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Ajay Lohagarh kila Bharatpur | जाट इतिहास का गौरव अजय भरतपुर

Ajay Lohagarh kila Bharatpur   जाट इतिहास का गौरव अजय भरतपुर दोस्तों आज मैं आपकोदुर्ग के विषय में जानकारी दूंगा |

यह ऐतिहासिक भरतपुरस्थान जाट इतिहास में वही स्थान रखता है जो मुस्लिमों के लिए मदीना, सिखों के लिए आनंदपुर साहिब और यहूदियों के लिए यरुशलम रखता है| इसका महत्व बहुत ही उलेखनीय व गौरवशाली है |

वे सोचे रहे थे तोप तमंचे हमें झुका देंगे।

झुकने वाले नहीं थे कभी हम, सारा मोल चुका देंगे।

इतिहास गवाह है जब जब किसी ने भरतपुर की तरफ आँख उठा के देखा वो सीधा यमलोक गया है।

यहां महाराज सूरजमल जैसे वीर योद्धा पैदा हुए जिनसे पुरे एशिया के राजा मदद मांगने आते थे ।

इन्ही के बेटे महाराज जवाहर सिंह ने दिल्ली में मुगलों को बेरहमी से पीटा था। मुगलों की सुरक्षा कवच लाल किले के दरवाजे तक जाट उखाड़ लाये जो आज भी भरतपुर के इसी दुर्ग में लगे हुए है ।

इतिहास साक्षी है कि सन् 1749 में मोती डूंगरी की लड़ाई में महाराजा सूरजमल ने एक साथ 7 हिन्दू राजाओ मराठों, कुशवाहा,चौहानों, सिसोदियों तथा हाड़ाओं समेत 7 सेनाओं को हराया था।

याद रहे इस महान् राजा सूरजमल के पूर्वज बेताज बादशाह चूड़ामन ने जोधपुर के राजपूत राजा अजीतसिंह की पुत्री इन्द्रा कुमारी पठानों के बादशाह फर्रुखसियर के हरमखाने से बाईज्जत आजाद कराके वापस राजा अजीतसिंह को सौंपी थी।

जब 25 दिसम्बर 1763 को महाराजा सूरजमल को हिन्दू पुरोहितों ने अंधविश्वास में फसाकर पूजा पाठ औऱ जमुना स्नान के बहाने अकेला और निहत्था बुलाकर मुगलों द्वारा धोखे से मरवा दिया |

जो अपने समय के सम्पूर्ण एशिया में एक महान् शासक माने जाते थे तो इसका बदला लेने के लिए उनके पुत्र महाराजा जवाहरसिंह ने सन् 1764 में लाल किले पर आक्रमण किया और 5 फरवरी को लगभग 11 बजे इस किले को फतेह कर लिया।

हम पढ़ रहे है Ajay Lohagarh kila Bharatpur

लेकिन फिर से इन्ही हिन्दूओ राजा होलकर तथा पुरोहितों की जलन और अंधविश्वास की वजह से दो दिन पश्चात् मुगलों से नजराना लेकर किले से अपनी सेनाएं हटाईं |

मुगलों की शान कहे जानेवाला काले संगमरमर का मुगलों का सिंहासन तथा लाल किले के किवाड़ यादगार के तौर पर जाट छीन लाये |

यह सिंहासन आज भी डीग के महलों की शोभा बढ़ा रहा है तथा लाल किले के किवाड़ इसी दुर्ग में लगे हैं।

Ajay Lohagarh kila Bharatpur

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भारतीय इतिहास इस सच्चाई को उजागर क्यों नहीं करता कि यही किवाड़ चित्तौड़गढ़ के राजपूत किले को जीतने पर राजपूतो को जलील करने के लिए मुगल वहां से उखाड़कर लाए और लाल किले में लगवा दिये गए थे। लेकिन स्वाभिमानी जाट सरदार इन्हें लाल किले से उखाड़कर भरतपुर ले गए थे।

