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Baba Mastnath Math Asthal Bohar Rohtak

Baba Mastnath Math Asthal Bohar Rohtak

इस नाथ सम्प्रदाय से अनेकानेक सिद्ध पुरुष मछेन्द्रनाथ, गोरखनाथ, बाबा बालकनाथ, भृतहरि , जलंधरनाथ, गोपीचन्द, पूर्ण भगत पैदा हुए जिन्होंने ब्राह्मण-विरोधी मठों को स्थापित किया ।

रोहतक स्थित Baba Mastnath Math Asthal Bohar Rohtak एक ऐसा ही मठ था । इस बोहर गांव में किसी समय में 51 फ़ंडी परिवारों को जिन्दा जलाया था, जो कि इतिहास है ।

जाटों की भाषा ही पाली भाषा है । इसमें सभी शब्द बौद्ध आधारित हैं । जैसे – अष्टा काम (अष्टांग मार्ग, बूढ़ा-ठेरा (बौद्ध थेरा), भोला-भन्तर (भोला-भन्ते), बातों के तूत (स्तूप) बांधना, मठ (बौद्ध मठ) मरना, कसूत काम (स्तूप कार्य), थारा (थेर) इत्यादि ।

बुद्ध के नेतृत्व में जाटों ने सारे एशिया से ब्राह्मणवाद को खत्म कर दिया था । इसी बात की खुन्दक में पाखण्डी कहता है कि परशुराम ने 21 बार धरती को क्षत्रियों से शून्य कर दिया था ।

अस्तु ‘ब्राह्मण’बौद्ध धर्म के खिलाफ षड्यन्त्र करने लगा तथा उसे असली सफलता तब मिली जब सम्राट अशोक मोर (जाट) के पोते बृहद्रथ की उसी के ब्राह्मण सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने धोखे से हत्या कर दी तथा प्रतिक्रान्ति का दौर शुरू कर दिया ।

इस दौर में इन फ़ंडी लेखकों ने बुद्ध का बुद्धू बना दिया गया, भन्ते का भौन्दू/भूण्डा हो गया, बर्हियात (बौद्ध सम्प्रदाय) का वाहियात बना दिया गया, ज्याणी मोर का ज्याणी चोर हो गया, थेर का ढेढ़ हो गया, त्रिशरण-पंचशील की चर्चा करना तीन-पांच करना हो गयी । इस दौर में बौद्ध धर्म ‘बोदा’ हो गया ।

इसी दौर में बौद्ध जाट गुरुओं ने भागकर जंगलों की शरण ली । जंगल में ये गंजे ना रहकर बड़े बाल रखकर रहने लगे क्योंकि गंजा सिर बौद्ध का प्रतीक था और ऐसे हर सिर पर एक सौ स्वर्ण मुद्रा का ईनाम था ।

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इसी प्रतिक्रान्ति के दौर में जाटों ने बुद्ध को ‘शिव’ कहना शुरू कर दिया और कालान्तर में इन्हीं बाल बढ़ाए हुए प्रच्छन्न बौद्ध संन्यासियों की परम्परा से शिवभक्त नाथ सम्प्रदाय की स्थापना हुई ।

नाथ शब्द ‘नाग’ से बना था और सिद्ध शब्द ‘सिद्धार्थ (बुद्ध का बचपन का नाम सिद्धार्थ’) से बना था ।

इस नाथ सम्प्रदाय से अनेकानेक सिद्ध पुरुष मछेन्द्रनाथ, गोरखनाथ, बाबा बालकनाथ, भृतहरि , जलंधरनाथ, गोपीचन्द, पूर्ण भगत पैदा हुए जिन्होंने ब्राह्मण-विरोधी मठों को स्थापित किया ।

रोहतक स्थित ‘बोहर मठ’ एक ऐसा ही मठ था । इस बोहर गांव में किसी समय में 51 फ़ंडी परिवारों को जिन्दा जलाया था, जो कि इतिहास है ।

पं० शंकराचार्य ने 9वीं सदी के प्रारंभ में बौद्ध धर्म का विनाश करके हिन्दू (ब्राह्मण) धर्म की पुनः स्थापना की थी और भारत के चारों कोनों में हिन्दुओं की चार पीठ स्थापित की। लेकिन जाट क्षेत्र में कोई नहीं।

