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Jat King Mursan mahendra Pratap Thenua

राजा महेंद्र प्रताप सिंह, जिन्हें Jat King mahendra  prtap भी कहा जाता है, यहां उनके बारे में 3 बातें हैं जिनका हमें पता होना चाहिए:

1. Jat King mahendra नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित पहले भारतीय व्यक्ति थे | जिन्हें 1932 में शांति नोबेल पुरस्कार के लिए नामित किया गया था। महात्मा गांधी को कई साल बाद इसके योग्य घोषित किया गया था जिन्हें यह पुरस्कार 1948 में दिया जाना था |

नोबेल कमेटी द्वारा सार्वजनिक किए गए पुराने डेटाबेस ने उनके बारे में यह कहते हुए एलान किया था कि “Jat King mahendra ने शैक्षिक उद्देश्यों के लिए अपनी संपत्ति छोड़ दी, और उन्होंने वृन्दावन में एक तकनीकी कॉलेज की स्थापना की।

Raja Mahendra Pratap

1913 में उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में गांधी के अभियान में हिस्सा लिया। उन्होंने अफगानिस्तान और भारत की दयनीय स्थिति के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए दुनिया भर में यात्रा की। 1925 में वह तिब्बत में एक मिशन पर गए और दलाई लामा से मुलाकात की।

कहने को तो वह अफगानिस्तान सरकार की तरफ से एक अनौपचारिक आर्थिक मिशन पर थे, लेकिन वह भारत में ब्रिटिश क्रूरता का पर्दाफाश करना चाहते थे। उसने खुद को शक्तिहीन और कमजोर का नौकर कहा। ”

तो उस वर्ष नोबल पुरस्कार किसके पास गया? वास्तव में किसी को उस साल पुरस्कार नहीं मिला । इनाम राशि इस पुरस्कार खंड के विशेष निधि को आवंटित की गई थी।

1948 में, महात्मा गांधी को नोबेल पुरस्कार मिलने के लिए सेट किया गया था, लेकिन घोषणा से पहले हत्या कर दी गई थी। उस वर्ष भी, पुरस्कार राशि 1/3 को मुख्य निधि और 2/3 को विशेष निधि में आवंटित किया गया था।

mahendra

Jat King mahendra और गांधी जी के बीच एक और संबंध है।

कहा जाता है कि अपने समाचार पत्र यंग इंडिया में गांधी ने Jat King mahendra को “महान देशभक्त” कहा था। प्रेम महाविद्यालय … उनकी रचना है, “गांधी ने 1929 में लिखा (नोबेल कमेटी के रिकॉर्ड के अनुसार)।

“देश के लिए, इस महान व्यक्ति ने निर्वासन को अपने आप से चुना है। उन्होंने शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए अपनी शानदार संपत्ति छोड़ दी है। वह चाहते तो जयपुर, जोधपुर, बीकानेर के राजपूत रजवाड़ों की तरह नीची गर्दन करके आराम से सत्ता सूख भोग सकते थे |

2. Jat King mahendra ने महान मुगल सम्राट अकबर की तरह एक नया धर्म स्थापित किया | आज देश में हिंदू-मुस्लिम बहस सबसे बड़ा मुद्दा है, तो हमें यह पता चला कि आखिर क्यों Jat King mahendra इन संगठित धर्मों से इतने सावधान थे कि उन्होंने अपने खुद के धर्म को शुरू करने की कोशिश की आधार “प्यार” था।

Raja Mahendra Pratap

उन्होंने इसे Prem Dharam (प्यार का धर्म) नाम दिया और उस पर एक पुस्तक लिखी। उन्होंने भारत का पहला पॉलीटेक्निक संस्थान भी स्थापित किया और इसे एक बहुत ही गैर-तकनीकी नाम दिया, प्रेम महा विद्यालय (Prem Maha Vidhyalaya – College of Love) ।

Jat King mahendra ने 1919 में मॉस्को में व्लादिमीर लेनिन के साथ अपनी बैठक का जिक्र करते हुए कहा कि जब उन्होंने उन्हें अपनी पुस्तक का उपहार दिया, तो उस कम्युनिस्ट क्रांतिकारी ने कहा कि उन्होंने पहले ही किताब पढ़ ली है और यह “टोलस्टॉयज्म” था।

