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सेठ चौधरी छाजुराम लाम्बा | Seth chaudhary Chhajuram Lamba

seth chhaju ram – सेठ चौधरी छाजुराम लाम्बा

सेठ चौधरी छाजुराम जीवन चरित :- सन् 1928 में भिवानी शहर में पानी की भारी किल्लत हुई थी, जिस पर यहाँ की लाचार जनता पानी की एक-एक बून्द के लिए तरस रही थी क्योंकि अंग्रेज सरकार इस ओर कोई ध्यान नहीं दे रही थी।

इसलिए तहसीलदार घासीराम, पं. नेकीराम तथा श्रीदत्त वैद्य एक डेलीगेशन के तौर पर सेठ चौधरी छाजुराम की शरण में कलकत्ता पहुंचे और उन्होंने भिवानी की पूरी व्यथा बयान की,

जिस पर सेठ चौ० छाजूराम ने भिवानी शहर में पानी की व्यवस्था के लिए ढाई लाख रुपये दान में दिये और फिर कम पड़ने पर पचास हजार रुपये और भेजे थे।

इसके अतिरिक्त सेठ चौधरी छाजुराम द्वारा बनवाई गई एक गोशाला का गेट इनकी यादगार स्वरूप भिवानी के बीच शहर में शेष है।

जो आज केवल चौ० साहब की पहचान बची है। इसलिए धार्मिक भिवानी वासियों से यह अपील है कि सेठ दानवीर चौ० छाजूराम की याद में भिवानी के किसी भी चौराहे पर उनकी मूर्ति स्थापित करवायें,

ताकि यह सिद्ध हो सके कि भिवानी वास्तव में भारत की ‘लघु काशी’ है और यहाँ दान-धर्म का डेरा आज भी निवास करता है।

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इसके अतिरिक्त – विशेष घटना है कि जब दिनांक 12.12.1928 को लाहौर में अंग्रेज पुलिस अधिकारी साण्डर्स की हत्या करने के बाद भगतसिंह, राजगुरु तथा दुर्गा भाभी रेल द्वारा कलकत्ता पहुंचने पर सीधे सेठ चौधरी छाजुराम की कोठी पर पहुंचकर उन्होंने इस घटना का ब्यौरा

सेठ चौ० छाजूराम की धर्मपत्नी लक्ष्मीदेवी को बतलाया तो, देवीतुल्य लक्ष्मीदेवी ने खुश होकर इन तीनों को सात दिनों तक अपने हाथों से खाना खिलाया।

इसके बाद सुखदेव तथा दुर्गा भाभी तो दूसरी जगह चले गये लेकिन भगतसिंह लगभग ढाई महीने वहीं पर रहे।

उस समय उनको अपने घर में रखना कितना बड़ा जोखिम का काम था, कोई भी सहज से अंदाजा लगा सकता है। लेकिन इस शेर-ए-दिल परिवार ने ऐसा किया।

इसलिए कम से कम हमें उन्हें उनके निर्वाण दिन 7 अप्रैल को प्रतिवर्ष श्रद्धांजलि अर्पित करनी चाहिए। क्योंकि ऐसा करना हम सभी का कर्त्तव्य और धर्म है।

आधुनिक युग में दानवीर सेठ चौधरी छाजूराम को अपने समय का भामाशाह, कुबेर का अवतार, हरिश्चन्द्र, दधीचि ऋषि और हरयाणा का कोहेनूर हीरा की उपमा दी गई है।

आपके पिता जी का नाम सालिगराम था। आपके पूर्वज झुझुनूं के निकटवर्ती गोठड़ा से आकर यहां पर आबाद हुए थे। वहां से चलकर ढाणी माहू में बसे।

ये लोग एक अंग्रेज की जमींदारी में सामान्य जीवन बिताते थे। आपके परदादा चौ० थानाराम इसी गांव ढाणी माहू (भिवानी) में रहे थे।

आपके दादा चौ० मनीराम ढाणी माहू को छोड़कर सरसा में जा बसे। लेकिन कुछ दिनों बाद आपके पिता चौ० सालिगराम सरसा से नारनौंद जिला जींद में आकर बस गए।

किसी कारणवश सन् 1860 में आपके पिताजी नारनौंद छोड़कर अलखपुरा गांव में आकर बस गये।

आपके पिता साधारण स्थिति के किसान थे। आपका बचपन माता-पिता के साथ ही अलखपुरा के ग्रामीण वातावरण में बीता।