इस ब्राह्मण धर्म की पुनःस्थापना पूरी तरह पौराणिक ब्राह्मणवाद पर ही आधारित थी, लेकिन कुछ सुधारों के साथ।

जब इन पीठों में शंकराचार्य मनोनीत करने की बात आई तो उन्होंने चारों शंकराचार्यों का चुनाव दक्षिण भारत के ब्राह्मणों से किया, उनमें से दक्षिण की रामेश्वर पीठ में मध्य भारत से मंडन मिश्र उर्फ सुरेशाचार्य को बैठाया बाकी सभी सुदूर दक्षिण भारत से थे।

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उत्तर में बदरिकाश्रम की पीठ का शंकराचार्य तोटकाचार्य केरल के नमुदरीपाद ब्राह्मण थे लेकिन उन्होंने उत्तरी भारत से अर्थात् ब्राह्मणों की पीठ काशी (काशी प्राचीन में बौद्ध धर्मियों का शहर था) से किसी भी ब्राह्मण को इस योग्य नहीं समझा क्योंकि वे उन्हें भ्रष्टाचारी समझते थे।

वैसे पं० शंकराचार्य जी ने धर्म के साथ-साथ अर्थशास्त्र को भी नहीं भुलाया क्योंकि उन्होंने दक्षिण भारत में पैदा होने वाले नारियल को देवी-देवताओं की उपासना में भेंट की प्रथा चलाई ताकि अपने दक्षिण के लोगों को आर्थिक तौर पर फायदा हो सके।

पं० शंकराचार्य ने मायावाद के सिद्धान्त का जमकर प्रचार किया और उसने चिल्ला-चिल्ला कर कहा कि सभी ब्रह्म है तथा ब्रह्म के सिवाय कुछ नहीं। बाकी सब चीजें झूठी हैं। अर्थात् इनका ‘ब्रह्म सत्यम् जगत मिथ्या’ का उपदेश रहा।

लेकिन इसी ब्राह्मण ने वेदान्त के दर्शनसूत्र (1-3-34) में फिर क्यों लिखा कि यदि कोई शूद्र वेद को सुन ले तो उसके कान में शीशा और लाख भरवा देनी चाहिए? यही विचार उनके नारी के बारे में हैं। फिर कहां गया उनका ब्रह्म का सिद्धान्त?

क्या शूद्र और नारी में ब्रह्म नहीं है? कितना बड़ा खोखलापन है इस ब्राह्मण धर्म में! इसी को हिन्दू सनातन धर्म कहते हैं जबकि सनातन धर्म तो वैदिक और बौद्ध धर्म ही है। वैदिक काल से सरस्वती नदी एक धार्मिक नदी रही लेकिन शनैः शनैः वह सूखती गई

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वेदों में सरस्वती नदी का बार-बार उल्लेख आया है, लेकिन गंगा का केवल तीन ही बार उल्लेख है) तो पं० शंकराचार्य जी ने गंगा को हिन्दुओं की पवित्र नदी घोषित कर दिया तो साथ में एक गपोड़ भी जोड़ दिया कि सरस्वती अब इलाहाबाद में गंगा-जमना में धरती के नीचे से आकर मिल गयी है और वहां अब त्रिवेणी हो गई है। यह भी दुनिया का एक बड़ा झूठ है।

सरस्वती नदी अपने उदगम से जमीन के नीचे इलाहाबाद में आकर कैसे मिल सकती है? हमने तो यह देखा है कि हमारे खेतों में एक छोटा पानी का नाला टूटने पर भारी मिट्टी का कटाव करता है लेकिन सरस्वती नदी हजारों साल से एक फुट जमीन को भी नहीं काट पाई।

यह सभी पाखण्डवाद का लूटने और कमाने-खाने का एक धंधा है। इसलिए इन्होंने ही सबसे पहले गंगा के किनारे गंगोत्री मंदिर बनवाया और गंगा नदी को हिन्दुओं की पवित्र नदी घोषित किया, जिसमें डुबकी लगाने से सब पापों का अन्त होने लगा |

