king jatt | Legends of Ahlawat | jat अहलावत महापुरुष

king jatt | Legends of Ahlawat | jat अहलावत महापुरुष

अहलावत जाटों में कुछेक अति प्रसिद्ध पुरुष:

डीघल गांव आबाद होने के कुछ पीढ़ी बाद नैणा, लौराम और बिन्दरा ये सब एक ही समय में हुए। इनसे कुछ पीढ़ी बाद सन् 1857 ई० के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के समय केहर पहलवान एवं तिरखा थे।

20वीं सदी के आरम्भ में दीनबन्धु सर छोटूराम ओहलाण, श्री जगदेवसिंह जी सिद्धान्ती अहलावत ग्राम बरहाणा (गूगनाण), चौ० लौटनसिंह पहलवान अहलावत पहाड़ी धीरज दिल्ली में हुए।

चौ० नैणा अहलावत – king jatt

नैणा का कद लगभग आठ फुट, गठीला शरीर, लोहपुरुष, वीर योद्धा, बड़ा शक्तिशाली, वजन लगभग 64 धड़ी बताया जाता है। इसके ऐतिहासिक कार्य तो अनेक हैं। लेकिन इनमें से अति प्रसिद्ध एक कार्य का वर्णन इस प्रकार है।

एक बार नैणा सांझ होने पर गांव चुलाणा की चौपाल में ठहर गया। वहां के कुछ लोगों ने इसका विशालकाय शरीर तथा खद्दर की धोती, कुर्ता के पहनावे का खूब मजाक उड़ाया। खाने-पीने के लिए किसी ने नहीं पूछा।

उस चौपाल के लिए एक बहुत लम्बा व भारी शहतीर बैलगाड़ी में चाल बैल जोड़कर लाया हुआ पड़ा था। उस गांव के निवासियों को सबक सिखलाने के लिए नैणा उस शहतीर को अकेला ही अपने कन्धे पर उठाकर तीन कोस दूरी तक अपने गांव डीघल में ले आया।

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दिन निकलने पर चुलाणा गांव के लोग यह अनुमान लगाकर कि नैणा के सिवाय और कोई भी उस शहतीर को नहीं ले जा सकता, गांव डीघल आये।

उन्होंने डीघल गांव के निवासियों के सामने नैणा से अपनी गलती की माफी मांगी और शहतीर ले जाने की प्रार्थना की।

नैणा ने इस शर्त पर हां कर ली कि शहतीर को आदमी उठाकर ले जा सकते हैं, उनकी संख्या कितनी भी हो सकती है। चुलाणा निवासी ऐसा करने में असफल रहे। तब गांव डीघल ने उस शहतीर की कीमत चुलाणा के लोगों को दे दी।

वह शहतीर गांव के बीच वाली चौपाल में चढ़ा हुआ मैंने (लेखक) तथा दूर-दूर के लोगों ने देखा है। अब भी वह शहतीर दो टुकड़ों में चढ़ा हुआ एक जाट के मकान में देखा जा सकता है |

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king jatt डीघल गाँव की इसी चौपाल में वो शहतीर चढ़ा हुआ था |

नैणा की खेत में काम करने वाली जेळी का नाला (दस्ता) आज भी उसके खानदान के एक घर में शहतीर के नीचे लगा थाम की शक्ल में देखा जा सकता है। नैणा खानदान में आज 35 घर हैं ।

चौ० लौराम वैद्य अहलावत जाट – king jatt

यह अपने समय का बहुत प्रसिद्ध वैद्य हुआ था। इसकी प्रसिद्धि उत्तरी भारत में दूर-दूर तक थी। वह नाड़ी को देखकर हर तरह की बीमारी को जान लेता था और उसका इलाज कर देता था।

एक बार दिल्ली के बादशाह की बेगम बच्चा जनने लगी परन्तु बच्चा अन्दर अटक गया जिससे बेगम मरने लगी। दिल्ली के बड़े-बड़े वैद्य जवाब दे गये। बादशाह ने लौराम वैद्य को लाने के लिए तेज रफ्तार घुड़सवार भेजे जो डीघल गांव से उसको दिल्ली दरबार में ले गये।

