Jatram Home

Captain सरदार सर सिकंदर हयात खान – यूनियनिस्ट प्रधानमन्त्री पंजाब

दोस्तों हमारा आज का विषय है  Captain Sardar Sir Sikandar Hayat Khan

Captain Sardar Sir Sikandar Hayat Khan का जन्म मुल्तान में 5 जून 1892 में हुआ था | ब्रिटिश भारत के समय में वो एक लोकप्रिय पंजाबी राजनेता थे। उन्होंने पंजाब के प्रधानमंत्री पद अपनी मृत्यु 26 दिसंबर 1942 तक का पद संभाला।

प्रारंभिक जीवन – Captain Sardar Sir Sikandar Hayat Khan

वह Wah इलाके के सीएसआई नवाब मुहम्मद हयात खान के बेटे थे, जो सर सैयद अहमद खान के करीबी सहयोगी थे और उत्तरी पंजाब के अटक जिले के खट्टर गोत्र के जाट रियासत के प्रमुख या नवाब थे।

शुरू में उन्होंने अलीगढ़ स्कूल और बाद में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में अपनी पढाई को पूरा किया गया था, और कुछ समय के लिए उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड भेजा गया था लेकिन 1915 के आसपास उनके परिवार द्वारा वापस घर को बुला लिया गया था।

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान, उन्होंने शुरुआत में अपने मूल अटक जिले में एक युद्ध भर्ती अधिकारी के रूप में काम किया और बाद में 2/67 वें पंजाब रेजिमेंट के किंग आयोग में चुने जाने वाले पहले भारतीय अधिकारी बने | बाद में 1/2 पंजाब रेजिमेंट में इसी पद पर काम किया ।

Sardar Sir Sikandar Hayat Khan

Sir Sikandar Hayat Khan

मौलाना अबदुल कलाम आज़ाद के साथ Sir Sikandar Hayat Khan

प्रथम विषय युद्ध में और उसके बाद तीसरे अफगान युद्ध में उनकी प्रतिष्ठित सेवाओं के परिणामस्वरूप, उन्हें ब्रिटिश भारत सरकार द्वारा एमबीई से सम्मानित किया गया। तीसरे अफगान युद्ध में उन्होंने कप्तान के रूप में लड़ते हुए पठानों के छक्के छुड़ा दिए थे |

1920 के बाद सर सिकंदर ने अपनी बहुमुखी प्रतिभाओं के साथ व्यापार में प्रवेश किया | अपने रईस बेक ग्राउंड और प्रबंधकीय कौशल के कारण जल्द ही WAH चाय एस्टेट, अमृतसर-कसूर रेलवे कंपनी, द पीपल्स बैंक ऑफ नॉर्दर्न इंडिया सहित कई कंपनियों के निदेशक या प्रबंध निदेशक बन गए।

Sardar Sir Sikandar Hayat Khan

सियालकोट-नरोवाल रेलवे, एसीसी Wah पोर्टलैंड सीमेंट कंपनी, Wah स्टोन एंड लाइम कंपनी मैसर्स आदि के चेयरमैन रहे | ओवेन रॉबर्ट्स, पंजाब शुगर कॉरपोरेशन लिमिटेड, मैसर्स वाल्टर लॉक एंड कंपनी, लाहौर बिजली आपूर्ति कंपनी हर जगह उनका ही दबदबा चलता था |

उन्होंने इस समय जमीनी राजनीति में भी प्रवेश किया और मजिस्ट्रेट और अटक लीगल जिला बोर्ड के अध्यक्ष बने रहे। 1935 में पंजाब में यूनियनिस्ट पार्टी का नेतृत्व लेने से पहले वह कुछ समय के लिए भारतीय रिजर्व बैंक के उप-राज्यपाल बने रहे।

राजनितिक जीवन और कैरियर Sardar Sir Sikandar Hayat Khan

Sir Sikandar Hayat Khan

2 पंजाब रेजिमेंट में अपनी captain की सर्विस के दौरान Sir Sikandar Hayat Khan

1921 में, सर सिकंदर पंजाब विधान परिषद के लिए चुने गए और उनकी प्रभावी राजनीतिक भूमिका शुरू हुई, क्योंकि वे पंजाब यूनियनिस्ट पार्टी (बाद में संघीय पार्टी के नाम से जाना जाने वाले) के प्रमुख नेताओं में से एक बन गए |

पंजाब यूनियनिस्ट पार्टी जो अखिल पंजाब की राजनीतिक पार्टी थी उसके कार्यक्रम उदार और इसे पंजाब के जमींदारों के हितों का प्रतिनिधित्व करने के लिए गठित किया था | जिनमें मुसलमान, सिख और हिंदू शामिल थे।