आज इसी गंगा नदी के किनारे गंगोत्री से लेकर फराक्का बांध तक (बंगाल) भारतवर्ष के अधिक निर्धन लोग रहते हैं जिनके पाप तो धुल पाये या नहीं, लेकिन गरीबी नहीं धुल पाई।

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इसी गंगा की तर्ज पर गरीबी को पालने के लिए देश में अनेक गंगाएं बन गई। उदाहरण के लिए जम्मू क्षेत्र में ‘गुप्त गंगा’, मध्य प्रदेश में ‘बैन गंगा’, किस्तवाड क्षेत्र में ‘काली गंगा’ और तामिलनाडू में ‘शिव गंगा’ आदि-आदि।

ये सभी गंगा भाग्य के भरोसे रहने का पाठ पढ़ाती हैं और स्वर्ग का झूठा लालच देकर हिन्दू समाज को निकम्मा बना रही हैं।

आस्था के नाम से पाखण्ड व अंधविश्वास फैलाना सामाजिक अपराध है। लेकिन पाखण्डी लोगों ने वास्तविक जाट गंगा जिसे जाट कस्सियों से खोदकर लाये, भुलाने का प्रयास किया है।

जब शंकराचार्य महाराज 32 वर्ष की अवस्था में ईश्वर को प्यारे हो गये तो उनकी मृत्यु के पश्चात् इस नवीन ब्राह्मण धर्म में फिर से अधिक भ्रष्टाचार की बाढ़ आ गई और यह धर्म फिर से घोर अंधविश्वासों और कुरीतियों में फंसता चला गया।

इस ब्राह्मणवादी धर्म की चपेट में राजपूत आदि कुछ जातियां पूरी तरह आ गई लेकिन जाटों के संस्कार हिन्दू प्रतीत होते हुए भी प्रछन्न बौद्धधर्मी थे, जिसमें कुछ संस्कार आज भी जाट चरित्र में स्पष्ट दिखते हैं।

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इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं है कि सातवीं सदी तक जाट बौद्धधर्मी थे, क्योंकि उनके राजा भी बौद्धधर्मी थे।

यह एक शोध का विषय हो सकता है कि स्वयं महात्मा बुद्ध जाट जाति में पैदा हुए तथा भारतीय इतिहास लिखता है कि वे क्षत्रिय वंश के शाक्य-गोत्री थे।

जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी भी जाट क्षत्रिय जाति से थे। इसीलिए इन इतिहासकारों का कर्तव्य बनता है कि वे सिद्ध करें कि वे किस जाति के थे?

हालांकि ‘जाट वीरों का इतिहास’ के लेखक कैप्टन दलीपसिंह अहलावत ने अपने ग्रन्थ में इन्हें जाट जाति का सिद्ध किया है। यह ऐतिहासिक तथ्य है कि बौद्ध जाटों ने इस धर्म को संसार में फैलाया, जो आज लगभग 28 देशों में यह धर्म स्थापित है। लेकिन आज यह धर्म अपनी ही जन्मभूमि पर दम तोड़ रहा है।

आज लोग इस बात से बड़े खफा हैं कि मुसलमानों ने हिन्दुओं के मन्दिरों को क्यों तोड़ा। क्या मैं कट्टरवादी हिन्दुओं से पूछ सकता हूँ कि उन बौद्धधर्मी जाटों के मठ किसने तोड़े?

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यह बड़ा लम्बा इतिहास है कि यह धर्म ब्राह्मणवाद का किस प्रकार शिकार हुआ। लेकिन संक्षेप में यह बतलाना आवश्यक है कि कई इतिहासकारों ने ‘हदीस’ के हवाले से लिखा है कि

जब हजरत मुहम्मद करबला से मक्का लौटने लगे तो उन्होंने अपनी सुरक्षा की मदद जाटों से ली थी तथा करबला के खजाने की जिम्मेवारी जाटों के सहारे छोड़ी थी।

इमाम बुखारी ने अपनी पुस्तक ‘किताबल अदबुल मुफरद’ में लिखा है कि जब पैगम्बर साहब की दूसरी बेगम आयशा बीमार पड़ी तो उसका इलाज एक जाट चिकित्सक ने किया था।

