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रोहतक के अंग्रेज़ DC मिस्टर वोल्स्टर से टक्कर

दोस्तों Deenbandhu Sir Chhotu Ram जी के विषय में हम आज आपको बतायेंगे कि कैसे विद्रोही छोटूराम, अंग्रेज़ मिस्टर वोल्स्टर से संघर्ष  करता है और उस पर जीत भी हासिल करता है |

अपने राजनितिक जीवन के दौरान अक्सर Deenbandhu Sir Chhotu Ram की अंग्रेज़ अफसरों से भिडंत होती रहती है

पर वो कभी झूके नहीं बल्कि हर बार बड़े से बड़े अधिकारीं को पीछे हटना पड़ा था क्योंकि उनका पक्ष हमेशा न्यायिक व सच्चा होता था |

बात उन दिनों की है जब मिस्टर वोल्स्टर रोहतक का डिप्टी कमिश्नर था | उसमे चौधरी छोटूराम, लाला श्यामलाल, मियां मुस्ताक हुसैन आदि सत्ताईस प्रमुख लोगों को निर्वासन (देश निकाला) की सजा देने के लिए कमिश्नर द्वारा गवर्नर को लिख दिया |

पर जिले के एस.पी. मोरी जो कई साल से रोहतक में रहता था उसने सरकार को लिखा कि इससे स्थिति और भी खराब हो जाएगी | उग्र भाषण करने वाले लोग ओर ही है | कमिश्नर ने भी समर्थन नहीं किया |

इस प्रकार निर्वासन तो DC मिस्टर वोल्स्टर किसी का नहीं करा सके पर वो चौधरी छोटूराम से सीधा संघर्ष में आ गये |

वह यह तो मानते थे कि पहले विश्व युद्ध में Deenbandhu Sir Chhotu Ram ने सरकार की बड़ी सहायता की थी |

हम पढ़ रहे है Deenbandhu Sir Chhotu Ram

Deenbandhu Sir Chhotu Ram

उन्हें यह भी याद था कि वो उस समय फ़ौज में कमांडर थे तो चौधरी छोटूराम के अंग्रेजी के लेखों को सैनिकों को पढकर सुनाया करते थे |

उन्हें यह भी पता था कि Deenbandhu Sir Chhotu Ram एक युक्तियुक्त व्यक्ति है |

किन्तु एक बात उन्हें चौधरी छोटूराम की खटकती थी कि वह एक निश्चित प्रोग्राम के अनुसार चल रहा था |

उन्हें उस प्रोग्राम की पूर्ति के लिए यदि सरकारी सहयोग मिलता है तो वह इसे ख़ुशी से इस्तेमाल करता है |

पर यदि कोई सरकारी अधिकारी उनके प्रोग्राम में बाधक है या उसके विरुद्ध आचरण करता है तो उस अधिकारी की कतई परवाह नहीं करता 

मिस्टर वोल्स्टर के अनुसार अंग्रेजों का सही आज्ञा-पालक वही व्यक्ति हो सकता है जो केवल अपने स्वार्थों पर ध्यान रखता हो |

उसी से ब्रिटिश सरकार काम निकाल सकती है | छोटूराम जैसा व्यक्ति है उससे सरकार उस तरह का काम नहीं ले सकती |

इस लिए इस प्रकार के आदमिओं के उत्थान में सरकार को कोई सहयोग नहीं देना चाहिए |

Deenbandhu Sir Chhotu Ram

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छोटूराम ने यदि बाहरी मोर्चे (फ़्रांस, रुस और जर्मन से प्रथम विश्व युद्ध) लड़ाई में सरकार की मदद करी है तो ब्रिटिश सरकार ने उसका मुआवजा ख़िताब, व मुरब्बे देकर चूका दिया है |

लेकिन अब यदि वह घरेलू मोर्चे यानि भारत के भीतर सरकार विरोधी आन्दोलन को दबाने में सरकार की मदद नहीं करता बल्कि उल्टा उस आन्दोलन का सहयोग करता है तो उसे क्यों न हम दबाये, उसके होंसले को पस्त करे |

इसी इरादे के साथ वोल्स्टर साहब चौधरी छोटूराम के पीछे पड गया | उनका इस प्रकार का ख्याल उन परिस्थितियों में न तो जिला पुलिस के कप्तान को जंचा न ही कमिश्नर को |

कमीश्नर से ना होने के बाद वोल्टर ने गवर्नर से चौधरी छोटूराम के विरुद्ध देश द्रोह का मुकदमा चलाने की इजाजत मांगी |