आपने प्रारम्भिक शिक्षा बवानी खेड़ा के स्कूल में प्राप्त की और छात्रवृत्ति प्राप्त करते रहे। भिवानी स्कूल से मिडल पास के बाद आपको रिवाड़ी के हाई स्कूल में दाखिल करवा दिया गया।

दूसरे विषयों के अतिरिक्त आप संस्कृत, अंग्रेजी, महाजनी, हिन्दी, उर्दू में बहुत प्रवीण थे। परन्तु पारिवारिक परिस्थितियों वश दसवीं से आगे न पढ़ सके और शिक्षा यहीं पर रुक गई।

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सेठ चौ० छाजूराम का हजारीबाग कलकत्ता को प्रस्थान – भिवानी में पढ़ते हुए आपका सम्पर्क यहां के इंजीनियर श्री राय साहब शिवनाथ राय से हो गया जो आपकी मेहनत से खुश थे।

अतः वे अपने साथ आपको हजारीबाग कलकत्ता ले गये। आप घर रहकर इंजीनियर साहब के बच्चों को पढ़ाते रहे। उस समय आपकी आयु 20-22 वर्ष की थी।

कुछ समय में ही आपका सम्पर्क यहां राजगढ़ के सेठ के साथ हो गया। आप उस सेठ साहब के बच्चों को भी पढ़ाते रहे।

उन दिनों कलकत्ता में अधिकांश व्यापार पर मारवाड़ी सेठों का कब्जा था। मारवाड़ी लोग अंग्रेजी भाषा बहुत कम जानते थे।

छाजूराम समय निकाल कर उन्हीं सेठों की व्यापार सम्बन्धी चिट्ठी आदि अंग्रेजी में लिख दिया करते थे। इस समय आपको सभी मुंशी जी तथा मास्टर जी के नामों से जानते थे।

कलकत्ता में व्यापारसम्बन्धी लोगों की चिट्ठियां लिखते रहने के कारण आपको कुछ व्यापार सम्बन्धी बातों की विशेष जानकारी हो गई।

कलकत्ता में रहते हुए आप दलालों के साथ बाजार में चले जाते थे। उनकी बातचीत तथा कार्य व्यवहार बड़े ध्यान से देखते थे और कुशाग्र बुद्धि होने के कारण आपने दलालों की सब बातें समझ लीं।

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व्यापार में प्रवेश – प्रभु की कृपा का विश्वास करके आपने पुरानी बोरियों का काम शुरु किया। दिन रात के कठोर परिश्रम के कारण आय में विशेष वृद्धि होने लगी।

कुछ समय के बाद नई बोरियों की दलाली तथा क्रय-विक्रय आरम्भ कर दिया। इस प्रकार आपने काफी धन कमाया और शीघ्र ही बड़े दलालों में गिनती होने लगी।

कुछ समय बाद ही आपको Andre Wyule and Company (एण्डरुयूल एण्ड कम्पनी) में दलालों का काम मिल गया।

इस कम्पनी से आपको 75 प्रतिशत दलाली मिलती थी। जबकि दूसरे दलालों को केवल 25 प्रतिशत ही दलाली मिलती थी।

यह अंग्रेज कम्पनी थी जिसमें जूट का कारोबार था।

जिस समय आपने दलाली का काम शुरु किया, आप एक ब्राह्मण के ढाबे पर रोटी खाते थे तथा उसका महीना भर में हिसाब कर देते थे।

सामाजिक स्थिति इतनी बिगड़ चुकी थी कि ब्राह्मण और महाजन साहूकार ही सब कुछ थे। उनके विरुद्ध बोलने की तथा सत्य कहने की भी किसी में हिम्मत नहीं होती थी।

हरिजन आदि की तो बात क्या, जाट को भी अछूत समझा जाता था। जिस ब्राह्मण ढाबे पर आप रोटी खाते थे |

वहीं पर भोजन करने वाले महाजनों और ब्राह्मणों ने उस ढाबे के स्वामी को मिलकर कहा कि एक जाट का लड़का हमारे साथ बैठकर भोजन करे, यह हमें स्वीकार नहीं।

या तो आप इस जाट युवक को यहां भोजन खिलाना बन्द कर दें अन्यथा हम सब तुम्हारे ढाबे से भोजन करना स्वयं ही छोड़ देंगे।