Jat King mahendra के नाम पर एक डाक टिकट भी जारी हुई है | 1979 में, राजा की मृत्यु हो गई, भारत सरकार ने Jat King mahendra की तस्वीर के साथ एक डाक टिकट जारी करके उनके योगदान का सम्मान किया।

तत्कालीन प्रधानमन्त्री चौधरी चरण सिंह ने उस वर्ष स्वतंत्रता दिवस पर 30 पैसे के स्मारक टिकट जारी किए गए थे। उस वर्ष एक स्टैंप से सम्मानित अन्य व्यक्तित्व स्वतंत्रता सेनानी जतिन्द्र नाथ दास, कोल्हापुर राजा राजर्षि शाहू छत्रपति, भौतिक विज्ञानी अल्बर्ट आइंस्टीन और सुधारक भाई परमानंद थे।

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उसका परिवार

Jat King mahendra का जन्म 1 दिसंबर 1886 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जनपद में Murasan राज्य के Thenua गोत्र जाट रियासत परिवार में हुआ था। वह राजा घनश्याम सिंह का तीसरा पुत्र था। हाथरस के राजा हरनारायण सिंह ने उन्हें पुत्र के रूप में अपनाया।

कॉलेज में पढ़ते समय 1902 में हरियाणा के जींद रियासत राज्य के सिद्धू गोत्री सिख जाट राजकुमारी बलबीर कौर से उनका विवाह हुआ। उनकी बेटी भक्ति का जन्म 1909 में और 1912 में पुत्र प्रेम प्रताप का जन्म हुआ।

प्रेम प्रताप के नाम पर वृंदावन में प्रेम महाविद्यालय स्थापित किया गया था। Raja Prem Pratap Singh के पुत्र अमर प्रताप सिंह थे, जिनके दो पुत्र चरत प्रताप सिंह और शरद प्रताप सिंह थे।

Genealogy of Raja Mahendra Pratap

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Family tree of Mursan and Hathras (Thenua) Jat Rulers since 1600 AD

Genealogy of Mursan rulers:

Makhan Singh → Nand Ram (r. 1645 -1695) → Jalkaran Singh → Kushal Singh → Puhap Singh → Bhagwant Singh → Tika Ram → Kunwar Kisan Pratap → Ghan Shyam Singh

Genealogy of Hathras rulers:

Makhan Singh → Nand Ram (r. 1645-1695) → Jai Singh → Badan Singh → Bhure Singh →Raja Daya Ram ( 1775-1841) → Thakrur Gobind Singh (1841-1861) → Raja Harnarain Singh(1861-1896) → Raja Mahendr Pratap Singh (1886-1979) → Raja Prem Pratap Singh (1913-1947) → Raja Amar Pratap Singh (b.1940)

राजा Mahendra प्रताप का जीवन परिचय

राजा महेंद्र प्रताप वो व्यक्ति थे जिन्होने देश के भावी प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी को चुनावों में धूल चटा दी, ये वो क्रांतिकारी थे जिन्होने 28 साल पहले वो काम कर दिया, जो नेताजी बोस ने 1943 में आकर किया।

ये वो व्यक्ति है, जिसे गांधी की तरह ही नोबेल पुरस्कार के लिए नॉमिनेट किया गया और उन दोनों ही साल नोबेल पुरस्कार का ऐलान नहीं हुआ और पुरस्कार राशि स्पेशल फंड में बांट दी गई।

राजा महेंद्र प्रताप का सही से आकलन इतिहासकारों ने किया होता तो आज राजा को ही नहीं दुनिया हाथरस जिले को और उनकी रियासत मुरसान को भी उसी तरह से जानती, जैसे बाकी महापुरुषों के शहरों को जाना जाता है।

Raja Mahendra Pratap

आखिर कोई तो बात थी राजा में कि पीएम मोदी ने उदघाटन तो काबुल की संसद में अटल ब्लॉक का किया और तारीफ राजा महेंद्र प्रताप की की, वो भी तब जब राजा खुद को मार्क्सवादी कहते थे।

फ्रंटियर या सीमांत गांधी को जानने वाले आज लाखों मिल जाएंगे, लेकिन राजा महेंद्र प्रताप का नाम कितने लोग जानते हैं, मोदी ने सीमांत गांधी के साथ राजा महेंद्र प्रताप का नाम लिया और उनके और अफगानिस्तान के किंग के बीच की बातचीत को भाईचारे की भावना का प्रतीक बताया।

स्वदेशी आंदोलन: 1905 के स्वदेशी आंदोलन से वो इतना प्रभावित हुए कि अपने ससुर के मना करने के बावजूद वो 1906 के कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में हिस्सा लेने चले गए।

Mahendra

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19वीं सदी के पहले दशक में एक जाट और राजा के परिवार में कोई ऐसा सोचने की भी हिम्मत नहीं कर सकता था। फिर विदेशी वस्त्रों के खिलाफ अपनी रियासत में उन्होंने जबरदस्त अभियान चलाया।

बाद में उनको लगा कि देश में रहकर कुछ नहीं हो सकता। लाला हरदयाल, वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय, रास बिहारी बोस, श्याम जी कृष्ण वर्मा, अलग- अलग देशों से ब्रिटिश सरकार की गुलामी के खिलाफ उस वक्त भारत के लिए अभियान चला रहे थे।

उस वक्त तक जर्मनी में रह रहे भारतीय क्रांतिकारी बर्लिन कमेटी बना चुके थे, प्रथम विश्वयुद्ध को वो एक मौका मान रहे थे, जब इंग्लैंड की विरोधी शक्तियों से हाथ मिलाकर भारत को गुलामी से मुक्ति दिलाई जा सके।

Raja Mahendra Pratap

राजा महेंद्र का नाम तब तक इतना हो चुका था कि स्विट्जरलैंड में उनकी मौजूदगी की भनक लगते ही चट्टोपाध्याय ने लाला हरदयाल और श्याम जी कृष्ण वर्मा को उन्हें बर्लिन बुलाने को कहा।

बाकायदा जर्मनी के विदेश मंत्रालय से कहा गया उन्हें बुलाने को। लेकिन राजा ने खुद जर्मनी के किंग से व्यक्तिगत तौर पर मिलने की इच्छा जताई,

इधर जर्मनी के राजा भी उनसे मिलना चाहते थे, जर्मनी के राजा ने उन्हें ‘ऑर्डर ऑफ दी रैड ईगल’ (Order Of The Red Eagle) की उपाधि से सम्मानित किया।

Raja Mahendra Pratap

राजा जींद के दामाद थे और उन्होंने अफगानिस्तान की सीमा से भारत में घुसने के लिए पंजाब की फुलकियां स्टेट्स जींद, नाभा और पटियाला की रणनीतिक पोजीशन की उनसे चर्चा की।

जर्मन राजा से काफी भरोसा पाकर वो बर्लिन से चले आए। बर्लिन छोड़ने से पहले उन्होंने पोलैंड बॉर्डर पर सेना के कैंप में रहकर युद्ध की ट्रेनिंग भी ली।
उसके बाद वो स्विट्जरलैंड, तुर्की, इजिप्ट में वहां के शासकों से ब्रिटिश सरकार के खिलाफ सपोर्ट मांगने गए, उसके बाद अफगानिस्तान पहुंचे। उन्हें लगा कि यहां रहकर वो भारत के सबसे करीब होंगे और ब्रिटिश सरकार के खिलाफ जंग यहां रहकर लड़ी जा सकती है।

आप जानकर हैरत में पड़ जाएंगे कि उस वक्त जब वो कई देश के राजाओं से अपने देश की आजादी के लिए मिल रहे थे, उनकी उम्र महज 28 साल थी और अगले 32 साल वो दुनिया भर की खाक ही छानते रहे….. दरबदर।

भारत की पहली निर्वासित सरकार: Raja Mahendra Pratap

एक दिसंबर 1915 का दिन था, राजा महेंद्र प्रताप का जन्मदिन, उस दिन वो 28 साल के हुए थे। उन्होंने भारत से बाहर देश की पहली निर्वासित सरकार का गठन किया, बाद में सुभाष चंद्र बोस ने 28 साल बाद उन्हीं की तरह आजाद हिंद सरकार का गठन सिंगापुर में किया था।

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राजा महेंद्र प्रताप को उस सरकार का राष्ट्रपति बनाया गया यानी राज्य प्रमुख। मौलवी बरकतुल्लाह को राजा का प्रधानमंत्री घोषित किया गया और अबैदुल्लाह सिंधी को गृहमंत्री।