अपने गैर-सांप्रदायिक और एकजुट पंजाबी स्टैंड को समझाने और उसे सही ठहराने के लिए सिकंदर हयात खान कहते थे, “मैं पहले पंजाबी हूं और बाद में मुस्लिम हूं” और वास्तव में भी यह उनकी अनिवार्य दृढ़ता थी।

1924 और 1934 के बीच बेहतरीन राजनीतिक उद्यम के बाद, 1933 में न्यू ईयर ऑनर्स की सूची में उन्हें नाइट कमांडर ऑफ द ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश एम्पायर (केबीई) नियुक्त किया गया।

उन्होंने निश्चित रूप से सर फजले हुसैन से संघवादी पार्टी के नेतृत्व को संभाला। खान ने 1937 में भारत सरकार अधिनियम 1935 के अधीन चुनाव में अपनी पार्टी की जीत का नेतृत्व किया | सिख अकाली दल और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ गठबंधन ने उन्हें पंजाब का प्रधानमंत्री बना दिया।

Sardar Sir Sikandar Hayat Khan

जब खान यूनियनिस्ट प्रीमियर था, तब उन्होंने राजा गजानफ़र अली खान को संसदीय सचिव बनाने की पेशकश दी, जो विधानसभा में यूनियनिस्ट पार्टी का मजबूत बहुमत बन गया।

इस सरकार ने पंजाबी ज़मीन या कृषि समुदाय के बेहतर के लिए कई सुधार किए।

जब 1930 के दशक के अंत में भारतीय किसानों को कृषि की कीमतों और आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा, तो सर सिकंदर ने पंजाब में उनके दुख व तकलीफ कम करने के लिए कुछ बेहतरीन कदम उठाए और किसानों के सभी कर्ज़ रद्द कर दिए |

उनके कदमों की सफलता को देखकर बंगाल के प्रधानमंत्री ए के फजलुल हक ने भी वही काम किया और कानूनी प्रशासनिक उपायों का उपयोग करके, निजी स्रोतों का इस्तेमाल करके ऋण से दबे बंगाली किसानों को छुटकारा पाने के लिए मोहर मार दी |

बेशक यह कदम उठाने का श्रेय सर सिकन्दर हयात को जाता है पर इनके पीछे असली दिमाग चौधरी छोटूराम का था जिन्होंने बचपन से ही किसान की आज़ादी का कठोर प्रण लिया था और अपनी मृत्यु तक इसी प्रण को निभाते रहे |

Sardar Sir Sikandar Hayat Khan

 Sir Sikandar Hayat Khan

अपने दोनों फौजी बेटों शौकत हयात और अमजत हयात के साथ प्रीमियर Sir Sikandar Hayat Khan

Sardar Sir Sikandar Hayat Khan

खान ने गाँधी जी के 1942 भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सहयोगी शक्तियों का समर्थन किया। खान भारत की आजादी और पंजाब की एकता के लिए अंग्रेजों के साथ राजनीतिक रूप से उसी सहमती में विश्वास करते थे |

जिसमे तय किया गया था कि दूसरा विश्व युद्ध जीतने के बाद ब्रिटिश भारतीय को सत्ता सोंप देंगे और अखंड भारत को आज़ाद करके चले जायेंगे | भारत का विभाजन नहीं होने देंगे |

उनका विश्वास था कि अगर अंग्रेज़ विश्व युद्ध जीतने के बाद आज़ादी देने के अपने वादे से मुकर भी जाते है तो सेना में भारतीय सैनिक बहुमत से होंगे जो तुरंत अंग्रेजो की सत्ता पलट देंगे |

अगर भारतीय इस युद्ध में ब्रिटिश का सहयोग नहीं करते तो वह हार जाता और जर्मन गठबंधन भारत को गुलाम बना लेता | चूँकि ब्रिटिश हमारे साथ सैकड़ो साल से रह रहे थे ऐसे में अगर जर्मनी या जापान जैसा कोई देश हम पर राज़ करता तो वो ब्रिटिश से अधिक जुल्म करता |

Sardar Sir Sikandar Hayat Khan

बाद में गाँधी जी ने भी यही निर्णय लिया क्योंकि यह सही फैसला था उन्होंने आन्दोलन वापस लेकर अंग्रेजी सेना में भारतियों की भर्ती करवाई | सावरकर और उसके संगठन अखिल भारतीय हिन्दू महासभा ने भी बंगाल व महाराष्ट्र में केम्प लगाकर लाखों भारतीय सैनिको की ब्रिटिश सेना में भर्ती करी थी |

