जाट हीरोज मैमोरियल स्कुल रोहतक – दीनबन्धु सर छोटूराम

दोस्तों हमारा आज का विषय है  jat school Rohtak – Dinbandhu Sir Chhoturam यह संस्थान उनकी दूरगामी सोच का परिणाम है |

jat school Rohtak | Dinbandhu Sir Chhoturam जिस तरह जाट जमींदारों ने लगानबन्दी प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया था,

उसी तरह उनके उन नेताओं ने, जिनके हाथ में ‘जाट एंग्लों संस्कृत हाई स्कुल’ की बागडौर थी,

यह स्वीकार कर लिया था कि अब यह स्कुल यूनिवर्सिटी से कोई सम्बन्ध नहीं रखेगा और न ही शिक्षा विभाग के नियन्त्रण में रहेगा |

इसमें शिक्षा भी गाँधी जी और कांग्रेस द्वारा निर्धारित योजना पर दी जाएगी |

चौधरी लालचंद और चौधरी छोटूराम उन दिन चुनावी दौरे के सिलसिले में बाहर गये हुए थे जिसके कारण वह jat school Rohtak कीइस मीटिंग में उपस्थित नहीं हो सके थे |

पर इसमें भी कोई संदेह नहीं था कि यदि वो इस मीटिंग में शामिल भी होते तो भी jat school Rohtak कमेटी यही निर्णय लागु करती

क्योंकि शिक्षा के मामले में उन दिनों मास्टर बलदेव सिंह धनखड़  गाँव हुमायूपुर हरियाणा के हंसराज माने जाते थे |

उनका त्याग भी कोटि का था जो वह सिर्फ गुजारे लायक वेतन पर ही इस स्कुल के हेड मास्टर व प्रबन्धक बनकर अपनी सेवा दे रहे थे |

उनकी भूख हड़ताल ने जाट स्कुल का सम्बन्ध यूनिवर्सिटी से तोड़ने के निर्णय पर बहुत बड़ा प्रभाव छोड़ा था |

जाट शिक्षण संस्थान रोहतक jat school Rohtak | Dinbandhu Sir Chhoturam

jat school Rohtak

जाट एंग्लों हाई स्कुल के यूनिवर्सिटी से सम्बन्ध तोड़ने और चौधरी छोटूराम के पक्ष की बात न मानने से उनके विरोधी केम्पों में खुशी की लहर दौड़ गयी थी |

यह समझा जाने लगा था कि अब देहाती जनता उनके साथ नहीं रही |

चौधरी छोटूराम उस मिट्टी के बने थे जिन्होंने कभी हताश होना नहीं सिखा था |

अत: उन्होंने इलाके के समझदार लोगों को बुलाया और मुकाबले में जाट हीरोज हाई स्कुल  नाम से एक नये jat school Rohtak की स्थापना कर दी |

jat school Rohtak

इस काम में चौधरी लालचंद ने भी पूर्ण सहयोग दिया | तीन चार साल बाद ही इस jat school Rohtak ने इतनी उन्नति कर ली की अब इसमें 600 से 700 लडके पढने लगे थे जबकि उधर 60 से 70 ही रह गये |

हालाँकि पहले वाले jat school Rohtak को गाँधी जी का पूरा आशीर्वाद प्राप्त था, कांग्रेस इसे पूर्ण सहयोग दिया करती थी

और इसके वार्षिक जलसे में तथाकथित पंजाब केसरी लाला लाजपत राय भी पधारा करते थे |

किन्तु मास्टर बलदेव सिंह जी का स्कुल दिन प्रतिदिन पतन की और अग्रसर होता ही चला गया |

कुछ लोग इसमें मास्टर बलदेव सिंह की ही कमियां भी निकालने लगे थे पर हकीकत यह थी कि संसार में व्यवहारवाद अधिक चलता है | आदर्शवाद अथवा प्रयोगवाद कम ही सफल होते है |

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हम पढ़ रहे है jat school Rohtak | Dinbandhu Sir Chhoturam

काशी हिन्दू कालेज बढ़ते-बढ़ते यूनिवर्सिटी हो गया जबकि काशी विद्यापीठ सफल कालेज भी नहीं बन पाया |

लाहौर के नेशनल कालेज के विद्यार्थी यो के त्यों ही रह गये जबकि लाहौर गवर्मेंट  कालेज के लडके बड़े-बड़े सरकारी पदों पर है |

जिन शिक्षा संस्थानों के पढ़े लिखे लडकों की डिग्रियों की कोई मान्यता ही न हो,

सर्विस में उनके लिए कोई जगह ही न हो, उस शिक्षा को केवल आदर्शवादी ही प्राप्त करना चाहेंगे |