इससे पहले भी एक बार गुस्साये जाटों ने मुगलों की दिल्ली (बाजारों) को 9 मई से 4 जून 1753 को जी भरकर लूटा जिसे ‘दिल्ली की लूट’ व ‘जाट गर्दी’ मे नाम से जाना गया। इसीलिए एक कहावत प्रचलित हुई “जाट जितना कटेगा, उतना ही बढ़ेगा।

जब जाटों ने अंग्रेजों का सूर्य उदय होने से रोक दिया 

एक कहावत है कि ‘अंग्रेजों के राज में उनका सूर्य कभी अस्त नहीं होता था’ यह सच है कि इनके अधीन जमीन पर हमेशा कहीं ना कहीं दिन रहता था।

भारत के इतिहास में अंग्रेजों के विरुद्ध केवल प्लासी की लड़ाई का वर्णन किया जाता है जबकि यह लड़ाई पूरी कभी लड़ी ही नहीं गई, बीच में ही लेन-देन शुरू हो गया था।

सन् 1857 के गदर का इतिहास तो पूरा ही मंगल पाण्डे, नाना साहिब, टीपू सुलतान, तात्या टोपे तथा रानी लक्ष्मीबाई के इर्द-गिर्द घुमाकर छोड़ दिया गया है, लेकिन जब जाटों का नाम आया और उनकी बहादुरी की बात आई तो इन साम्यवादी और ब्राह्मणवादी लेखकों की कलम की स्याही ही सूख गई। 

इससे पहले सन् 1805 में भरतपुर के महाराजा रणजीतसिंह (पुत्र महाराजा सूरजमल) की चार महीने तक अंग्रेजों के साथ जो लड़ाई चली वह अपने आप में जाटों की बहादुरी की मिशाल और भारतीय इतिहास का गौरवपूर्ण अध्याय है।

भारत में अंग्रेजों का भरतपुर के जाट राजा के साथ समानता के आधार पर सन्धि करना एक ऐतिहासिक गौरवशाली दस्तावेज है जिसे ‘Permanent Friendship Treaty on Equality Basis’ नाम दिया गया। इस प्रकार की सन्धि अंग्रेजों ने भारतवर्ष में किसी भी राजा से नहीं की।

(वास्तव में दूसरों के साथ सन्धि करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी क्योंकि हमारे बहादुर कहे जाने वाले राजाओं ने जाटों को छोड़ अंग्रेजों की बगैर किसी हथियार उठाये गुलामी स्वीकार कर ली थी।)

 इतिहास गवाह है कि भारत के अन्य किसी भी राजा ने अंग्रेजों के खिलाफ प्लासी युद्ध व मराठों के संघर्ष को छोड़कर अपनी तलवार म्यान से नहीं निकाली और बहादुरी की डींग हाकनेवालों ने नीची गर्दन करके अंग्रेजों की गुलामी स्वीकार की। Ajay Lohagarh kila Bharatpur

पंजाब केसरी महाराजा रणजीतसिंह

 पंजाब में जब तक ‘पंजाबकेसरी’ महाराजा रणजीतसिंह जीवित थे (सन् 1839), अंग्रेजों ने कभी पंजाब की तरफ आँख उठाकर देखने की हिम्मत नहीं की और सन् 1845 में उन्होंने पंजाब में प्रवेश किया, वह भी लड़ाई लड़कर।

अंग्रेज इन लड़ाइयों के अन्त में विजयी रहे लेकिन कुछ हिन्दुओं की महान् गद्दारी की वजह से। भरतपुर की लड़ाई पर एक दोहा प्रचलित था –

हुई मसल मशहूर विश्व में, आठ फिरंगी नौ गोरे।

लड़ें किले की दीवारों पर, खड़े जाट के दो छोरे। इस लड़ाई का विवरण अनेक पुस्तकों में लिखा मिलता है, जैसे कि ‘भारत में अंग्रेजी राज’ ‘जाटों के जोहर’ और ‘भारतवर्ष में अंग्रेजी राज के 200 वर्ष।’