ढाबे के मालिक ने अगले रोज युवक छाजूराम को सब बातें बताईं और भोजन खिलाने में असमर्थता प्रकट की। युवक छाजूराम सब समझ गये।

बहुत ऊँचा उठने का दृढ़ संकल्प किया। एक लखपति करोड़पति सेठ महाजन से तथा ब्राह्मण से भी ऊँचा सम्मान पाने की

अपनी जाति को ऊपर उठाने की तीव्र लालसा जाग उठी। युवक छाजूराम ने अन्य किसी ढाबे पर भोजन का प्रबन्ध कर लिया।

आप धीरे-धीरे कलकत्ता में कम्पनियों के हिस्से (Share) खरीदते रहे और बड़े-बड़े व्यापारियों की गिनती में आ गये।

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कुछ ही समय बाद आपने कलकत्ता में जूट का कारोबार पूर्ण रूप से अपने हाथ में ले लिया। कलकत्ता की मार्केट में आप ‘Jute King’ (पटसन का बादशाह) के नाम से विख्यात हो गये।

देश के बड़े करोड़पतियों में आपकी गणना होने लगी। आप कलकत्ता की 24 कम्पनियों के सबसे बड़े शेयर होल्डर (Share Holder) हिस्सेदार थे।

जिसमें से दस एण्डरुयल एण्ड कम्पनी, दो ओबाराहर्टा, दस बर्ड एण्ड कम्पनी और दो जार्डन एण्ड कम्पनी की थीं।

एण्डरुयल एण्ड कम्पनी की 10 और बिड़ला ब्रदर्स की कुल 12 कम्पनियों (मिलों) के आप निर्देशक (Director) थे। आप पंजाब नेशनल बैंक के निर्देशक भी बने परन्तु बाद में त्यागपत्र दे दिया।

आपको इन हिस्सों के कारण 16 लाख रुपये प्रतिवर्ष लाभांश (Dividend) भाग मिलता था। आपका व्यापार चरम सीमा तक पहुंच गया था।

करोड़ों रुपया बैंकों में जमा था। 24 कम्पनियों के 75 प्रतिशत हिस्से (Share) आपके थे। हिसार में 5 सम्पूर्ण गांव आपके थे।

अलखपुरा और शेखपुरा में दो शानदार महल खड़े हैं। कलकत्ता में आलीशान कोठियों के अतिरिक्त शानदार वैभवयुक्त दर्शनीय एक अतिथि भवन था जो उन दिनों 5 लाख रुपये की लागत से बना था।

आपने लाखों रुपयों में कई गांवों की जमींदारी का विशाल भू-भाग खरीदकर विशाल जमींदारी अलखपुरा पैतृक जन्म स्थान के आसपास बनाई।

आपकी विशाल जमींदारी को लोग अलखपुरा रियासत तक कह दिया करते थे। आपकी गणना भारतवर्ष के बड़े-बड़े करोड़पति सेठों में की जाती थी।

आपके पास वैसे तो अनेकों बहुमूल्य वस्तुएं थीं किन्तु एक कार जिसका नाम “रोल्स-रॉयस” था वह उन दिनों में एक लाख रुपये की खरीदी थी।

कलकत्ता में सबसे पहले इस कीमती कार को आपके सुपुत्र श्री सज्जनकुमार ही लाए थे। वे ही इस कार में बैठकर प्राय: बाहर जाया करते थे।

किन्तु आप तो अपनी साधारण कार में ही बाहर जाया करते थे। कलकत्ता आपकी सब प्रकार की धार्मिक, सामाजिक, राजनैतिक गतिविधियों का केन्द्र बन गया।

व्यापार की सफलता और दानशीलता ने आपका मान और प्रतिष्ठा बढ़ा दी। आप कलकत्ता में ही नहीं अपितु भारतवर्ष के गणमान्य व्यक्तियों की कतार में आ खड़े हुए।

आप एक आदर्श व्यापारी थे। आपकी सफलता का कारण आपकी निष्ठा और व्यापार व उद्योग को स्वस्थरूप से बढ़ाना था।