गाँधी जी के असहयोग आन्दोलन के प्रस्ताव का शिक्षा और नौकरियों से त्यागपत्र देने वाले भाग पर चौधरी छोटूराम असहमत थे, क्योंकि उसमे उन्हें अपने इलाके का भारी नुकसान दिखाई दिया था |

गाँधी का असहयोग आन्दोलन जमींदारों का शोषण करने वाला था jat school Rohtak | Dinbandhu Sir Chhoturam

उनका कहना था कि हरियाणा में शिक्षा का पहले ही बहुत अभाव है | अब लोगों का ध्यान थोडा बहुत अपने बालकों को शिक्षित करने पर गया है |

अगर ऐसे हालात में स्कुल कालेजों का बहिष्कार किया गया तो इस इलाके की भूमि में तो मानों शिक्षा के अंकुर को फूटते समय ही मसल दिया जायेगा और सारा इलाका पहले जैसा ही पिछड़ा हुआ रह जायेगा |

यही बात नौकरियों के विषय में थी | इस इलाके के आदमी सरकारी नौकरियों में कही पर भी दिखाई नहीं देते थे,

अब कुछ पढ़ लिखकर नौकरियों में आने लगे तो बहिष्कार के नाम पर वह सम्भावना भी बिलकुल समाप्त हो जाएगी |

jat school Rohtak

वे सरकारी नौकरी को केवल आजीविका न समझकर राज-काज में हिस्सा समझते थे |

उनका कहना था कि जो लोग सरकारी नौकरियों पर होते है, राज्य वही चलाते है |

बाहर रहने वाले को उसमे कोई हिस्सा नहीं मिल पाता | जो वर्ग राज्य की नौकरी से दूर रहेंगे वो हर तरह से पिछड़े हुए रहेंगे | उनकी कोई भी राजनैतिक सत्ता नहीं बन सकती |

इसीलिए उन्होंने कांग्रेस के इस प्रस्ताव का डटकर विरोध किया था |

आम लोग व्यवहारवादी होते है | अंततः जाट एंग्लों संस्कृत हाई स्कुल को भी ‘जाट हीरोज हाई स्कुल में मिलना पड़ा और उसका नाम जाट हीरोज एंग्लो संस्कृत हाई स्कुल पड़ा |

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हमारा आज का विषय jat school Rohtak | Dinbandhu Sir Chhoturam

सन 1920 में चौधरी छोटूराम के जीवन प्रवाह को जो धक्का लगा था और जिससे उनके विरोधी अति प्रसन्न हुए थे |

उस स्थिति को चौधरी छोटूराम ने ज्यादा दिन नहीं चलने दिया, शिक्षा क्षेत्र में उनका बायकाट चौधरी बलदेव द्वारा कराया गया था |

उससे उभरने में उन्हें बेशक पांच छ साल लग गये पर बाद में चौधरी बलदेव सिंह को अपने जोश में उठाये गये कदम पर बहुत बड़ा पश्चाताप हुआ |

jat school Rohtak

चौधरी छोटूराम ने राजनैतिक क्षेत्र में ओर भी तेजी से अपनी स्थिति को सम्भाल लिया था |

सन 1917 में जमींदारा एसोशियन की स्थापना हो चुकी थी, जिसका दफ्तर लाहौर में था |

सरदार कृपाल सिंह मान इसके अध्यक्ष और सरदार खडक सिंह ढिल्लों B.A.L.L.B. सेकेर्ट्री थे |

इस एसोशियन में उस समय तक सिख और हिन्दू जमींदार ही शामिल हुए थे | गैर किसान सिखों ने इसका बहुत विरोध किया था |

धर्म के ठेकेदार किसानों के असली दुश्मन होते है jat school Rohtak | Dinbandhu Sir Chhoturam

लायलपुर गजट अख़बार इस संस्था को सिख पन्थ के लिए बड़ा खतरा बता रहा था, जिसका जवाब चौधरी छोटूराम ” जाट गजट” और अन्य जमींदार अख़बारों में लेख लिखकर देने लगे थे | 

इससे उनका हिन्दू और सिख दोनों ही प्रकार के जमींदारों व किसानों में सम्मान बढने लगा था |

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दोस्तों यह था हमारा आज का लेख jat school Rohtak के विषय में |

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जय दादा छोटूराम जय जवान जय किसान

आपका छोटा सा भाई

चौधरी रणधीर देशवाल

जिला रोहतक हरियाणा

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Randhir Deswal

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