यही रुख मुस्लिम लीग ने अपनाया था सबकी एक ही सोच थी अंग्रेजों के जाने के बाद हम सत्ता शासन में बहुत से तभी होंगे जब सेना में हमारी अधिक संख्या होगी | चौधरी छोटूराम ने भी इसलिए अधिक से अधिक जाटों को सेना में भेजा था ताकि कल को गोरे अंग्रेजों के जाने के बाद काले अंग्रेजों से आसानी से निपट सके |

1937 में, आम चुनाव जीतने के तुरंत बाद उन्हें अपने कई मुस्लिम सांसदों के आंतरिक दबाव से सामना करना पड़ा | बिगड़ते साम्प्रदायिक माहौल और बंटवारे वाले पंजाबी राजनीतिक माहौल में एक संतुलित, न्यायसंगत रुख बनाए रखने की आवश्यकता देखते हुए मुहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व वाले मुस्लिम लीग से खान ने बातचीत करने का फैसला किया

Sardar Sir Sikandar Hayat Khan

खान और जिन्ना ने अक्टूबर 1937 में लखनऊ में जिन्ना-सिकंदर समझौते पर हस्ताक्षर किए | अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के साथ अपनी शक्तिशाली यूनियनिस्ट पार्टी के कट्टर मुस्लिम तत्वों का विलय कर दिया |

Sir Sikandar Hayat Khan

लखनऊ मे जिन्ना की मुस्लिम लीग में यूनियनिस्ट पार्टी का विलय करते Sir Sikandar Hayat Khan का फोटो

पंजाब और भारत में कहीं भी मुस्लिम तत्वों के विवाद को सुलझाने और उनके समुदाय के अधिकारों और हितों की सुरक्षा के लिए संयुक्त मोर्चा का गठन हुआ । समझौते के भीतर, खान ने घोषणा की कि वह “लीग में शामिल होने के लिए पंजाब में यूनियनिस्ट पार्टी के सभी मुस्लिम सदस्यों को सलाह करेंगे ।”

सिकन्दर हयात खान एक सुलझे व परिपक्क नेता तो साबित हो चुके थे पर धार्मिक मोर्चे पर वह कमजोर साबित हुए | अपने पूर्वर्ती प्रीमियर सर फजले हुसैन के मुकाबले में वो कम दृढ साबित हुए |

सर फजले हुसैन ने जिन्ना की विभाजनकारी नीति को पंजाब में लठ के जोर पर फ़ैल किया था | पर सिकन्दर हयात खान में उतना दृढ़ता का अभाव दिखा | वह अपनी पार्टी के कट्टर मुस्लिम सदस्यों और अकाली दल के कट्टर सिखों से कुछ समय ही जूझ सके और उन्होंने हथियार डाल दिए |

अकाली दल के कट्टरपंथी सिख भी जिन्ना के अलग मुस्लिम देश का समर्थन कर रहे थे क्योंकि उन्हें भी आशा थी कि इस तरह उन्हें अलग स्वतंत्र सिख राष्ट्र मिल जायेगा | उधर जिन्ना देश भर में घूम घूमकर मुस्लिमों को अपना खुद का राष्ट्र लेने पर भड़का रहे थे |

Sardar Sir Sikandar Hayat Khan

Sir Sikandar Hayat Khan

Sardar Sir Sikandar Hayat Khan

1937 में हिन्दू महासभा के जोधपुर सम्मेलन में इसके अध्यक्ष सावरकर ने भी दो राष्ट्र सिद्धांत पर मोहर लगा दी थी जिसके अनुसार ब्रिटिश भारत में दो राष्ट्र रहते है | एक हिन्दू राष्ट्र एक मुस्लिम राष्ट्र | यह साथ साथ नहीं रह सकते इसलिए दो अलग अलग राज्य स्वतंत्र राष्ट्रों का रूप ले |

कुछ दिन बाद जिन्ना की रेल्ली में लिए गये उस लाहौर संकल्प के मुख्य समर्थकों और आर्किटेक्ट्स में शामिल हुए जो अर्ध-स्वतंत्र मुस्लिम (रक्षा, करेंसी, विदेश निति और संचार को छोडकर सभी अधिकार राज्य सरकार के पास हो) बहुमत वाले क्षेत्र के लिए सहमती बना रहे थे |

जिस संकल्प ने बाद में एक स्वतंत्र पाकिस्तान की मांग का रूप ले लिया |

पंजाब के प्रधानमंत्री सर सिकंदर हयात खान अपने आखिरी दिनों में बहुत ही परेशान थे और विवादों व कड़वाहटों से जूझ रहे थे | 1940 के बाद से खक्सर कबीलाई लगातार पाकिस्तान की मांग से परेशान कर रहे थे |