भोपाल के रहने वाले बरकतुल्लाह के नाम पर बाद में भोपाल में बरकतुल्लाह यूनीवर्सिटी खोली गई। राजा की इस काबुल सरकार ने बाकायदा ब्रिटिश सरकार के खिलाफ जेहाद का नारा दिया।

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लगभग हर देश में राजा की सरकार ने अपने राजदूत नियुक्त कर दिए, बाकायदा वो उन सरकारों से बतौर भारत के राजदूत मान्यता देने की बातचीत में जुट गए।

लेकिन उस वक्त ना कोई बेहतर सैन्य रणनीति थी और ना ही उन्हें इस रिवोल्यूशरी आइडिया के लिए बोस जैसा समर्थन मिला और सरकार प्रतीकात्मक रह गई। लेकिन राजा की लड़ाई थमी नहीं उनकी जिंदगी तो हंगामाखेज थी।

Raja Mahendra Pratap

दिलचस्प बात ये थी कि जिस साल में राजा ने भारत की पहली निर्वासित सरकार बनाई, उसी साल गांधी जी साउथ अफ्रीका से भारत वापस लौटे थे और प्रथम विश्व युद्ध के लिए भारतीयों को ब्रिटिश सेना में भर्ती करवा रहे थे, उन्हें भर्ती करने वाला सर्जेंट तक कहा गया था।

राजा के सिर पर ब्रिटिश सरकार ने इनाम रख दिया, रियासत अपने कब्जे में ले ली, और राजा को भगोड़ा घोषित कर दिया। राजा ने काफी परेशानी के दिन झेले। फिर उन्होंने जापान में जाकर एक मैगजीन शुरू की, जिसका नाम था वर्ल्ड फेडरेशन।

लंबे समय तक इस मैगजीन के जरिए ब्रिटिश सरकार की क्रूरता को वो दुनिया भर के सामने लाते रहे। फिर दूसरे विश्व युद्ध के दौरान राजा ने फिर एक एक्जीक्यूटिव बोर्ड बनाया, ताकि ब्रिटिश सरकार को भारत छोड़ने के लिए मजूबर किया जा सके।

लेकिन युद्ध खत्म होते-होते सरकार राजा की तरफ नरम हो गई थी, फिर आजादी होना भी तय मानी जाने लगी। राजा को भारत आने की इजाजत मिली।

Raja Mahendra Pratap

ठीक 32 साल बाद राजा भारत आए, 1946 में राजा मद्रास के समुद्र तट पर उतरे। वहां से वो घर नहीं गए, सीधे वर्धा पहुंचे गांधीजी से मिलने।

गांधीजी और राजा में अजीबो-गरीब रिश्ता था, बहुत कम लोगों को पता होगा कि हाथरस के इस राजा को नोबेल पुरस्कार के लिए नॉमिनेट किया गया था और एक तय वक्त के बाद नोबेल कमेटी के कमेंट्स को सार्वजनिक कर दिया जाता है।

सबसे खास बात थी कि नोबेल पुरस्कार समिति की इन्हीं लाइनों से ये पता चला कि वो गांधीजी के साउथ अफ्रीका वाले आंदोलन में भी हिस्सा लेने जा पहुंचे थे, इतना ही नहीं वो तिब्बत मिशन पर दलाई लामा से भी मिले थे।

ऐसी इंटरनेशनल तबीयत के थे राजा महेंद्र प्रताप। उस साल किसी को भी नोबेल पुरस्कार नहीं दिया गया, सारी पुरस्कार राशि किसी स्पेशल फंड में दे दी गई।

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इसका गांधी कनेक्शन ये है कि बिलकुल ऐसा ही तब हुआ था, जब गांधीजी को 1948 में नोबेल पुरस्कार के लिए नॉमिनेट किया गया था, गांधीजी की हत्या होने के चलते बात आगे नहीं बढ़ी और उस साल भी नोबेल पुरस्कार के लिए किसी के नाम का ऐलान नहीं हुआ। सारा पैसा स्पेशल फंड में दे दिया गया।

नोबेल पुरस्कार समिति के कमेंट्स से ही पता चलता है कि गांधीजी ने एक बार राजा महेंद्र प्रताप की अपने अखबार यंग इंडिया में जमकर तारीफ की थी, गांधीजी ने लिखा था, “”For the sake of the country this nobleman has chosen exile as his lot. He has given up his splendid property…for educational purposes. Prem Mahavidyalaya…is his creation,”।