अहलावत जाट गोत्र  king jatt

लौराम वैद्य को पर्दे के पीछे से बेगम के हाथ की नाड़ी स्पर्श कराई गई। लौराम ने बादशाह को अलग ले जाकर बताया कि बच्चा उल्टा है। बेगम को मत बताओ और उसकी छत पर तोप का फायर करवा दो। ऐसा करवाते ही बच्चा बाहर आ गया जो कि लड़का था।

बादशाह बहुत प्रसन्न हुआ। उसने लौराम वैद्य को मनचाहा इनाम मांगने को कहा। लौराम वैद्य ने बादशाह से कहा कि “मुझे कोई वस्तु या धन आदि नहीं चाहिए, आप दिल्ली शहर में से गुजरने वाली किसानों की बैलगाड़ियों पर महसूल (टैक्स) लेना बन्द कर दो।”

बादशाह ने ऐसा ही किया। लौराम वैद्य की प्रसिद्धि उत्तरी भारतवर्ष में दूर-दूर तक फैल गई। किसानों की बैलगाड़ियों पर कर (टैक्स) बन्द करवाने वाली बात लौराम वैद्य के जाट होने का ठोस प्रमाण है क्योंकि ब्राह्मण, बनिया या अन्य जाति का पुरुष यह मांग नहीं कर सकता। वह तो धन या व्यापार की मांग करेगा।

बिन्दरा अहलावत जाट – king jatt

यह तलवार का धनी, निडर, साहसी वीर योद्धा था। अन्याय के विरुद्ध युद्ध करना अपना परम धर्म समझता था। इसके वीरता की एक घटना का वर्णन इस प्रकार है।

एक समय जिला रोहतक में लडान नामक स्थान पर जाखड़ जाटों के सरदार लाडासिंह का राज्य था। एक बार पठानों ने उनसे लडान छीन लिया। जाखड़ों ने सम्मिलित शक्ति से पठानों से लडान फिर ले लिया।

यह घटना इस तरह से घटी – बहू झोलरी में दिल्ली के मुसलमान बादशाह की ओर से एक नवाब का शासन था। उसने जाखड़ जाटों को हराकर लडान पर कब्जा कर लिया। फिर जाखड़ों के गांव को लूटना शुरु कर दिया।

उन पर हर प्रकार के अत्याचार करने आरम्भ कर दिये। जाखड़ों की पंचायत डीघल आई और मदद मांगी। इस हमदर्दी के लिए डीघल तथा अहलावत खाप के बहादुर युवकों का एक बड़ा दल जिसका सेनापति वीर योद्धा बिन्दरा था, जाखड़ों के पास पहुंच गया।

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अहलावतों और जाखड़ों ने मिलकर बहू झोलरी पर धावा बोल दिया। मुसलमान सेना साहस छोड़ गई और किले में जा बड़ी। बहादुर बिन्दरा एक अहलावत जाट दस्ता (टोली) को साथ लेकर दीवार पर से कूदकर सबसे पहले किले में घुस गया।

फिर तो शेष सभी जाट किले में घुस गये। इन्होंने पठान सेना को गाजर मूली की तरह काट दिया और बिन्दरा ने नवाब का सिर उतार दिया। किले पर जाटों ने अधिकार कर लिया।

परन्तु बड़े खेद की बात है कि वीर योद्धा बिन्दरा वहीं पर शत्रु की गोली से शहीद हो गया। इस युद्ध के पश्चात् जाखड़ों का लडान  पर अधिकार हुआ और इनके बहुत से गांव आराम से बस गये।

जाटों की शक्ति से डरकर दिल्ली का बादशाह चुपचाप बैठा रहा। जाटों से लोहा लेने का साहस न कर सका। यह है बिन्दरा की वीर गाथा।

केहर पहलवान अहलावत – king jatt

यह लगभग साढे-छः फुट लम्बा, वजन 48 धड़ी (6 मन), गठीला तथा फुर्तीला पहलवान था। बैलगाड़ियों के काफले के साथ कलकत्ता तक भी गया था। वहां निकट किसी राजा की रियासत (राज्य) के सबसे बड़े पहलवान को कुश्ती में हराकर बड़ी प्रसिद्धि प्राप्त की।