लेकिन विद्वान् सवाराम सरदेसाई की पुस्तक “अजय भरतपुर” प्रमुख है। विद्वान् आचार्य गोपालप्रसाद ने तो यह पूरा इतिहास पद्यरूप में गाया है जिसका प्रारंभ इस प्रकार है – 

अड़ कुटिल कुलिस-सा प्रबल प्रखर अंग्रेजों की छाती में गढ़,

सर-गढ़ से बढ़-चढ़ सुदृढ़, यह अजय भरतपुर लोहगढ़।

यह दुर्ग भरतपुर अजय खड़ा भारत माँ का अभिमान लिए,

बलिवेदी पर बलिदान लिए, शूरों की सच्ची शान लिए ॥

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जब राजस्थान के राजपूत राजाओं ने अंग्रेजों के विरोध में तलवार नहीं उठाई तो जोधपुर के राजकवि बांकीदास से नहीं रहा गया और उन्होंने ऐसे गाया –

पूरा जोधड़, उदैपुर, जैपुर, पहूँ थारा खूटा परियाणा।

कायरता से गई आवसी नहीं बाकें आसल किया बखाणा ॥

बजियाँ भलो भरतपुर वालो, गाजै गरज धरज नभ भौम।

पैलां सिर साहब रो पडि़यो, भड उभै नह दीन्हीं भौम ॥   अर्थ है कि “है जोधपुर, उदयपुर और जयपुर के मालिको ! तुम्हारा तो वंश ही खत्म हो गया। कायरता से गई भूमि कभी वापिस नहीं आएगी, बांकीदास ने यह सच्चाई वर्णन की है।  

भरतपुर वाला जाट तो खूब लड़ा। तोपें गरजीं, जिनकी धूम आकाश और पृथ्वी पर छाई। अंग्रेज का सिर काट डाला, लेकिन खड़े-खड़े अपनी भूमि नहीं दी।”

Ajay Lohagarh kila Bharatpur

अंग्रेजों ने स्वयं अपने लेखों में भरतपुर लड़ाई पर जाटों की बहादुरी पर अनेक टिप्पणियाँ लिखीं। जनरल लेक ने वेलेजली (इंग्लैंड) को 7 मार्च 1805 को पत्र लिखा

“मैं चाहता हूँ कि भरतपुर का युद्ध बंद कर दिया जाये, इस युद्ध को मामूली समझने में हमने भारी भूल की है।” इस कारण भरतपुर का किला Ajay Lohagarh kila Bharatpur कहलाया।

उस समय कहावत चली थी लेडी अंग्रेजन रोवें कलकत्ते में क्योंकि अंग्रेज भरतपुर की लड़ाई में मर रहे थे, लेकिन उनके परिवार राजधानी कलकत्ता में रो रहे थे।

इतिहास गवाह है कि जाटों ने चार महीने तक अंग्रेजों के आंसुओं का पानी कलकत्ता की हुगली नदी के पानी में मिला दिया था।

स्वयं राजस्थान इतिहास के रचयिता कर्नल टाड ने लिखा – अंग्रेज लड़ाई में जाटों को कभी नहीं जीत पाए।

इस प्रकार अंग्रेजों का सूर्य जो भारत में बंगाल से उदय हो चुका था भरतपुर, आगरा व मथुरा में उदय होने के लिए चार महीने इंतजार करता रहा, फिर भी इसकी किरणें पंजाब में 41 साल बाद पहुंच पाईं।

पाठकों को याद दिला दें कि भारतवर्ष में केवल जाटों की दो रियासतों भरतपुर व धोलपुर ने कभी भी अंग्रेजों को खिराज (टैक्स) नहीं दिया।

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