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गांधीजी से उनके गहरे नाते की मिसाल देखिए, 32 साल बाद भारत आए तो सीधे उनसे मिलने जा पहुंचे, मद्रास से सीधे वर्धा। बावजूद इसके वो कांग्रेस में शामिल नहीं हुए।

लेकिन उनकी हस्ती इस कदर बड़ी थी कि कांग्रेस तो कांग्रेस उस वक्त के जनसंघ के बड़े नेता और भावी पीएम अटल बिहारी वाजपेयी को भी लोकसभा के चुनावों में उन्होंने धूल चटा दी।

वो 1952 में मथुरा से निर्दलीय सांसद बने और 1957 में फिर से अटल बिहारी वाजपेयी को हराकर निर्दलीय ही सांसद चुने गए। बिना किसी का अहसान लिए शान से राजा की तरह जीते रहे।

राजा महेंद्र प्रताप की उपलब्धियां यहीं कम नहीं होतीं, उनके खाते में भारत का पहला पॉलिटेक्निक कॉलेज भी है। अपने बेटे का नाम रखा उन्होंने प्रेम और वृंदावन में एक पॉलिटेक्निक कॉलेज खोला, जिसका नाम रखा प्रेम महाविद्यालय। राजा मॉर्डन एजुकेशन के हिमायती थे, तभी Aligarh Muslim University के लिए भी जमीन दान कर दी।

Raja Mahendra Pratap

देश की आजादी के बाद लोग मानते थे कि उनसे बेहतर कोई विदेश मंत्री नहीं हो सकता था, लेकिन उन्होंने किसी से कुछ मांगा नहीं और आमजन के लिए काम करते रहे। पंचायत राज कानूनों, किसानों और फ्रीडम फाइटर्स के लिए लड़ते रहे।

राजा जो भी काम करते थे, वो क्रांति के स्तर पर जाकर करते थे। हिंदू जाट घराने में वो पैदा हुए थे, मुस्लिम संस्था में वो पढ़े थे, यूरोप में तमाम ईसाइयों से उनके गहरे रिश्ते थे, सिख धर्म मानने वाले जाट परिवार से उनकी शादी हुई थी।

राजा महेंद्र प्रताप भी उन्हीं तमाम चेहरों में से हैं, जिनका आजादी के बाद इतिहासकारों ने सही ढंग से मूल्यांकन नहीं किया। दुनिया भले ही नोबेल के लायक उनको मान ले, लेकिन सरकार उनकी जयंती तक मनाने लायक नहीं समझती आई और ये नाइंसाफी की मार केवल राजा महेंद्र प्रताप ने ही नहीं भुगती, उनके जिले हाथरस ने भी भुगती है।

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वाजपेयी की जमानत जब्त करा दी थी Raja Mahendra Pratap‘ ने

राजा महेंद्र प्रताप ने ही अटल बिहारी बाजपेयी को 1957 के आम चुनाव में करारी शिकस्त दी थी। चुनावी दस्तावेजों को पलटें तो पता चलेगा कि 1957 के लोक सभा चुनावों में मथुरा लोकसभा सीट से राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने चुनाव लड़ा था।

इस चुनाव में लगभग 4 लाख 23 हजार 432 वोटर थे। जिसमें 55 फीसदी यानि लगभग 2 लाख 34 हजार 190 लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था। 55 फीसदी वोट उस वक्त पड़ना बड़ी बात होती थी।

इस चुनाव में जीते निर्दलीय प्रत्याशी राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने भारतीय जन संघ पार्टी के उम्मीदवार अटल बिहारी वाजपेयी की जमानत तक जब्त करा दी थी। क्योंकि नियमानुसार कुल वोटों का 1/6 वोट नहीं मिलने पर जमानत राशि जब्त हो जाती है।

अटल बिहारी इस चुनाव में 1/6 से भी कम वोट मिले थे। जबकि राजा महेंद्र प्रताप को सर्वाधिक वोट मिले और वह विजयी हुए।

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Randhir Deswal

Hi, I am Randhir Singh a Solo Travel Blogger form Rohtak Haryana. I am a writer of Lyrics and Quotes.

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