इस मामले की जानकारी जिस समय लाहौर राष्ट्रीय क्षेत्र में फैली तो चौधरी साहब के मित्र लालचंद, सर उमर हयात खान, सरदार बहादुर गज्जन सिंह और सर सैय्यद महदी हसन आदि ने गवर्नर पर प्रभाव डाला कि समस्त इलाके की शांति के लिए दीप्ती कमिश्नर के मनोबल को कम करना ही पड़ेगा |

इस प्रकार गवर्नर ने भी वोल्टर के प्रताव को नामंजूर कर दिया, लेकिन इससे दीप्ती कमिश्नर के अहम को ठेस पहुंची |

अब उसने पंजाब हाई कोर्ट को लिखा कि छोटूराम और उनके विचार के कुछ लोगों को वकालत से अयोग्य घोषित कर दिया जाये |

Deenbandhu Sir Chhotu Ram

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कुछ समय बाद जब हाई कोर्ट से कोई खबर न आई तो अंग्रेज़ अफसर को लगने लगा कि वह एक और हार की तरफ बढ़ रहा है | 

अब उसने समझौता करने की कोशिश करी, लेकिन सर चौधरी छोटूराम ने ऐसी कोशिस को नकार दिया |

चौधरी साहब ने अपने मित्रों से कहा कि सत्य की हमेशा जीत होती है, और यह उस अंग्रेज़ अधिकारी के सामने स्पष्ट रूप से चमक उठेगी, जब उसके सामने हार खड़ी होगी |

समझौता आदि में विप्ल होकर जब दीप्ती को सफलता हाथ नहीं लगी तो उन्होंने सरकार से सिफारिस करी कि युद्ध के समय जीत के उपलक्ष्य में दी गयी सौ एकड़ जमीन चौधरी छोटूराम से छिन ली जाये |

उनका यह प्रस्ताव में सरकार ने नामंजूर कर दिया | इन तमाम कारवाही के दौरान दीनबन्धु सर चौधरी छोटूराम अपने मत पर अडिग रहे |

रोहतक के डी० सी० मि० वोल्सटर (1919-20 ई०) ने चौ० छोटूराम की देशभक्ति तथा सरकार के खिलाफ विद्रोह फैलाने के आरोप में उन पर भारतीय दंड विधान की धारा 124-ए के अधीन मुकदमा चलाने की आज्ञा ले ली और देश निकाला की सजा देना निश्चित कर लिया।

इस पर अनेक नेताओं तथा भारी संख्या में किसानों ने डी० सी० का जोरदार विरोध किया। गवर्नर ने मुकदमा चलाने के आर्डर रद्द कर दिये। इस प्रकार एक स्वाभिमानी भारतीय के नाते चौ० छोटूराम ने एक घमण्डी अंग्रेज को नीचा दिखाया क्योंकि न्याय और सत्य चौधरी साहब के पक्ष में थे।

बात इतनी थी कि चौ० छोटूराम ने उस डी० सी० वोल्सटर की जी-हजूरी और चापलूसी कभी नहीं की। (दीनबन्धु चौधरी सर छोटूराम जीवन-चरित्र, पृ० 17-18, लेखक प्रो० हरिसिंह, खेड़ीजट)।

उन्होंने बदला लेने की भावना से काम कर रहे अंग्रेज़ अधिकारी की तमाम चालों का मुकाबला करके उसे पटकनी दी पर कभी न झुके | 

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वास्तव में चौ० छोटूराम गद्दार नहीं थे। यदि छोटूराम ही गद्दार थे, तो हरयाणा और पंजाब में शायद ही कोई देशभक्त रहा हो।

वस्तुतः उनका कांग्रेस से हट जाना या विरोध करना न तो देश के साथ गद्दारी थी और न ही द्रोह।

क्या सुभाषचन्द्र बोस तथा अनेक सम्माननीय राष्ट्रवादियों ने ऐसा नहीं किया था?

कोई मनुष्य कांग्रेस या किसी अन्य राजनीतिक पार्टी में शामिल हो जाने से ही देशभक्त या देशसेवक नहीं बन जाता।

प्रत्येक पार्टी में देशद्रोही भी होते हैं। यह भावना तो उसके मन के विचारों से होती है जो उसके रक्त में विद्यमान है।

किसी भी राजनैतिक पार्टी में रहकर या दूर रहकर भी अनेक मनुष्य देशभक्त हुए हैं और देश के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे गए हैं।

सर छोटूराम ने भारत की स्वतन्त्रता के प्रश्न पर कभी भी अंग्रेजों से समझौता नहीं किया। अपने देश की परतन्त्रता उन्हें कांटे की तरह चुभती थी और उसे समाप्त करना – पर संवैधानिक तरीके से, उनके जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य था।

