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दलाल जाट गोत्र का इतिहास – Legends of Dalal

दलाल जाट गोत्र का इतिहास – Legends of Dalal
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दोस्तों आज मैं आपको Dalal Jat Gotra History | दलाल जाट गोत्र का इतिहास बताऊंगा जिसमे कठिन शोष द्वारा  गयी जानकारिय शामिल है | ये जानकारियां ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है जो अन्य लेखको द्वारा भी प्रकाशित की जा चुकी है |

Dalal Jat Gotra History प्राचीनकाल से है। इनका राज्य मुस्लिम धर्म की उत्पत्ति से पहले मध्यपूर्व में रहा था (देखो चतुर्थ अध्याय, मध्यपूर्व में जाट गोत्रों की शक्ति, शासन तथा निवास प्रकरण)।

मुसलमान बादशाहों की शक्ति बढने पर अनेक जाट गोत्रों की भांति दलाल जाट भी गढ़ गजनी से लौटकर अपने पैतृक देश भारत में आ गये (जाट इतिहास – उत्पत्ति और गौरव खंड पृ० 150, लेखक ठाकुर देशराज)।

Dalal Jat Gotra History

दलाल जाटों का एक दल गढ गजनी से पंजाब, भटिंडा होता हुआ जिला रोहतक में आया। पहले ये लोग सिलौठी गांव में ठहरे, फिर यहां से माण्डोठी अदि कई गांवों में आबाद हो गये। माण्डोठी से निकलकर मातन व छारा गांव बसे।

जिला रोहतक (अब झज्जर) में दलाल खाप के 12 गांव निम्न प्रकार से हैं – 1. माण्डोठी प्रधान गांव 2. छारा 3. मातन 4. रिवाड़ी खेड़ा 5. आसौदा 6. जाखोदा 7. सिलौठी 8. टाण्डाहेड़ी 9. डाबौदा 10. मेंहदीपुर 11. कसार (ब्राह्मणों का गांव) 12. खरमान (सांगवान गोत्र)।

माण्डोठी गांव से जाकर दलाल जाटों ने चिड़ी गांव बसाया। चिड़ी गांव से दलालों का गांव लजवाना (जि० जीन्द]] में आबाद हुआ। जि० हिसार में मसूदपुर, कुम्भा आदि भी दलाल जाटों के गांव हैं। जि० रोहतक में अजैब गांव में दलाल जाटों के 35-40 घर हैं।

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पलवल के पास अलीगढ रोड पर किठवाड़ी गाँव दलाल जाटों का है पूर्व मंत्री Karan Singh Dalal – Five-times MLA from Palwal. इसी गाँव से है |

 Dalal Jat Gotra History
Karan Singh Dalal – Five-times MLA from Palwal.

हरयाणा में दलाल, देशवाल, मान, सुहाग जाटों का आपस में भाईचारा है जिससे इनके आपस में आमने-सामने रिश्ते-नाते नहीं होते, क्योंकि ये चारों एक ही माता-पिता की सन्तान हैं।

दलाल जाटों की वीरता –

माण्डौठी गांव से दलाल गोत्र के चार भाई भुआल, जगराम, जटमल और गुरबा उत्तरप्रदेश में गये। वहां बड़ी वीरता से कई स्थानों पर अधिकार किया तथा कुचेसर रियासत जि० बुलन्दशहर पर शासन स्थापित किया।

वहां पर अब दलाल जाटों के 12 गांव हैं। सन् 1856 में भूरा, निघाइया दलाल जाटों ने छः महीने तक महाराजा जींद से युद्ध किया –

जि० जींद में लजवाना दलाल जाटों का बड़ा गांव है जिसमें 13 नम्बरदार थे। नम्बरदारों के मुखिया भूरा और तुलसीराम दो नम्बरदार थे। ये दोनों अलग-अलग परिवारों के थे जिनमें आपस में शत्रुता रहती थी। भूरा नम्बरदार ने अपने 4 नौजवानों को साथ लेकर तुलसी नम्बरदार को कत्ल कर दिया।

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तुलसीराम का छोटा भाई निघाईया था जिसने इस कत्ल की सरकार को कोई रिपोर्ट नहीं दी। अब निघाईया को नम्बरदार बना दिया गया। कुछ दिन बाद निघाईया के परिवार वालों ने तुलसीराम नम्बरदार के चारों कातिलों को रात्रि के समय मौत के घाट उतार दिया।

भूरा ने भी इस मामले की सरकार को रिपोर्ट नहीं दी। इस तरह से दोनों परिवारों में आपसी हत्याओं का दौर चल पड़ा।

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उन्हीं दिनों महाराजा जींद स्वरूपसिंह की ओर से जमीन की चकबन्दी की जा रही थी। उन तहसीलदारों में एक बनिया तहसीलदार बड़ा रौबीला था, जिससे जींद की सारी जनता थर्राती थी।