पैगम्बर साहब ने अरब की रक्षा के लिए जाटों को ‘अन्तकिया’ क्षेत्र में बसाया था। अरब में जाटों को ‘जट्ट या जत’ नाम से पुकारा जाता है। ‘Rise of Islam’ अंग्रेजी की पुस्तक में यूरोपियन इतिहासकार मण्डली लिखती है कि दसवीं सदी में अरब व मध्य एशिया में ईसाई धर्म के प्रचारक पोप अपने प्रचार में लगे थे, लेकिन ये भ्रष्टाचारी हो गये थे, जिस कारण जाटों ने इन्हें वापिस यूरोप में धकेल दिया।

बौद्ध ग्रन्थ ‘अभियान जातक’ में जाटों के समुद्री बेड़े का विस्तार से वर्णन मिलता है। मध्य एशिया में सबसे पहले इस्लाम धर्म अपनाने वाला जाट राजा गजन खान था जो एक बौद्ध नाम था। यही खान शब्द इस्लाम में लोकप्रिय बना जिसने पठानों को बड़ी शौहरत दिलवाई।

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जाट व कुछ अन्य सहयोगी जातियों के चरित्र में जो आदर्शता प्रतीत होती है वह सभी की सभी प्राचीन बौद्ध धर्म की देन है।

डा० धर्मकीर्ति ने अपनी एक शोध पुस्तक “जाट जाति प्रछन्न बौद्ध है” लिखकर इसे ऐतिहासिक धरा पर सिद्ध कर दिया है।

वास्तव में यह धर्म स्थापित करने के समय भी बहुत बड़ा गोलमाल हुआ था क्योंकि उस समय कुमारिल भट्ट ब्राह्मण ही भारत में बौद्ध धर्म के एक बहुत बड़े विद्वान् थे।

लेकिन वे जानबूझकर पं० शंकराचार्य से शास्त्रार्थ में हार गए और फिर शंकराचार्य जी के साथ मिल गए।

जरूर दाल में कुछ बड़ा काला था। इसी के बाद हिन्दू धर्म में मुर्गे, बकरे व भैंसों आदि की बलि चढ़ने लगी।

जब यह ब्राह्मण धर्म फिर से अपने पतन की तरफ लौट रहा था, उसी समय 19वीं सदी में पं० स्वामी दयानन्द उर्फ पं० मूलशंकर शर्मा जी प्रकट हो गये।

जब उन्होंने सन् 1875 में बम्बई में आर्यसमाज की स्थापना की तो 96 सभासदों में से 39 ब्राह्मण, 24 अरोड़ा व खत्री, 18 गुजराती/मराठी बनिये तथा शेष 15 लोग वहाँ की स्थानीय जातियों से थे। इनमें से कोई एक भी जाट नहीं था।

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स्वामी दयानन्द का उद्देश्य गिरते हुए ब्राह्मण धर्म को फिर से ऊपर उठाना तथा उसमें सुधार करना था। अर्थात् उनका उद्देश्य ब्राह्मण जाति में सुधार करना था जिसमें अनेक बुराइयां आ चुकी थीं।

जबकि जाट जाति अपने बौद्धधर्मी संस्कारों के कारण इन बुराइयों से कोसों दूर थी, जैसे कि माँस-मिट्टी खाना, शराब पीना, अय्यासी करना व विधवा लड़कियों का पुनः विवाह न करना आदि-आदि।

याद रहे, ब्राह्मण वर्ण एक ऐसा वर्ण है जिसमें केवल एक ही जाति है – ब्राह्मण।

कहने का अर्थ है कि स्वामी दयानन्द का यह आर्यसमाज ब्राह्मणवाद के सुधार के लिए था न कि जाटों के सुधार के लिए।

एक बार स्वामी जी जब रिवाड़ी में ठहरे थे तो उनसे कुछ जाट लोग मिलने गये तो उन्होंने स्वामी जी से आग्रह किया कि वे उनके यहाँ आकर प्रवचन करें।

इस पर स्वामी जी ने कहा था कि मैं आपको क्या प्रवचन करूं, जाट लोग तो पहले से ही आर्यसमाजी हैं।

लेकिन जाट इस उत्तर को गहराई से नहीं समझ पाये और उत्साहित होकर आर्यसमाज का झण्डा उठा लिया।