दानवीर seth chhaju ram की दान योग्यता

  • 1. आपने आर्यसमाज की सैंकड़ों संस्थाओं में दान दिया। आर्यसमाज के उच्चकोटि के त्यागी तपस्वी सन्त स्वामी श्रद्धानन्द जी ने गंगा  के किनारे हरिद्वार में गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना की।
  • सेठ चौ० छाजूराम ने उस गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के भवन बनवाने में काफी धनराशि दान में दी।
  • 2. कर्मवीर डॉ० संसारसिंह जी ने कन्या गुरुकुल कनखल की स्थापना की। इनकी संस्था में भी आपने कन्या शिक्षा प्रसार हेतु सबसे बड़ी धनराशि भवन निर्माणार्थ दान में दी।
  • 3. गुरुकुल वृन्दावन, वोलपुर आदि शिक्षण संस्थाओं में भी आप द्वारा दी गई दानार्थ धनराशि आज भी पत्थरों पर अंकित है।
  • आप द्वारा दिया गया दान भारतवर्ष के विभिन्न भागों में उच्चकोटि की शिक्षण संस्थाओं के रूप में फल-फूल रहा है।
  • 4. बंगाल में आर्यसमाज का विस्तार करने के लिए दानवीर सेठ छाजूराम ने आर्यसमाज के प्रचारार्थ अतुल धनराशि तो खर्च की ही थी तथा आर्य कन्या विद्यालय बनवाने में 50,000 की धनराशि भी दान दी।
  • कलकत्ता में आर्यसमाज कार्नवालिस स्ट्रीट और आर्य महाविद्यालय के लिए 50,000 रुपये दान दिये। कलकत्ता में आप आर्यसमाज के उत्सवों कार्यक्रमों में सक्रिय भाग लेते थे।
  • वहां महात्मा हंसराज, स्वामी श्रद्धानन्द जैसे अनेक त्यागी तपस्वी आर्यनेताओं से आपका गहरा सम्पर्क व मित्रता हो गई।
  • 5. जिन दिनों डी० ए० वी० कॉलिज लाहौर आर्थिक संकट से गुजर रहा था, उन दिनों सेठ छाजूराम के पास कलकत्ता में उनके मित्र श्री लखपतराय एडवोकेट, बाबू चूड़ामणि, डॉ० रामजीलाल आदि महात्मा हंसराज जी के परामर्श के बाद पहुंचे।
  • इस मित्रमण्डली को आया देखकर आप अत्यधिक प्रसन्न हुए। इन्होंने पहले सेठ छाजूराम से 21 हजार और फिर 31 हजार रुपये मांगने का विचार किया।
  • धन्य है दानवीर सेठ छाजूराम जिसने 31 हजार की मांग पर भी 50 हजार रुपये डी० ए० वी० कॉलिज लाहौर के लिए इस मित्रमण्डली को दानार्थ दिये।
  • 6. सन् 1916 में सेठ चन्दूलाल जी का स्वर्गवास हो गया। मित्रमण्डली ने निश्चय किया कि सेठ चन्दूलाल की स्मृति में एक संस्था कायम की जाये।
  • प्रमुख व्यक्तियों ने सन् 1918 में उनकी स्मृति में सी० ए० वी० हाई स्कूल संस्था विधिवत् प्रारम्भ कर दी। सेठ छाजूराम ने इसी संस्था के छात्रावास (बोर्डिंग हाउस) के लिए 67,000 रुपये की राशि देकर अपने ही इंजीनियरों की देख-रेख में बनवाया।
