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jat ganga ka itihas | जाटगंगा का इतिहास | जाटों का सच्चा इतिहास

jat ganga ka itihas भैरों घाटी जो कि गंगोत्री से 6 मील नीचे को है, यहां पर ऊपर पहाड़ों से भागीरथी गंगा उत्तर-पूर्व की ओर से और नीलगंगा (जाटगंगा) उत्तर पश्चिम की ओर से आकर दोनों मिलती हैं।

इन दोनों के मिलाप के बीच के शुष्क स्थान को ही भैरों घाटी कहते हैं।

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jat ganga ka itihas जाटगंगा के दाहिने किनारे को ‘लंका’ कहते हैं। इस जाटगंगा का पानी इतना शुद्ध है कि इसमें रेत का कोई अणु नहीं है। भागीरथी का पानी मिट्टी वाला है।

दोनों के मिलाप के बाद भी दोनों के पानी बहुत दूर तक अलग-अलग दिखाई देते हैं। जाटगंगा का पानी साफ व नीला है इसलिए इसको नीलगंगा कहते हैं।

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महात्माओं और साधुओं का कहना है कि भागीरथी गंगा तो सम्राट् भगीरथ ने खोदकर निकाली थी और इस नीलगंगा को जाट खोदकर लाये थे इसलिए इसका नाम जाटगंगा है।

इसके उत्तरी भाग पर जाट रहते हैं। इस कारण भी इसको जाटगंगा कहते हैं। इस जाट बस्ती को, चीन के युद्ध के समय,

भारत सरकार ने, वहां से उठाकर सेना डाल दी और जाटों को, हरसल गांव के पास, भूमि के बदले भूमि देकर आबाद किया।

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जाटों ने यहां गंगा के किनारे अपना गांव बसाया जिसका नाम बघौरी रखा। यह गांव गंगा के किनारे-किनारे लगभग 300 मीटर तक बसा हुआ है जिसमें लगभग 250 घर हैं। jat ganga ka itihas

लोग बिल्कुल आर्य नस्ल के हैं। स्त्री-पुरुष और बच्चे बहुत सुन्दर हैं। ये लोग बौद्ध धर्म को मानते हैं। इनके गांव में बौद्ध मन्दिर है।

ये लोग भेड़ बकरियां पालते हैं। और तिब्बत से ऊन का व्यापार करते हैं। ये अपने घरों में ऊनी कपड़े बुनते हैं।

नोट – हरसल गांव दोनों गंगाओं के मिलाप से लगभग 7 मील नीचे को गंगा के दाहिने किनारे पर है।

बघौरी गांव हरसल से लगा हुआ है। jat ganga ka itihas

जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत

1, 2. उत्तराखण्ड हिमालय के प्रसिद्ध योगी संसार की योग संस्थान के अध्यक्ष श्री योगेश्वरानन्द जी महाराज (ब्रह्मचारी व्यासदेव जी) के शिष्य ब्रह्मचारी सदाराम योगाचार्य गाँव लोहारहेड़ी जिला रोहतक (हरयाणा) ने यह वर्णन मुझे मौखिक बताया।

वह वहां पर काफी समय तक रहकर आये हैं। (लेखक)

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अन्य ऐतिहासिक विवरण jat ganga ka itihas

उसी समय पुरुवंशी राजा वीरभद्र हरद्वार के निकट तलखापुर का राजा था।  आज भी उस महान् योद्धा वीरभद्र के उस स्थान पर,

उसके नाम का एक रेलवे स्टेशन वीरभद्र है जो हरद्वार से ऋषिकेश को जाने वाली रेलवे लाइन पर ऋषिकेश से दो मील पहले है।

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इस वीरभद्र नाम के स्थान पर भारत सरकार ने दवाइयां बनाने का एक बड़ा कारखाना ( IDPL नाम से ) स्थापित कर रखा है।

राजा वीरभद्र का राज्य वह स्थान था, जहां पर गंगा नदी पहाड़ों से उतरकर मैदानी क्षेत्र में बहने लगती है ।

वीरभद्र आदि गणों को जाट मान लेने की कथा के अन्दर जो ऐतिहासिक तत्त्व छिपा हुआ है, वह यह है –  jat ganga ka itihas

सम्राट ययाति के पुत्र अनु की 9 वीं पीढी में प्रसिद्ध राजा उशीनर जिसके कई पुत्रों में एक का नाम भी शिवि था |

इसी प्रसिद्ध दानी सम्राट् शिवि से शिविवंश प्रचलित हुआ जो कि जाटवंश (गोत्र) है।

पुरुवंशी राजा वीरभद्र जाट राजा था जिसके शिविवंशी गण (संघ) शिवालक पहाड़ियों में थे। इसकी राजधानी हरद्वार के निकट तलखापुर थी।

शिवपुराण में लिखा है कि वीरभद्र की संतान से बड़े-बड़े जाट गोत्र प्रचलित हुए |

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वीरभद्र की वंशावली राणा धौलपुर जाट नरेश के राजवंश इतिहास से ली गई है जो निम्नलिखित हैं। राजा वीरभद्र के 5 पुत्र और 2 पौत्रों से जो जाटवंश चले

(जाट इतिहास पृ० 83 लेखक लेफ्टिनेंट रामसरूप जून) – jat ganga ka itihas ययाति ↓ वीरभद्र ↓

  • (1) पौनभद्र (पौनिया या पूनिया गोत्र)
  • (2) कल्हनभद्र (कल्हन गोत्र)
  • (3) अतिसुरभद्र (अंजना गोत्र)
  • (4) जखभद्र (जाखड़ गोत्र)
  • (5) ब्रह्मभद्र (भिमरौलिया गोत्र)
  • (6) दहीभद्र (दहिया गोत्र)

1. पौनभद्र के नाम से पौनिया (पूनिया) गोत्र चला। यह जाट गोत्र हरयाणा, राजस्थान, बृज, उत्तरप्रदेश, पंजाब तथा पाकिस्तान में फैला हुआ है।

2. कल्हनभद्र के नाम से कल्हन जाट गोत्र प्रचलित हुआ। इस गोत्र के जाट काठियावाड़ एवं गुजरात में हैं।
3. अतिसुरभद्र के नाम से अंजना जाट गोत्र प्रचलित हुआ। ये लोग मालवा, मेवाड़ और पाकिस्तान में हैं।

4. जखभद्र के नाम से जाखड़ जाट गोत्र चला। ये लोग हरयाणा, राजस्थान, पंजाब, कश्मीर और पाकिस्तान में फैले हुए हैं।

5. ब्रह्मभद्र के नाम से भिमरौलिया जाट गोत्र चला। जाट राणा धौलपुर इसी गोत्र के थे। धौलपुर की राजवंशावली में वीरभद्र से लेकर धौलपुर के नरेशों तक सब राजाओं के नाम लिखे हुए हैं।

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इस जाट गोत्र के लोग हरयाणा, हरद्वार क्षेत्र, पंजाब, जम्मू-कश्मीर और पाकिस्तान में हैं।

6. दहीभद्र से दहिया जाट गोत्र प्रचलित हुआ। दहिया जाट हरयाणा, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, पंजाब तथा मध्य एशिया में फैले हुए हैं।

नोट – ऊपरलिखित नामों पर, चन्द्रवंशी आर्यों के संघ से ये जाट गोत्र प्रचलित हुए।

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Randhir Deswal

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