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जाट जाति बहुत ही ऊर्जावान् जाति रही है। जाट का अर्थ ही एकजुट होना होता है अर्थात् बिखरी हुई शक्ति को इकट्ठा करना।

जाट तो एक शक्ति है, जाट बारूद के समान है। यदि इसी बारूद को कोने में डाल दिया जाये तो यह राख के समान प्रतीत होती है जैसे कि आज हो रहा है।

वरना इसी बारूद से बड़े-बड़े पहाड़ तोड़कर सड़क और बांध बनाये जा सकते हैं और यदि यही बारूद गलत हाथों में (नेतृत्व) में पड़ जाये तो बड़े से बड़ा विध्वंश या सर्वनाश किया जा सकता है। इस ऊर्जावान् जाति में हमेशा ऊर्जावान् पुरुष और महापुरुष पैदा होते रहे हैं।

आर्यसमाज का झण्डा भी इन्हीं ऊर्जावान् जाटों ने उठा लिया। जबकि इस झण्डे से हम जाटों का किसी भी प्रकार का कोई सम्बन्ध नहीं था और न ही होना चाहिए था।

लेकिन हमारे इन महान् ऊर्जावान् लोगों ने वैदिक धर्म व संस्कृति की पुनःस्थापना का अनचाहा ठेका ले लिया और जब जाट जाति को ‘कानवैन्ट’ स्कूलों (अंग्रेजी स्कूल) की परम आवश्यकता थी तो इन्होंने संस्कृत स्कूलों व गुरुकुलों की बाढ़ ला दी।

जो कार्य ब्राह्मणवाद ने करना चाहिये था, वह कार्य हमने अपने हाथों में ले लिया। इस देश के चरित्र और वैदिक धर्म के हम ठेकेदार बन गये। जबकि इस ठेकेदारी से हमारा कोई भी लेना-देना नहीं था।

दूसरी तरफ इसी सभा में जो 96 सदस्य थे उनकी संतान स्वामी दयानन्द के नाम पर अंग्रेजी पढ़ती रही और बड़े-बड़े सरकारी पदों पर पहुंचते रहे।

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इसका जीवन्त उदाहरण है महात्मा हंसराज (हिन्दू पंजाबी खत्री) जिन्होंने ‘दयानन्द एंग्लो वैदिक’ (डी.ए.वी.) स्कूलों व कालेजों की बाढ़ ला दी और वहाँ पंजाब में स्वामी दयानन्द के नाम पर आधुनिक शिक्षा पढ़ाई जाती रही।

यह अलग बात है कि इन्हीं लोगों ने जैसे कि ज्ञानप्रकाश अरोड़ा (हिन्दू पंजाबी अरोड़ा) जैसों ने इन संस्थाओं को जी भरकर लूटा भी। इस लूट पर ‘पंजाब केसरी’ ने सन् 2003 में धारावाहिक लेख लिखे।

आगे चलकर यही नाथ सम्प्रदाय आधुनिक सिख पन्थ में तब्दील हो गया जो पाखंड विरोधी विचारधारा के साथ सयुंक्त पंजाब जाट कौम की पहली पसंद बना |

जिसे रोकने के लिए ब्राह्मणवाद को एक पाखंडी मूल शंकर तिवारी (दयानन्द ) को पैदा करके आर्य समाज के बैनर तले जाटों को सिख बनने से रोकना पड़ा |

मेरा कहने का अर्थ है कि जो लोग आर्यसमाज की स्थापना में सहायक थे उनका कोई भी बच्चा कभी गुरुकुल नहीं गया जबकि आज भी गुरुकुलों में 90 प्रतिशत जाटों के बच्चे हैं।

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जो काम हमारा नहीं था वह काम हमने अपने हाथों में लिया और वही आर्यसमाज साफ तौर पर लंगोट और चड्डी की संस्कृति में बंट गया।

हमारे हाथ लंगोट आया और आज यही लंगोट इस चड्डी से बुरी तरह से पिछड़ रहा है अर्थात् पिछड़ चुका है।

हमें कोई बतलाये कि गुरुकुलों में पढ़नेवाले कितने बच्चे सिविल सर्विसिज पास कर पाये?