वह बनिया तहसीलदार लजवाना पहुंचा और चकबन्दी के विषय में गांव के सब नम्बरदारों और ठौलेदारों को चौपाल में बुलाकर सबको धमकाया। उनके अकड़ने पर सबके सिरों पर से साफे उतारने का हुक्म दिया।

इस नई विपत्ति को देख भूरा व निघाईया ने एक दूसरे की तरफ देखा और आंखों ही आंखों में इशारा कर चौपाल से नीचे उतरकर सीधे मौनी बाबा के मन्दिर में पहुंचे जो आज भी तालाब के किनारे वृक्षों के बीच में है।

वहां उन्होंने आपसी शत्रुता को भुलाकर तहसीलदार से मुकाबले की प्रतिज्ञा की। फिर दोनों हाथ में हाथ डाले चौपाल में आ गये।

Dalal Jat Gotra History
Dalal Jat Gotra History
कैप्टन कंवल सिंह दलाल भारतीय राष्ट्रीय सेना के हीरो थे। वह ब्रिटिश भारतीय सेना में एक अधिकारी थे लेकिन दूसरे विश्व युद्ध के दौरान आज़ाद हिन्द फ़ौज में शामिल हो गए। उन्होंने नेताजी सुभाषचंद्र बोस के दायें हाथ के रूप में आज़ाद हिन्द फ़ौज में सेवा दी।

यह देखकर गांव वालों ने कहा कि आज भूरा-निघाइया एक हो गये, भलार नहीं है। उधर तहसीलदार जी सब चौधरियों के साफे उनके सिरों से उतरवाकर उन्हें धमका रहे थे और भूरा-निघाईया को फौरन हाजिर करने के लिए जोर दे रहे थे।

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चौपाल में चढते ही निघांईया नम्बरदार ने तहसीलादार को ललकार कर कहा कि – हाकिम साहब! साफे मर्दों के सिर पर बंधे हैं, पेड़ के खुंड्डों पर नहीं, जब जिसका जी चाहा उतार लिया। तहसीलदार साहब उस पर बाघ की तरह गुर्राया।

दोनों ओर से झड़पों में कई आदमी मर गये। तहसीलदार भयभीत होकर प्राण रक्षा के लिए चौपाल से कूदकर एक घर में जा घुसा। वह घर बालम कालिया जाट का था। भूरा-निघांईया और उनके साथियों ने घर का द्वार जा घेरा।

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बालम कालिया के पुत्र ने तहसीलदार पर भाले से वार किया, पर उसका वार खाली गया। बालम कालिया की युवती कन्या ने बल्लम से तहसीलदार को मार डाला। यह सूचना सुनते ही महाराजा जींद ने लजवाना गांव को तोड़ने के लिए अपनी सेना भेजी।

लजवाना से स्त्री-बच्चों को बाहर रिश्तेदारियों में भेज दिया गया। गांव में मोर्चेबन्दी कायम की गई। सहायता के लिए इलाके की पंचायतों को पत्र भेजे गये। तोपचियों के बचाव के लिए वटवृक्षों के साथ लोहे के कढ़ाह बांध दिये गये।

इलाके के सब गोलन्दाज लजवाना में एकत्र हो गये। इन देहाती वीरों का नेतृत्व भूरा-निघांईया कर रहे थे। महाराजा की सेना और इन देहाती वीरों के बीच घमासान युद्ध होने लगा जो लगातार छः महीने तक चला।

चारों ओर के गांवों से इन गांव वालों को हर प्रकार की सहायता मिलती रही। आहूलाणा गांव के गठवाला मलिकों के प्रधान दादा गिरधर मलिक (जो दादा घासीराम जी के दादाजी थे) प्रतिदिन झोटा गाड़ी में भरकर गोला-बारूद भेजते थे।

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पता लगने पर राजा ने अंग्रेज सरकार से इस बात की शिकायत की तथा अंग्रेज सरकार ने उस झोटा गाड़ी को पकड़ लिया। जब महाराजा जींद सरदार स्वरूपसिंह किसी भी तरह विद्रोहियों पर काबू पाने में असफले रहे तो उन्होंने ब्रिटिश सेना को सहायता के लिए बुलाया।

ब्रिटिश सेना की तोपों की मार से लजवाना चन्द दिनों में जीत लिया गया। इस छः महीने के युद्ध में दोनों ओर के बड़ी संख्या में जवान मारे गये। भूरा-निघांईया भागकर रोहतक जिले के अपने गोत्र दलालों के गांव चिड़ी में आ छिपे।

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नसीब दलाल और जसवंत दलाल (जस्सू) गाँव चिड़ी तहसील लाखनमाजरा रोहतक और सोनित चौधरी पंवार बागपत को जाट गजट पत्रिका देते जाट लेखक चौधरी रणधीर देशवाल