राजा ने खुश होकर बहुत इनाम दिया। इसी तरह पंजाब के एक शक्तिशाली मुसलमान पहलवान को लाहौर में हराया। इसने हरयाणा, उत्तरप्रदेश, पंजाब तथा देहली प्रान्त के अनेक पहलवान कुश्ती करके पछाड़ दिये थे।

यह कुश्ती में हारा कभी भी नहीं। सारे उत्तरी भारत में इसकी प्रसिद्धि थी और डीघलिया केहर पहलवान के नाम से प्रसिद्ध था।

तिरखा अहलावत – king jatt

यह लगभग सात फुट लम्बा वजन 56 धड़ी, गठीला, फुर्तीला, फौलादी हड्डियों वाला और रौबीला वीर योद्धा था। अपने समय में वीरता तथा सुन्दरता में यह अद्वितीय था।

यह तलवार का धनी था। इसको उस समय का वीर अर्जुन कहा गया है। इसकी तलवार लम्बी व भारी थी। एक साधारण युवक उसको उठाकर वार करने में असमर्थ था। इसकी अद्भुत शक्ति के कुछ मुख्य उदाहरण निम्न प्रकार से हैं –

डीघल गांव में एक बारात आई हुई थी। वह अपने साथ एक बड़े वजन का मुदगर (मुगदर) व उसको एक हाथ से उठाने वाला पहलवान साथ लाये थे। उस पहलवान ने डीघल वालों को मुदगर उठाने की चुनौती दी और उसने स्वयं उसको उठाकर दिखलाया।

Aarti Ahlawat 

डीघल के एक-दो युवकों ने भी उस मुदगर को उसी तरह उठा दिया। हार-जीत का फैसला न होने पर तिरखा को बुलाया गया। यह मुकाबिला एक कच्ची चौपाल के निकट हो रहा था।

चौ० तिरखा ने मुदगर में लगा हुआ दस्ता (मूठ) में अपने दोनों हाथों की उंगलियां डाल लीं और मुदगर को अपनी टांगों के बीच आगे-पीछे झुलाकर एक ऐसे झटके से ऊपर को फैंक दिया |

वह मुदगर चौपाल की छत पर जाकर गिरा जिसके वजन व दबाव से छत की कड़ी टूट गई। वह छत लगभग 12 फुट ऊँची थी और जिसकी मंडेर तो फुट ऊँचाई की थी। बाराती बेचारे लज्जित हो गये।

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हम पढ़ रहे है king jatt

चौ० तिरखा खरड़ को तालाब के पानी में धोकर ऐसा निचोड़ देता था कि फिर कई आदमी लगकर भी उससे एक बूंद पानी नहीं निकाल सकते थे। उस निचोड़े हुए खरड़2 को तह करके एक हाथ से ऊपर लिखित चौपाल की छत पर फेंक दिया करता था।

गांव बादली गुलिया गोत्र वालों का काज प्रसिद्ध है। उस अवसर पर दूर-दूर से लाखों मनुष्य आये थे। बादली वालों ने एक कटे हुए वृक्ष के तने में एक दस्ता (मूठ) लगवाकर रखवाया था।

यह लक्कड़ बहुत भारी तथा असंतुलित था। उस मुदगर को उठाने के लिए तिरखा डीघलिया को पुकारा गया। चौ० तिरखा ने एक हाथ से उस लक्कड़3 को उठा दिया और लोगों के कहने अनुसार एक छोटी टेकड़ी पर उस मुदगर को उठाये-उठाये चढ़ गया।

इस अद्वितीय कारनामे को देखकर लाखों आदमियों ने खुशी में तालिया बजाईं और “तिरखा की जय” बोलकर उसका सम्मान किया।

केप्टन दिलीप अहलावत   

एक बार डीघल की कई बैलगाड़ियां गेहूं भरकर एक स्थान से दूसरे स्थान को जा रही थीं। एक गाड़ी का पहिया गीली भूमि में नीचे को धंस गया। इस गाड़े में 70 मन गेहूं भरे थे और इसको चार बैल खींच रहे थे।

सबने मिलकर उस गाड़ी को निकालने के उपाय किये परन्तु असफल रहे। चौ० तिरखा ने उस गाड़ी के धुरा के नीचे से मिटटी निकलवाई और उस धुरा के नीचे अपनी कमर लगाकर ऊपर को पहिये को उठाकर आगे को बाहर कर दिया। यह एक अद्वितीय कार्य है।