  • इसके अतिरिक्त आपने 60,000 रुपये छात्रों को छात्रवृत्ति के लिए तथा 25,000 रुपये स्कूल भवन के लिए दान दिये। इस प्रकार कुल डेढ़ लाख रुपये अकेले इस दानवीर ने दानार्थ दिये।
  • 7. एक बार किसी राजनैतिक उद्देश्य से लाला लाजपतराय कलकत्ता में चन्दा इकट्ठा करने हेतु पहुंचे और सदा की तरह सेठ छाजूराम की कोठी में उनके साथ ठहरे।
  • सभा का आयोजन किया गया और उस सभा में दान की अपील की गई। लाला लाजपतराय ने अपनी इच्छा से बाबूजी के नाम से 200 रुपये दान सुना दिया।
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  • सेठ छाजूराम खड़े होकर बोले कि सम्माननीय ला० लाजपतराय जी आपने जो मेरे नाम से 200 रुपये सुनाये हैं वह ठीक नहीं, क्योंकि मैं 2000 का संकल्प करके रुपये लेकर सभा में आया हूं। सेठ जी ने 2000 रुपये दान देकर अपना संकल्प पूरा किया।
  • 8. जिस प्रकार प्रथम महायुद्ध में गांधीजी ने अंग्रेजों को सहायता देने का वचन दिया था, उसी तरह सेठ चौ० छाजूराम ने प्रथम महायुद्ध सन् 1914 में सरकार को ‘युद्ध फंड’ (War Fund) में 1,40,000 रुपये का योगदान दिया और सरकार को ‘युद्ध ऋण’ (War Loan) में कई हजार रुपये देकर मदद के और स्वयं के प्रति तथा कुछ अंश में आर्यसमाज के प्रति सरकार के शक को ठीक नीति से दूर करके यह सिद्ध कर दिया कि आर्य “वसुधैव कुटुम्बकम्” पर विश्वास करते हैं।
  • 9. आपने अतिथि भवन कलकत्ता में सैण्ट्रल ऐवन्यू पर 5 लाख रुपये की लागत से बनाया था जहां पर दीन-दुखियों अथवा प्रेमी मित्रों का शानदार स्वागत होता था।
  • 10. आपने अलखपुरा में आर्यसमाज की स्थापना की। आर्यसमाज के संगठन के माध्यम से गांवों के गरीब मज़दूर किसानों को भ्रातृभाव से रहने और आर्य बनने की प्रेरणा दी जिसके लिए अपने बड़े धनराशि खर्च की। जिसका प्रभाव यह हुआ कि आज तक भी कभी अलखपुरा गांव में सांग नहीं हो सका है।
  • 11. आप जाट महासभा तथा आर्यसमाज के नियमों का पालन किया करते। आपने दहेज-प्रथा का डटकर विरोध किया।
  • अपनी सुपुत्री सावित्रीदेवी के शुभ विवाह पर केवल 101 रुपया दान दिया तथा कन्यादान में किसी भी व्यक्ति से एक रुपये से अधिक दान नहीं लिया।
  • 12. सेठ चौ० छाजूराम की मित्रता अंग्रेजों की झूठी पत्तल चाटने वाले अंग्रेजों के दासों से नहीं थी अपितु देशभक्त, आंदोलनकारी, विद्रोही, क्रांतिकारी आर्य पुरुषों से थी। इसका एक ठोस प्रमाण
  • यह भी है कि जब देशभक्त वीर भगतसिंह सिन्धु गोत्री सिक्ख जाट ने 17 दिसम्बर 1928 ई० को सांडर्स को अपने रिवाल्वर की गोली से मारकर लाला लाजपतराय की मौत का बदला ले लिया,