Sardar Sir Sikandar Hayat Khan

Khizar Hayat Tiwana

जिन्ना को लाहौर से कान पकडकर बाहर भगाने के बाद यूनियनिस्ट पार्टी के सदस्य जिनमे सर छोटूराम, मलिक खिजर हयात तिवाना, राजा गजनफर खान और सरदार गज्जन सिंह प्रमुख थे

मलिक बर्कत अली और अन्य के साथ मुस्लिम लीग के भीतर उनका कठिन समय था और विधानसभा में भाई परमानंद और मास्टर तारा सिंह पाकिस्तान और पंजाबी एकता पर उनके गलत रुख पर सवाल उठा रहे थे।

चौधरी छोटूराम यूनियनिस्ट पार्टी की टूटती डोर को कब तक सम्भाले रखते अब उन्होंने विभाजन के सवाल पर सिकन्दर हयात का साथ छोड़ दिया | उन्होंने कठोर निर्णय लिया कि पाकिस्तान नहीं बनेगा बेशक कोई कितना जोर लगा ले |

चौधरी छोटूराम ने अपने गृह मंत्री के अधिकारों का प्रयोग करके जिन्ना को रातों रात लाहौर से खदेड़ दिया | पाकिस्तान के सवाल पर सर खिजर हयात और सर चौधरी छोटूराम एकमत थे | वो किसी भी कीतम पर पंजाब के टुकड़े नहीं होने देना चाहते थे |

अब सिकन्दर हयात खान के नेतृत्व को चुनौती दी गई, जब मलिक खिजर हयात खान तिवाना  ने 1944 में मुस्लिम लीग की मांगों को मानने से इंकार कर दिया | जिन्ना ने 1937 में लखनऊ में किये गये सिकंदर-जिन्ना समझौते को निरस्त कर दिया।

Sardar Sir Sikandar Hayat Khan

एक असंभव ‘राजनैतिक मोज़ेक’ को एकजुट करने की कोशिश ने सिकन्दर हयात खान के स्वास्थ्य पर भारी असर किया, शायद यह उसके लिए पहला झटका था । वायसराय लिनलिथगो से लेकर सर लियो अमेरी के एक पत्र में खान की मृत्यु के दो दिन बाद, वायसराय ने खान का एक लंबा व्यक्तिगत मूल्यांकन कुछ इस तरह पेश किया |

पिछले कुछ दिनों की गम्भीर त्रासदी से सिकंदर की अचानक मौत हो गई । उसके दोष थे, जैसा कि आप और मैं अच्छी तरह से जानता हूं। वह वास्तव में एक तंग कोने में भरोसा करने के लिए वाला अक्कड व्यक्ति था, और कई अवसरों पर उसने मुझे गंभीर शर्मिंदगी का कारण बना दिया था।

लेकिन उनके पास उपलब्धि का एक उल्लेखनीय रिकॉर्ड था, और पंजाब और भारत दोनों में उनकी सेवाएं वास्तव में बहुत अच्छी थीं … मुझे हमेशा लगा … कि पंजाब सम्भालने में उनका बेहद मुश्किल हाल था और वह सबसे ज्यादा था उनकी स्पष्ट कमजोरी की संभावित व्याख्या।

Sardar Sir Sikandar Hayat Khan

Sir Sikandar Hayat Khan

लाहौर में बादशाही मस्जिद मे Sir Sikandar Hayat Khan को दफनाया गया

उन्होंने कई वर्षों तक एक नाजुक राजनीतिक मोज़ेक (अलग अलग धर्मों) को एक साथ रखा है और मैं खुद किसी भी तरह सोचकर यह नहीं कह सकता था कि कब क्या हो जाये | इस बारे में मैं निश्चिन्त था कि सिकंदर को गुस्से में भी सांप्रदायिक नहीं माना जाता था |

उनका दृष्टिकोण था जो उन्होंने किसी भी दुसरे प्रांत के किसी भी व्यक्ति की तुलना में सबसे महत्वपूर्ण प्रांत में एकता बनाये रखने में सामान्य समर्थन से बहुत अधिक सहयोग किया था। 25/26 दिसंबर 1942 के बीच अचानक दिल के दौरे पड़ने के कारण खान की मृत्यु हो गई। उन्हें लाहौर में बादशाही मस्जिद के नक्शे पर दफनाया गया है।

Sardar Sir Sikandar Hayat Khan

Randhir Deswal

Hi, I am Randhir Singh a Solo Travel Blogger form Rohtak Haryana. I am a writer of Lyrics and Quotes.

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *