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yoddhey jat gotra | यौधेय या जोहिया जाट गोत्र

yoddhey jat gotra जय यौधेय yoddhey jat gotra 

सम्राट् ययाति के चौथे पुत्र का नाम अनु था। अनु की नौवीं पीढ़ी मे उशीनर था जो पंजाब की अधिकांश भूमि का शासक था। उनकी पांच रानियां थीं। बड़ी रानी नृगा से नृग पुत्र हुआ।

नृग के पुत्र का नाम यौधेय था। इससे ही यौधेय वंश चला जो जाट वंश है। यह भाषाभेद से जोहिया नाम से प्रचलित हुआ। यौधेय गणराज्य शतद्रु (सतलुज) नदी के दोनों तटों से आरम्भ होता था।

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बहावलपुर (पाकिस्तान) राज्य इनके अन्तर्गत था। वहां से लेकर बीकानेर राज्य के उत्तरी प्रदेश गंगानगर आदि, हिसार, जींद, करनाल, अम्बाला, रोहतक, गुड़गावां, महेन्द्रगढ़, दिल्ली राज्य तक प्रायः समूचे उत्तरी दक्षिणी और पूर्वी राजस्थान में फैला था। अलवर, भरतपुर, धौलपुर राज्य इसी के अन्तर्गत आ जाते थे।

यौधेयों के समूह के संघों में होशियारपुर, कांगड़ा तक प्रदेशों की गिनती होती थी। देहरादून, सहारनपुर, मेरठ,  मुजफ्फरनगर, बुलन्दशहर, अलीगढ़, मथुरा, आगरा, मैनपुरी, एटा, बदायूं, बरेली, बिजनौर, पीलीभीत, मुरादाबाद, रामपुर जिला आदि सारा पश्चिमी उत्तरप्रदेश यौधेय गण के अन्तर्गत था।

एक समय तो ऐसा आया था कि मुलतान के पास क्रोडपक्के का दुर्ग तथा मध्यप्रदेश का मन्दसौर तक का प्रदेश भी यौधेयों के राज्य में सम्मिलित था। सिकन्दर सम्राट् इनकी शक्ति से डरकर व्यास नदी से वापिस लौट गया था।

पाखंडी पौराणिकों ने यौधेय वंश का प्रचालक युधिष्ठिर का पुत्र ‘यौधेय’ लिखा है। परन्तु यह प्रमाणित है कि नृग के पुत्र ‘यौधेय’ से यह yoddhey jat gotra वंश चला।

हां ! यह सम्भव है कि युधिष्ठिर के पुत्र ‘यौधेय’ का संघ (दल) भी उपरलिखित ‘यौधेय गण’ में शामिल हो गया था। (लेखक)

भारतवर्ष के अतिरिक्त यौधेय का एक समूह हिमालय को पार करके जगजर्टिस नदी को पार करता हुआ कैस्पियन सागर तक पहुंच गया था। वहां पर इन्हें यौधेय की बजाय भाषाभेद से ढे और दहाये नाम से पुकारा गया।

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यह शब्द यौधेय से धेय और फिर अपभ्रंश होकर धे रह गया – यही धे अंग्रेजी लेखकों ने ढे और दहाये नाम से लिखा।

जब इस्लाम का आक्रमण हुआ तो इनका एक बड़ा समूह भारत में लौट आया जो ढे जाट के नाम से पुकारा जाता है और मेरठ के आस-पास के प्रदेशों में आबाद है।

भारतवर्ष में जो यौधेय बाकी रह गये थे, वे आजकल जोहिया कहलाते हैं। महाभारत के युद्ध में यह दल भारी तैयारियों के साथ सम्मिलित हुआ था।

इनका उल्लेख महाभारत में आता है। इन्होंने गुप्त, मौर्य, कुषाण सम्राटों से भी टक्कर ली। जैसे – चन्द्रगुप्त मौर्य, समुद्रगुप्त और कनिष्क आदि।

सम्राट् सिकन्दर की यूनानी सेना ने इन्हीं वीर यौधेयों की शक्ति से डरकर व्यास नदी से आगे बढ़ने से इन्कार कर दिया था।

भरतपुर राज्य में इनका एक शिलालेख मिला था। इस बात का वर्णन डा० प्लीट ने गुप्तों के वर्णन के साथ किया है।

उस शिलालेख में यौधेय गण के निर्वाचित प्रधान का उल्लेख है। इनका प्रधान महाराजा महासेनापति की उपाधि धारण करता था।

कुछ अन्य गणों के अध्यक्ष भी राजा और राजन्य की उपाधि धारण करते थे।

एकतंत्रियों के मुकाबले में गणतंत्र अपने अध्यक्षों को राजा, महाराजा या राजन्य (राजन) की उपाधि देने लग गये थे।

जाट वंश लिच्छिवि गण ने तो अपने 7077 मेम्बरों को भी राजा की उपाधि दे दी थी।

यौधेयों का यह शिलालेख गुप्तकाल का बताया जाता है।

इनकी प्राचीन मुद्रायें लुधियाना के सुनेत स्थान से प्राप्त हुई हैं। सोनीपत (हरयाणा) के किले से और सतलुज तथा यमुना के मध्यवर्ती कई स्थानों से यौधेयों के सिक्के प्राप्त हुए हैं, जो कि भिन्न-भिन्न प्रकार के हैं। शुंग काल के सिक्कों पर चलते हुए हाथी और सांड (बैल) की मूर्ति अंकित मिलती है।

यौधेय

उन सिक्कों पर ‘यौधेयानाम्’ ऐसा लिखा है। दूसरी तरह के सिक्कों पर ‘यौधेयगणस्य जय’ लिखा है। इस सिक्के पर एक योद्धा के हाथ में भाला लिए त्रिभंगी गति से खड़ी हुई मूर्ति बनाई गई है।

तीसरी तरह के सिक्कों पर उन्होंने युद्ध के देवता कार्तिकेय (जो शिवजी का बड़ा पुत्र था) की मूर्ति अंकित की है। कुछ सिक्कों पर ‘हि’ और ‘त्रि’ भी लिखा हुआ पाया गया है।

यौधेय

ईसा की तीसरी शताब्दी तक यौधेय दल ने मारवाड़ (जोधपुर), जैसलमेर, बीकानेर (जांगल) प्रदेश की बहुत बड़ी भूमि पर अधिकार कर लिया था।

दूसरी शताब्दी में शक राजा रुद्रदामन के साथ यौधेयों का युद्ध जोधपुर की प्राचीन भूमि पर हुआ था, क्योंकि रुद्रदामन बराबर पैर फैला रहा था।

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जोधपुर में यौधेयगण का नेता महीपाल था। रुद्रदामन ने इनके बारे में लिखाया था – सर्व क्षत्राविष्कृत वीर शब्द जातोत्सेकाभिधेयानां यौधेयानाम्

अर्थात् सभी क्षत्रियों के सामने यौधेयों ने अपना नाम (युद्धवीर) चरितार्थ करने के कारण जिन्हें अभिमान हो गया था और जो परास्त नहीं किये जा सकते थे।

यह थी उनकी वीरता जिसका उल्लेख उनके शत्रु ने भी किया है। अपनी युद्धकुशलता के लिए वे प्रसिद्ध हो गये थे।

जोधा जी के पुत्र बीका जी राठौर ने जब नया राज्य बीकानेर स्थापित करने का प्रयत्न प्रारम्भ किया तो जोहिया जाटों का वहां 600 गांवों पर अधिकार था।

शेरसिंह नामक वीर योद्धा उनका राजा था जिसकी राजधानी भूरूपाल में थी। इस शूरवीर शेरसिंह ने राठौरों को नाकों चने चबवा दिये

बीका जी ने कुछ समय अपनी व्यवस्था ठीक करने और शक्तिसंचय करने में लगाया।

वहां के निकट क्षेत्र पर गोदारा जाटों की बड़ी शक्ति थी। जोहिया व गोदारा जाटों की आपसी शत्रुता होने के कारण से गोदारों का नेता गोदारा ‘पाण्डु’ जाट ने बीका जी से कुछ शर्तों पर संधि कर ली।

अब बीका जी ने अपनी और गोदारों की सेना लेकर जोहिया जाटों पर आक्रमण कर दिया। वीर शेरसिंह ने अपनी सेना लेकर दोनों बड़ी शक्तियों का साहस से मुकाबला किया।

1. कर्नल टॉड Vol II P. 1126-27 पर जोहिया जाटों का 600 गांवों पर अधिकार था, लिखा है; ले० रामसरूप जून ने अपने जाट इतिहास में पृ० 70 पर इनका राज्य 1100 गांवों पर लिखा है। इनके परगने 1. जैतपुर 2. महाजन 3. पीपासर 4. उदयमुख, और 5. कम्भाना थे।

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“देशी राज्यों के इतिहास” में सुखसम्पत्तिराय भण्डारी ने लिखा है –

“शेरसिंह ने अपनी समस्त सेना के साथ बीका जी के खिलाफ युद्ध करने की तैयारी कर रखी थी।

बीका जी जो कई युद्धों के विजेता था, इस युद्ध में सरलता से विजय प्राप्त न कर सके।

शत्रुगण अद्भुत पराक्रम दिखाक्र साहस छोड़ गया। अन्त में विजय की कोई सूरत न देख, बीका जी ने षडयन्त्र द्वारा धोखे से शेरसिंह को मरवा दिया।”

यौधेय

‘वाकए-राजपूताना’ में भी यही बात लिखी है।

यह युद्ध रामरत्न चारण के लेखानुसार सीधमुख के पास ढाका गांव में हुआ था। शेरसिंह के मारे जाने के बाद भी जोहिया जाट विद्रोही बने रहे।

उन्होंने सहज ही में अधीनता स्वीकार नहीं की। उनका प्रत्येक युवक प्राणों की बाजी लगाकर स्वाधीनता की रक्षा करना चाहता था।

शेरसिंह के बाद उन्हें कोई योग्य नेता नहीं मिला।

“भारत के देशी राज्यों के इतिहास” का लेख –

“यद्यपि बीका जी ने जोहिया जाटों को परास्त करके अपने अधीन कर लिया था तथापि वे बड़े स्वाधीनताप्रिय थे और अपनी हरण की हुई स्वाधीनता को फिर से प्राप्त करने का प्रयत्न कर रहे थे।

अतः बीका जी के वंशज रायसिंह ने अपने भाई भीमसिंह जी के संचालन में एक प्रबल राठौर-सेना उनके दमन करने के लिए भेजी।

इस सेना ने वहां पहुंचकर भयंकर काण्ड उपस्थित कर दिया। प्रबल समराग्नि प्रज्वलित हो गई। हजारों जोहिया जाटगण स्वाधीनता के लिए प्राण विसर्जन करने लगे।

वीर राठौर भी अपने ध्येय से न हटे। उन्होंने इस देश को यथार्थ मरुभूमि के समान कर दिया।”

इस तरह से 15वीं सदी में जांगल प्रदेश पर से जोहिया जाटों का राज्य समाप्त हो गया।

इन यौधेयों की कालान्तर में कई शाखायें भी हो गईं। कुलकिया शाखा के लोग अब अजीतगढ़ चूड़ी के पास मौजूद हैं।

इस वंश में ढाका शाखा के भी अनेक गांव हैं जिनमें गांव ढानी जयपुर में, ढकौली, पटौली, औगटा, सहदपुर आदि मेरठ में, मिल्क, मानिपुर, छाचरी आदि जिला बिजनौर में सुप्रसिद्ध गांव हैं।

जोहिया जाट जोधपुर, बीकानेर तथा जालन्धर जिले में जड़िया, जोड़ा, बिनौला, थाबलक, जड़ियाला, जोहल आदि 12 गांवों में बसे हुए हैं।

जोहिया जाट सतलुज नदी के किनारे उस स्थान पर रहते थे जहां बहावलपुर राज्य था। आजकल वह पाकिस्तान में है।

उस स्थान पर इस वंश के जाटों के नाम पर जोहियावार प्रदेश (क्षेत्र) विद्यमान है।

जय यौधेय के लेखक राहुल सांकृत्यायन, पृ० 5 पर लिखते हैं कि – yoddhey jat gotra 

भावलपुर रियासत से मुलतान तक फैला एक इलाका जोहियावार कहा जाता है और बहुसंख्यक निवासी जोहिया (यौधेय) कहे जाते हैं।

कराची के कोहिस्तान में जोहियार रहते हैं, बल्कि उनके सरदार को ‘जोहिया-जोजन्म’ कहा जाता है।

अलवर और गुड़गांव के मेव अब भी यौधेय भूमि में ही बसते हैं और उनकी वीरगाथायें सुनकर आज भी रोमांच हो उठते हैं।

यौधेय

यौधेय जाट गोत्र के शाखागोत्र- 1. कुलकिया 2. ढाका

आधार पुस्तक :-
1. क्षत्रिय जातियों का उत्थान-पतन एवं जाटों का उत्कर्ष पृ० 335 लेखक कविराज योगेन्द्रपाल शास्त्री।
2.हरयाणे के वीर यौधेय(प्रथम खण्ड भूमिका लेखक श्री भगवानदेव आचार्य।
3. जाट इतिहास (उत्पत्ति और गौरव खण्ड) पृ० 102 लेखक ठा० देशराज, जधीना – भरतपुर।
4. जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-197

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Randhir Deswal

Hi, I am Randhir Singh a Solo Travel Blogger form Rohtak Haryana. I am a writer of Lyrics and Quotes.

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