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उनके भाइयों ने वहां से उनको दादा गिरधर के पास आहूलाणा भेज दिया। जब ब्रिटिश रेजीडेण्ट जींद का दबाव पड़ा तो डिप्टीकमिश्नर रोहतक ने चौ० गिरधर को मजबूर किया कि वह भूरा-निघांईया को महाराजा जींद के समक्ष करे। अन्त में भूरा-निघांईया को साथ ले सारे इलाके के मुखियों के साथ चौ० गिरधर जींद राज्य के प्रसिद्ध गांव कालवा, जहां महाराजा जींद कैम्प डाले हुए थे, पहुंचे।

उन्होंने राजा से यह वायदा ले लिया कि भूरा-निघांईया को माफ कर दिया जाएगा, तब दोनों को राजा के सामने पेश कर दिया। माफी मांगने व अच्छा आचरण का विश्वास दिलाने के कारण राजा उन्हें छोड़ना चाहता था, पर ब्रिटिश रेजिडेण्ट के दबाव के कारण राजा ने भूरा-निघांईया दोनों नम्बरदारों को फांसी पर लटका दिया।

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दोनों नम्बरदारों को सन् 1856 के अन्त में फांसी देकर राजा ने लजवाना के ग्राम निवासियों को गांव छोड़ देने का आदेश दे दिया। लोगों ने लजवाना खाली कर दिया और चारों दिशाओं में छोटे-छोटे गांव बसा लिए जो आज भी सात लजवाने के नाम से प्रसिद्ध हैं।

मुख्य लजवाना से एक मील उत्तर-पश्चिम में भूरा के कुटुम्बियों ने चुडाली नामक गांव बसाया। भूरा के पुत्र का नाम मेघराज था। मुख्य लजवाना से ठेठ उत्तर में एक मील पर निघांईया के वंशधरों ने मेहरड़ा नामक गांव बसाया।

निघांईया के छोटे पुत्र की तीसरी पीढ़ी में चौ० हरीराम थे जो रोहतक के डाकू दीपा द्वारा मारे गये। इसी हरीराम के पुत्र डाकू हेमराज उर्फ हेमा (गांव मेहरड़ा) को विद्रोहात्मक प्रवृत्तियां वंश परम्परा से मिली थीं और वे उसके जीवन के साथ ही समाप्त हो गईं।

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जेएल दलाल के बेटे Ranjiv Singh Dalal  1974 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं और 2006 में हरियाणा पुलिस के DIG पद पर रहे ।

मांडौठी गांव के सिपाही नान्हाराम दलाल की वीरता – Dalal Jat Gotra History

सन् 1900 में चीन सरकार की महारानी ने अपने देश चीन से, विदेशी उद्योगपतियों, व्यापारियों, दुकानदारों आदि को बाहर निकल जाने का आदेश दे दिया। उन विदेशियों ने अपने-अपने देशों की सरकार को इस आदेश की सूचना दी और चीन देश को न छोड़ने की लाचारी से सूचित किया।

चीन सरकार के अपने इस आदेश पर दृढ रहने के कारण 12 देशों की संयुक्त सेनाओं ने चीन देश पर चढाई कर दी और ये सेनायें सन् 1901 में चीन देश में पहुंच गईं। ये संयुक्त सेनायें ब्रिटिश, रूस, जर्मनी, अमेरिका, जापान, कनाडा, इटली, फ्रांस, स्पेन, तुर्की, पुर्तगाल और अरब देशों की थीं।

ब्रिटिश सेना के साथ छठी जाट लाइट इन्फेंट्री (6 जाट पलटन) भी चीन गई थी। चीन सरकार ने इनसे सन्धि कर ली और विदेशियों की सारी शर्तें मान लीं। इन सेनाओं को वहां कई महीनों तक रहना पड़ा।

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6 जाट पलटन के कैम्प के उत्तर में थोड़ी दूरी पर शराब का ठेका था। 6 जाट के आर० पी० पहरेदार (Regimental Police Sentries) एक छोटा बेंत लेकर कैम्प के चारों ओर दिन में पहरा देते थे, जैसा कि प्रत्येक बटालियन में यह रीति है।

रूसी हथियारबन्द सैनिक टोलियां सायंकाल 6 जाट के कैम्प के सामने से जाकर उस ठेके पर शराब पीकर आती थीं। एक दिन की घटना यह हुई कि सिपाही नान्हाराम दलाल आर० पी० सन्तरी था।

एक रूसी हथियारबन्द सैनिक टोली शराब पीकर वापस लौटती हुई, सिपाही नान्हाराम को चाकू व संगीन मारकर सख्त घायल कर गई। नान्हाराम को हस्पताल में दाखिल करवा दिया गया।