इन गुरुकुलों की उपयोगिता केवल संस्कृत के मास्टर पैदा करने तक सीमित रही, यह कर्तव्य ब्राह्मणवाद का था, हमारा नहीं।

ये गुरुकुल गरीब तबके के जाट किसानों की लड़कियों को मास्टर बनाने तक ही सफल रहे, जबकि आज सभी सरकारें स्कूलों में संस्कृत विषयों को हटाकर अंग्रेजी को अनिवार्य कर रही है। क्योंकि यह समय की मांग है।

चाहे प्राचीन में इन ग्रंथों में चाहे जितना विज्ञान हो, लेकिन आधुनिक युग की लगभग सभी खोजें यूरोप की देन हैं और आज विज्ञान का साहित्य विशेषकर मेडिकल व इंजीनियरिंग संस्थानों में अंग्रेजी भाषा में है और यही हमारे देश में लागू है और रहेगा।

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लेकिन जाट जाति एक के बाद एक निष्ठावान् और कर्मठ आर्यसमाजी देती रही, फिर भी हमारे हाथ क्या आया?

एक बार एक समय था कि कई अन्य जातियाँ भी अपने को राजपूत कहलाने में गर्व का अनुभव करती थीं। क्योंकि यह असत्य इतिहास के प्रचार का परिणाम था।

इसी प्रकार यह भी एक फैशन बन गया था कि कोई भी जाट पुरुष विख्यात होने पर उसे आर्यसमाजी कहा जाने लगा।

चौधरी छोटूराम को भी लोगों ने आर्यसमाजी लिखा है, जबकि सच्चाई यह है कि उन्होंने 1923 से ही मन से आर्यसमाजी विचारधारा को निकाल दिया था।

जिसका प्रमाण उनके जाट महासभा के भाषणों से प्रमाणित है और आज भी पाकिस्तान के जाट मुसलमान उन्हें आदर भाव से याद करते हैं।

इसी कारण वे जिन्ना को उसकी औकात बतलाने में सफल हुए और हिन्दू-मुस्लिम-सिक्ख और ईसाइयों को एक मंच पर खड़ा कर दिया।

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इस प्रकार इसी फैशन में जाट अपने घरों में स्वामी दयानन्द द्वारा लिखी पुस्तक ‘सत्यार्थप्रकाश’ की प्रतियां रखकर गौरव का अनुभव करने लगे।

जबकि स्वामी दयानन्द की शिक्षायें कहीं भी व्यावहारिक, राष्ट्रवादी व आधुनिक विज्ञान पर आधारित नहीं हैं। कुछ उदाहरण इस प्रकार है:-

(i) 24 वर्ष की कन्या का विवाह 48 वर्ष के पुरुष से हो तो वह उत्तम विवाह है। (पृ. 54 स.प्र.) (यह साफ तौर गैर व्यावहारिक शिक्षा है – लेखक)

(ii) ब्राह्मण वर्ण का ब्राह्मणी, क्षत्रिय वर्ण का क्षत्रिय, वैश्य वर्ण का वैश्य और शूद्र वर्ण का शूद्र वर्ण के साथ विवाह करे। (पृ. 60 स.प्र.) (यह स्पष्ट रूप से ब्राह्मणवादी विचारधारा है – लेखक)

(iii) जच्चा अपने बच्चे को केवल 6 दिन तक दूध पिलाये, इसके बाद बच्चे को दूध धाई पिलाये जिसे उत्तम खाना दिया जाये। (पृ. 20 स.प्र.) (स्वामी जी ने पूरे विज्ञान व मातृत्व को ही अमान्य कर दिया ।

(iv) आर्य वर को भूरे नेत्रों वाली नारी से विवाह नहीं करना चाहिए आदि-आदि। (पृ. 53 स.प्र.) (अर्थात् बेचारी भूरे नेत्रों वाली कन्यायें तो त्याग के योग्य हैं ।

(v) नीच, भंगी व चमार आदि का खाना न खाये। (पृ. 184 स. प्र.) – (स्वामी जी का कहने का अर्थ यह निकलता है कि दलित समाज जाति के लोग तो होटलों/ढाबों में ही ना जायें ।

जाट आर्यसमाजी भाइयों से प्रार्थना है कि वे सत्यार्थप्रकाश को बड़े ध्यान से पढ़ें !