उनके अपने शब्दों में – “भारत की राजनीतिक परतन्त्रता और विदेशी शासन मुझे ऐसे ही कचोटते हैं जैसे किसी भी अन्य देशभक्त भारतीय को अथवा किसी भी सामान्य मानव को।”

बिगड़ती हुई भारत की आर्थिक दशा पर आंसू बहाते हुए चौ० छोटूराम ने अंग्रेज सरकार के विरुद्ध बड़ी तीखी बातें कही थीं।

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“साफ जाहिर है कि गोरे बनियों की संगीनों की छाया में हमारे ऊपर काले बनिए शासन कर रहे हैं। देश का दोहन (चूसना) आरम्भ से ही गोरे बनियों ने इन काले बनियों के माध्यम से किया है।

दोनों प्रकार के शोषकों से देश को जब तक मुक्त नहीं कराया जाएगा तब तक कोई भी सुखी नहीं रह सकता।”

इसके अतिरिक्त किसानों की दुर्दशा के लिए सरकार को दोषी ठहराते हुए चौ० छोटूराम ने अंग्रेजों को खूब लताड़ दी है।

क्या कोई उन दिनों पंजाब व हरयाणा में अंग्रेज सरकार और उसकी नौकरशाही को ऐसे धमकाने का साहस रखता था?

(रहबरे आजम स्मारिका 1985-86, सर छोटूराम मिशन, खेड़ीजट, लेख डा० के० सी० यादव)।

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चौ० छोटूराम ‘खुदी के पुजारी’ थे, वे कभी भी किसी अंग्रेज से नहीं दबे।

गवर्नर मालकम हेली के निर्णय एवं प्रार्थना पर भी 1924 ई० में चौ० छोटूराम ने अंग्रेज केसन को पंजाब विधान परिषद् (कौंसिल) का अध्यक्ष नहीं बनने दिया था।

अंग्रेज एच० ए० केसन आई० सी० एस० 1919-21 तक अम्बाला डिवीजन का कमिश्नर रहा।

इसकी बजाए सर छोटूराम ने पंजाब कौंसिल का अध्यक्ष जमींदार लीग के अबुल कादिर को बनाया और इसी पार्टी का उपाध्यक्ष सरदार महेन्द्रसिंह को बनाया।

इस प्रकार 2 जून, 1942 में लार्ड वेवल वायसराय ने कृषिमन्त्रियों की फूड कांफ्रेंस बुलाई और गेहूं की कीमत 6 रु० प्रति मन प्रस्तावित की।

चौ० छोटूराम ने 10 रु० प्रति मन का प्रस्ताव रखा। लार्ड वेवल ने स्पष्ट कहा कि गेहूं की कीमत 6 रु० प्रति मन ही रहेगी।

इस पर चौधरी छोटूराम ने चुनौती दी, “खरीदना हो तो 10 रु० प्रति मन खरीदें, अन्यथा मैं गेहूं को खेतों में ही जलवा दूंगा।”

लार्ड वेवल बड़बड़ाते चले गए और चौ० छोटूराम अपनी मरोड़ के साथ पंजाब में लौटे।

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वायसराय ने पंजाब के गवर्नर पंजाब के मुख्यमंत्री से पूछा तो दोनों ने उत्तर दिया – “सर छोटूराम एक जिम्मेदार मन्त्री हैं।

वे किसानों के हितों के सामने किसी की भी परवाह नहीं करते हैं। पंजाब के जमींदार उनके पीछे हैं।

उनके बिना पंजाब सरकार चल नहीं सकती। आप गेहूं का भाव 10 रु० प्रति मन ही कर दें क्योंकि इन ही जाट किसानों के बेटे युद्ध में लड़ रहे हैं। चौ० छोटूराम को नाराज करने में बड़ा खतरा है।”

भारत सरकार ने पंजाब से 11 रु० प्रति मन गेहूं खरीदा। इस घटना से चौ० सर छोटूराम की धाक केन्द्र तक बैठ गई।

ऐसे नेता को टोडी या अंग्रेजों का पिट्ठू कहना, उनको अंग्रेजी राज्य का सहयोगी बताना एक बेबुनियाद, असत्य तथा प्रमाणशून्य बात है।

(रहबरे आजम स्मारिका 1985-86, पृ० 37; लेखक मूलचन्द जैन, भूतपूर्व सदस्य लोकसभा)।

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Deenbandhu Sir Chhotu Ram

Randhir Deswal

Hi, I am Randhir Singh a Solo Travel Blogger form Rohtak Haryana. I am a writer of Lyrics and Quotes.

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