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अगले दिन पलटन के कर्नल साहब व सूबेदार मेजर उसे हस्पताल में देखने गये। अंग्रेज कर्नल ने क्रोध से नान्हाराम को यह कह दिया कि तुम एक भी रूसी सिपाही को चोट नहीं मार सके, अतः चूड़ियां व साड़ी पहन लो।

सूबेदार-मेजर ने कर्नल साहब से कहा कि हमारे सिपाहियों को छोटा बेंत के स्थान पर राईफल व गोलियां लेकर सन्तरी रहने की मंजूरी दी जाये। इससे कर्नल साहब ने यह कहकर इन्कार कर दिया कि हमारा सिपाही रूसी सैनिकों पर गोली चला देगा तो हमारा रूस के साथ युद्ध छिड़ जायेगा।

फिर सूबेदार-मेजर ने पहरेदारों को लाठी लेकर जाने की आज्ञा मांग ली। लाठियों के सिरे पर लोहे के पतरे एवं तार जड़वाए गए। नान्हा सिपाही कर्नल के अपमानित बोल को सहन न कर सका। अतः उसने अपने पूरे तौर से घाव भरने से पहले ही हस्पताल से छुट्टी ले ली।

अगले ही दिन वह लाठी लेकर पहरे पर चला गया। सायंकाल 25 रूसी सैनिकों की एक टोली जिनके पास अपनी राईफल, 50 गोलियां तथा संगीन प्रत्येक सैनिक के पास थीं, शराब पीकर वापस लौटते हुए सिपाही नान्हाराम के साथ छेड़छाड़ करने लगे।

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नान्हाराम छः फुट लम्बा तगड़ा, जोशीला वीर सैनिक था, जो अपनी पहली घटना का बदला लेने का इच्छुक था, ने एक रूसी सैनिक के सिर पर लाठी मारी जो वहीं पर ढेर हो गया। फिर बड़ी तेजी व फुर्ती से दूसरे सैनिकों पर लाठी मारना आरम्भ कर दिया। जिसको लाठी मारी, वहीं गिर पड़ा। रूसी सैनिक भयभीत होकर भाग खड़े हुए।

नान्हाराम ने उनको राईफल पर संगीन चढाने तथा गोलियां भरकर चलाने का अवसर न लेने दिया। उसने 25 सैनिकों को लाठी मार-मारकर भूमि पर गिरा दिया। इस मार से प्रत्येक की हड्डी टूट गई और गम्भीर रूप से घायल हो गए और कुछ मर भी गए।

अन्तिम 25वें सिपाही को उसके रूसी कैम्प के गेट पर पहुंचने पर लाठी मारकर गिराया था। अब सिपाही नान्हाराम ने वापस आते समय उन सब 25 रूसी सैनिकों की 25 राईफलें अपने कंधों पर ले ली और अपने कैम्प में आ गया।

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यह रिपोर्ट जब सूबेदार-मेजर ने कर्नल साहब को दी तो वह बहुत खुश हुआ और सिपाही नान्हाराम को बड़ी शाबाशी दी तथा अपने उन अपमानित शब्दों के लिए खेद प्रकट किया।
अगले दिन वहां के सब समाचार पत्रों में मोटी सुर्खी में यह सूचना छपी कि एक हिन्दुस्तानी जाट पलटन के एक जाट सैनिक ने केवल लाठी मारकर 25 रूसी सैनिकों के हथियार छीन लिये तथा उन्हें बुरी तरह घायल कर दिया।

12 देशों के सैनिक जनरल उस सिपाही नान्हाराम को निश्चित दिन पर देखने आए। इस समय 6-जाट पलटन कवायद के तौर पर पंक्ति में खड़ी हुई। पलटन के आगे कर्नल साहब और सूबेदार-मेजर के बीच में सिपाही नान्हाराम खड़े हुए।

सब जनरलों तथा अन्य कमांडरों ने सिपाही नान्हाराम से हाथ मिलाकर शाबाशी दी और उसकी वीरता के गुणगान किए। वहां पर जाट पलटन के जवानों को देखकर जर्मनी के जनरल ने कहा था कि हमारे पास वीर जाट सैनिक हों तो हम संसार को जीत सकते हैं।

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यह सिपाही नान्हाराम दलाल की अद्वितीय वीरता थी जो संसार के इतिहास में शायद ही दूसरी ऐसी घटना हुई हो।

नोट – लेखक के पिताजी हवलदार रायसिंह इसी 6-जाट पलटन में चीन गए थे। उन्होंने यह घटना अपनी आंखों से देखी थी और उन्हीं की जुबानी बताई गई नान्हाराम दलाल की वीरता की यह घटना लिखी गई है।

इसके अतिरिक्त उस पलटन के साथ चीन जाने वाले अनेक सैनिक इस प्रसिद्ध वीरता की घटना को बड़े गौरव से सुनाया करते थे। – लेखक।

 

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