करने के लिए बहुत जल्दी संगठित होते हैं ।

जाट एक अति प्राचीन कौम है जिससे अनेक जातियों का जन्म हुआ । इस बारे में विद्वान् इतिहासकार ए.एच. बिगले लिखते हैं – जाट शब्द की व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं है ।

यह ऋग्वेद आदि अति प्राचीन ग्रन्थों से स्वतः सिद्ध है । यह तो वह वृक्ष है जिससे समय-समय पर जातियों की उत्पत्ति हुई ।

जाट जाति एक महान् शासक जाति रही, जिसकी बहादुरी का कोई सानी नहीं था। जिस पर राजस्थान इतिहास के रचयिता कर्नल जैम्स् टॉड लिखते हैं, उत्तरी भारत में जो जाट किसान खेती करते पाए जाते हैं वे उन्हीं जाटों के वंशज हैं जिन्होंने एक समय मध्य एशिया और यूरोप को हिलाकर रख दिया था ।

लेकिन इस महान् कौम की बड़ी दुश्मन आपसी फूट रही जिस पर यूनानी इतिहासकार हैरोडोट्स लिखते हैं – संसार में जाटों जैसा बहादुर कोई नहीं, बशर्ते इनमें एकता हो ।

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जाट कौम ने केवल शासन ही नहीं किया इस संसार के अधिकतर लोगों को खाना-कमाना भी सिखाया था । जिस पर विद्वान् इतिहासकार शिवदास गुप्ता लिखते हैं, 

जाटों ने तिब्बत, यूनान, अरब, ईरान, तुर्कीस्तान,  जर्मनी,  साईबेरिया, स्केण्डिनेविया, इंग्लैंड, ग्रीक, रोम व मिश्र आदि में कुशलता, दृढ़ता और साहस के साथ राज किया और वहां की भूमि को विकासवादी उत्पादन के योग्य बना दिया ।

जाटों ने संसार की एक से एक बहादुर जातियों से केवल लोहा ही नहीं लिया बल्कि उनके विजेताओं को मौत के घाट भी उतारा । चाहे वह महान् सिकन्दर हो या मोहम्मद गौरी ।

संसार की एक बहादुर कौम हूण को हराने वाले भी जाट थे जिस पर चन्द्र व्याकरण में लिखा है अजयज्जटो हूणान् अर्थात् जाटों ने हूणों पर विजय पाई ।

जाट बुद्धि बल में भी सर्वोपरि रहे हैं जिस पर अंग्रेजी की पुस्तक राईज ऑफ ईस्लाम में लिखा है – गणित में शून्य का प्रयोग जाट अरब से यूरोप लाए थे । यूरोप के स्पेन तथा इटली की संस्कृति मोर जाटों की देन है ।

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जाट संसार में महान् समाज सुधारक भी हुए हैं । अंग्रेजी की एक अन्य पुस्तक राईज ऑफ क्रिश्चियनिटी में लिखा है कैथोलिक धर्म में विधवा विवाह को मान्यता जाटों के यूरोप आगमन पर हुई ।

 इस सम्पूर्ण सच्चाई को भारत के स्वर्गीय राष्ट्रपति जाकिर हुसैन ने इस प्रकार बयान किया –जाटों का इतिहास भारत का इतिहास है और जाट रैजिमेंट का इतिहास भारतीय सेना का इतिहास है । पश्चिम में फ्रांस से पूर्व में चीन तक जाट बलवान जय भगवान का रणघोष गूंजता रहा है ।

जाट इतिहास की महानता पर पर्दा उठाते हुए हिन्दी समाचार पत्र ‘पंजाब केसरी’ ने अपने सम्पादकीय दिनांक 25 सितम्बर 2002 को लिखा – जाटों जैसा गौरवशाली इतिहास ढूंढने से भी नहीं मिलेगा ।

लेकिन इतिहासकारों ने इसे इतना तोड़-मरोड़ कर लिखा है कि शब्दों में व्यक्त करना मुश्किल है ।

क्या यह सब महज इत्तिफाक है? यह कोई इत्तिफाक नहीं, यह पूरा पौराणिकवाद की काली करतूत तथा जाट कौम की सरासर लापरवाही का ही परिणाम है।

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