बड़े खेद की बात है कि लौराम, नैना, केहर, तिरखा आदि के अतिप्रसिद्ध कारनामों का कोई लेख व रिकार्ड नहीं रक्खा गया है। उनके कारनामों की तुलना तक विदेशी आज तक भी नहीं पहुंच पाये हैं। भारतवासियों विशेषकर जाट जाति को उन पर गर्व है।

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गाँव खरकड़ा से भाई दक्षवीर अहलावत को Nandal Bhawan Rohtak में जाट गजट पुस्तक भेंट करते जाट लेखक रणधीर देशवाल king jatt

श्री जगदेवसिंह जी सिद्धान्ती शास्त्री – king jatt

आपका जन्म बरहाणा (गूगनान) गांव के चौ० प्रीतराम अहलावत के घर सन् 1900 ई० में हुआ। आप अपने समय के उच्चकोटि के वेदविद्या के प्रकाण्ड विद्वानों में गिने जाते हैं ।

आप सन् 1922 से 1929 ई० तक गुरुकुल मटिण्डू तथा फिर आर्य महाविद्यालय किरठल के संचालक रहे। हैदराबाद सत्याग्रह में साढ़े-चार मास जेल काटी। आप ऋषि दयानन्द के कट्टर अनुयायी तथा एक आदर्श आर्यनेता थे।

इलाहाबाद हाईकोर्ट में जाटों को शूद्र लिखा हुआ था। काण्ठ राज्य का एक केस जिला मुजफ्फरनगर की अदालत में था। वहां सिद्धान्ती जी ने एक पक्ष का वकील बनकर यह सिद्ध कर दिया कि जाट शूद्र नहीं अपितु द्विज (क्षत्रिय) हैं।

आप को सन् 1956 ई० में सर्वखाप पंचायत हरयाणा (विशाल हरयाणा – 300 खापों) का प्रधान चुना गया। इस पद पर आप लगातार सन् 1979 ई० स्वर्गवास होने तक रहे।

चौ० लोटनसिंह पहलवान अहलावत – king jatt

आपका गांव पहाड़ी धीरज दिल्ली है। आप अपने समय के बड़े शक्तिशाली प्रसिद्ध पहलवान थे। आप एक वीर योद्धा, निडर साहसी तथा कट्टर जाट थे। लोटनसिंह सच्चा जीव रक्षक था।

इसने वह काम पूरा किया जो बुद्ध का आदेश है कि – “जीवों को मारनेवाले को मार, पशुओं को निरन्तर सुखी करो” । इस वीर योद्धा ने दिल्ली में पशु वध करने वालों को मौत के घाट उतारना आरम्भ किया।

मुसलमान व अंग्रेज सरकार इसके विरोधी बन गये। इसने अपने साथी वीरों का संघ बनाया। किसी से न डरकर सैंकड़ों कसाई एवं उनके साथी कसाइयों को मौत के घाट पहुंचा दिया।

पूरी दिल्ली के मुसलमान कसाइयों में हाहाकार मच गई। कसाइयों ने इससे डरकर पशुवध करना बन्द कर दिया। चौ० लोटन पहलवान की इस वीरता की प्रसिद्धि पूरे भारतवर्ष में फैल गई। यह है चौ० लोटनसिंह पहलवान की वीर गाथा।

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दीनबन्धु सर चौ० छोटूराम ओहलाण – king jatt

आप बड़े बुद्धिमान्, विद्वान्, राजनीतिज्ञ, कुशल शासक, सच्चे देशभक्त, सिद्धान्तों के धनी, कर्मयोगी, समाज सुधारक, किसानों के हितकारी, निपुण कार्यकर्त्ता और निडर नेता थे।

आपका सबसे बड़ा गुण यह है कि बिना मांगे ही आपने पंजाब के किसानों की बिगड़ी आर्थिक, सामाजिक व मानसिक दशा को सुधारा तथा उनको चहुंमुखी उन्नत किया जो आज तक कोई दूसरा नहीं कर सका है। इसी कारण तो आपको “किसानों का मसीहा” कहा गया है।

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Randhir Deswal

Hi, I am Randhir Singh a Solo Travel Blogger form Rohtak Haryana. I am a writer of Lyrics and Quotes.

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