चौथे समुल्लास के पेज नं० 76 पर स्वामी जी ने मनु के श्लोक को स्वीकार करते हुए लिखा है कि “किसी विधवा का संयोग अर्थात् मुकलावा या गौणा होने के बाद केवल शूद्र जातियां उस विधवा का पुनर्विवाह कर सकती हैं, दूसरे वर्ण नहीं।”

लेकिन जाट तो मुकलावा की बात छोड़ो. बच्चा होने के बाद भी पुनर्विवाह करते रहे हैं। इसलिए स्वामी जी ने जाट कौम को शूद्र माना है न कि क्षत्रिय।

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दूसरे ब्राह्मण ग्रन्थ ऐसी ही घृणित शिक्षाओं से अटे पड़े हैं। लिखा है शूद्रों का उपनयन न करें। उन्हें वेद न पढ़ायें, शूद्रों को जनेऊ पहनने की आज्ञा नहीं होनी चाहिये, चण्डालों को दूर बसाये, नीच जातियों से अनाज तक न लें आदि-आदि।

इसी प्रकार इन्होंने कबीर व गुरुनानक जी आदि की बुराई करने में कोई कमी नहीं छोड़ी। गुरुनानक जी को तो मूर्ख तक लिखा है। रामदास को ढ़ेड कहकर लिखा और कबीर को तुम्बा बजाने वाला कहा।

अर्थात् सम्पूर्ण ब्राह्मणवाद के भूत को स्वामी जी ने एक नई बोतल में डालकर पेश कर दिया तथा इस भूत को जाटों पर छोड़ दिया और इस भूत ने जाटों को सौ वर्षों से भी अधिक समय से नचाये रखा है।

लेकिन हम स्वामी जी के गुप्त एजेण्डे को अभी तक नहीं समझ पाये, उनका एजेण्डा था जाटों को सिक्ख व ईसाई धर्मी बनने से रोकना और हमेशा-हमेशा के लिए ब्राह्मणवाद का गुलाम रखकर हिन्दू जाट जाति को लुप्त कर देना।

यह बात चाहे हमें कितनी भी अटपटी लगे लेकिन इसके अन्दर एक कटु सच्चाई छिपी है जिसे हमें कम से कम अब तो स्वीकार कर लेना चाहिए।

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सिक्ख धर्म उस समय फैलता हुआ पंजाब से अम्बाला की सीमाओं को पार कर कुरुक्षेत्र करनाल  फतेहाबाद तक पहुंच गया था लेकिन स्वामी जी अपने उद्देश्य में सफल रहे और हम जाटों को सिक्ख नहीं बनने दिया।

डा. धर्मकीर्ति अपनी शोध पुस्तक ‘जाट जाति प्रछन्न बौद्ध है’ में लिखते हैं कि “इसलिए परोक्ष रूप से सिक्ख धर्म पर बौद्ध महायान का प्रभाव पड़ा था। इस कारण सिक्ख धर्म अपनी प्रगतिशीलता मार्ग पर चलता रहा।

लगभग एक शताब्दी पूर्व महर्षि दयानन्द का प्रादुर्भाव हुआ। उन्होंने सनातन धर्म की दकियानूसी विचारधारा और मूर्तिपूजा का खण्डन कर वर्ण-व्यवस्था और जाति की व्यापक और प्रगतिशीलता के आधार पर व्याख्या की तो बची हुई जाट जाति आर्यसमाजी हो गई।”

यही विद्वान् इस बारे में आगे लिखते हैं कि “आज के ब्राह्मणवाद ने इस महान् जाति को आर्यसमाज का झुनझुना हाथ में पकड़ा दिया है, जिसे भोले-भाले जाट बजाते फिर रहे हैं और ब्राह्मणवाद के मृत शरीर को अपने कन्धों पर उठाकर घूम रहे हैं।”

सिद्ध बाबा मस्तनाथ मठ अस्थल बोहर

Baba Mastnath Math Asthal Bohar Rohtak

Randhir Deswal

Hi, I am Randhir Singh a Solo Travel Blogger form Rohtak Haryana. I am a writer of Lyrics and Quotes.

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