  • तब वह वीर पुलिस की आंखों में धूल झोंककर लाहौर से रेलगाड़ी द्वारा कलकत्ता पहुंचा और वहां वह सीधा सेठ चौ० छाजूराम के पास चला गया।

  • ऐसे संकटकाल में आपने वीर भगतसिंह को ढ़ाई-तीन महीने तक अपनी कोठी में ऊपरवाली मंजिल में छिपाकर रखा।

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  • 13. नेताजी सुभाषचन्द्र बोस और पं० मोतीलाल नेहरु का स्वागत – सेठ चौ० छाजूराम पंजाब में जमींदार लीग की ओर से सन् 1926 में एम० एल० सी० बनकर राष्ट्रीय नेताओं से अधिक निकट सम्पर्क में आ चुके थे।
  • सन् 1928 में पण्डित मोतीलाल नेहरू कांग्रेस दल के प्रधान बनाये गये थे। वे कलकत्ता में पधारे और नेताजी सुभाषचन्द्र बोस से मिले।
  • उस समय सेठ छाजूराम के नेताजी से अच्छे सम्बन्ध बन चुके थे। कांग्रेस पार्टी की सहायता के लिए नेताजी ने पं० मोतीलाल नेहरू को कुछ धनराशि भी जनता की ओर से भेंट की।
  • इस अवसर पर सेठ छाजूराम जी ने पं० मोतीलाल नेहरु का हार्दिक स्वागत किया और नेताजी सुभाषचन्द्र बोस को कांग्रेस पार्टी के चन्दे में अपनी तरफ से 5,000 रुपये दान के रूप में दिये।
  • इसके बाद तो नेताजी से सेठ छाजूराम जी के सम्बन्ध और अधिक घनिष्ठ बन गये। अन्य ऐसे अवसरों पर जब भी कभी नेताजी सुभाषचन्द्र बोस, पं० मदनमोहन मालवीय, गांधी जी, जवाहरलाल नेहरु, सरदार पटेल, राजगोपालाचार्य, कृपलानी, जितेन्द्रमोहनसेन गुप्त (मेयर कलकत्ता) तथा उनकी श्रीमती नेलीसेन गुप्ता आदि अनेक गणमान्य व्यक्तियों एवं नेताओं को किसी देशहित अथवा समाज कल्याण के कार्यों के लिए धन की आवश्यकता हुई तो सहायता चाहने पर सेठजी ने दिली इच्छा से धनराशि दानार्थ दी। सेठजी के जीवन पर्यन्त इन सबसे अच्छे सम्बन्ध बने रहे।
  • 14. महात्मा हंसराज के शिष्य नवयुवक भानीराम1 रोहतक जिले में जाट हाई स्कूल खोलने का निश्चय कर चुके थे।
  • किन्तु वे चेचक की बीमारी से अचानक चल बसे और यह कार्य प्राण त्यागते समय अपने मित्र चौ० बलदेवसिंह को सौंप गये। चौ० बलदेवसिंह भी डी० ए० वी० कॉलिज लाहौर में पढ़े थे।
  • उन्होंने इस कार्य के लिए जीवन दान करने की घोषणा की और असंख्य जाटों ने धन से सहयोग दिया। सेठ जी ने स्वयं भी जीवनपर्यन्त इस संस्था की सहायता की। सेठ जी के मित्र हिसार के डा० रामजीलाल और उनके भाई चौ० मातुराम (गांव सांघी जिला रोहतक) तथा चौ० छोटूराम आदि के प्रयत्नों से 26 मार्च, सन् 1913 में जाट हाई स्कूल रोहतक की नींव रखी गई।
  • सन् 1913 से 1921 ई० तक चौ० छोटूराम इसकी प्रबन्धकर्तृ सभा के सचिव रहे। सैनिकों से धन मांगने में चौ० छोटूराम ने बहुत प्रयत्न किया और उनसे काफी धनराशि प्राप्त की और गांव-गांव घूमकर खूब चन्दा इकट्ठा किया। सन् 1916 में इसी जाट हाई स्कूल रोहतक का वार्षिक उत्सव हुआ।
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  • इस अवसर पर सेठ छाजूराम जी को भी निमन्त्रित किया गया था। उस समय स्कूल की सहायता के लिए आम जनता से अपील की गई।
  • जब लोग अपनी शक्ति के अनुसार 5-5, 10-10 रुपये बढ़ चढ़कर देने लगे तो सेठ चौ० छाजूराम ने खड़े होकर अपनी ओर से 61 हजार रुपये दान देने की घोषणा की।
  • इसके साथ ही यह भी ऐलान किया कि जाट हाई स्कूल रोहतक का जो भी छात्र दसवीं कक्षा की परीक्षा में प्रथम नम्बर पर आयेगा उसे एक सोने का मैडल उनकी तरफ से भेंट किया जाएगा।
  • मैडल के अतिरिक्त आगे कॉलिज में पढ़ने के लिये 12 रुपये मासिक छात्रवृत्ति भी देने के लिए कहा।
  • उसी वर्ष होने वाली हाई स्कूल की परीक्षा में सूरजमल नामक होनहार छात्र प्रथम नम्बर पर आया और सोने का मैडल प्राप्त करने में सफल रहा।
  • वह मैडल आज भी उनके पास मौजूद है। यह सूरजमल गांव खांडा जिला हिसार निवासी थे जो निरन्तर कई वर्षों तक संयुक्त पंजाब की विधान सभा के सदस्य तथा मन्त्री पद पर जमींदार पार्टी की ओर से रहे। इसके अतिरिक्त वह कई वर्षों तक महाराजा भरतपुर के प्रधान मन्त्री भी रहे।
जननी जने तो भक्त जनै या दाता या शूर।
नहीं तो जननी बांझ रहे, काहे गंवावै नूर।।

(पुस्तक – Bhagat Singh, लेखक – विष्णु प्रभाकर)

आधार पुस्तक : असली लुटेरे कौन 

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Randhir Deswal

Hi, I am Randhir Singh a Solo Travel Blogger form Rohtak Haryana. I am a writer of Lyrics and Quotes.

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