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23 March Shaheed Bhagat Singh | शहीदे आजम भगत सिंह संधू

 

23 March Shaheed Bhagat Singh  (सन् 1907-1930)

23 March Shaheed Bhagat Singh

हमारा आज का विषय है 23 March Shaheed Bhagat Singh सिन्धु गोत्र के जाट सरदार भगतसिंह का जन्म जि० जालन्धर की नवांशहर तहसील के खटकड़कलां बंगा गांव में 28 सितम्बर 1907 को हुआ था।

इसी दिन इनके पिता सरदार किशनसिंह तथा

चाचा सरदार स्वर्णसिंह देशभक्ति के आन्दोलन में सजा काटकर घर आए थे

और उसी दिन उनके चाचा सरदार अजीतसिंह के

निष्कासन की अवधि समाप्त होने की सूचना मिली थी।

इसीलिए बालक को निहायत भाग्यशाली माना गया था। बंगा गांव में प्राइमरी पास करके भगतसिंह ने डी० ए० वी० स्कूल लाहौर से मैट्रिक किया और ब्रेडलाहाल के नेशनल कालेज में भर्ती हो गया।  23 March Shaheed Bhagat Singh

वहां अपनी ही आयु के सुखदेव, भगवतीचरण और यशपाल से इसकी मित्रता हुई और प्रो० भाई परमानन्द एम० ए० का अध्यापन मिला। यहां से 1923 ई० में 16 वर्ष की आयु में जब बी० ए० किया तब तक भगतसिंह की सहानुभूति बब्बर अकाली आन्दोलन से हो गई थी। भगतसिंह के विचार बचपन से ही क्रान्तिकारी थे।

एक बार उनके पिताजी के एक मित्र लाला आनन्दकिशोर ने पूछा कि

“तुम बेचते क्या हो?”

भगतसिंह ने अपनी तोतली भाषा में उत्तर दिया –

“मैं बन्दूक बेचता हूं।

इसी तरह उसने अपने पिताजी से कहा कि आप अन्न बो रहे हो,

आप तलवार बन्दूक आदि क्यों नहीं बोते हैं?

बचपन में ही आप क्रान्ति दल बनाकर अपने साथियों के साथ युद्ध करते थे। जब उनके घरवालों ने उसको विवाह करने को कहा तो वह घर से भागकर कानपुर चला गया। यहां स्व० गणेशशंकर विद्यार्थी के प्रताप प्रेस में बलवन्त नाम से काम करने लगे। यहीं उनकी बी० के दत्त से मित्रता हुई।

वहां से लौटकर लाहौर में नौजवान भारत सभा की स्थापना की।

देहली में इसकी केन्द्रीय समिति बनाई गई।

9 अगस्त 1928 को दिल्ली में फिरोजशाह कोटला के खण्डहरों में

क्रान्तिकारियों की एक मीटिंग हुई।

इसमें भगतसिंह को क्रान्तिकारी आन्दोलन का नेतृत्व सौंपा गया।

इस दल का नाम “हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एशोसियेशन” रखा गया। पार्टी का काम पूरा करने के लिए उसको देश में घूमना था, अतः पार्टी के निर्णय के अनुसार उसने दाढ़ी तथा बाल कटवा दिए। अब वह बम्ब बनाने की कोशिश में थे।

साण्डर्स का वध – 23 March Shaheed Bhagat Singh

इन क्रान्तिकारियों तथा वीर देशभक्तों का लक्ष्य लाला लाजपतराय के हत्यारे एवं हजारों बेगुनाह लोगों को लाठियों से घायल करवाने वाले साण्डर्स को मारने का था।

17 दिसम्बर सन् 1928 को उक्त अंग्रेज अधिकारी मि० साण्डर्स सन्ध्या के लगभग 4 बजे ज्योंही अपने दफ्तर से मोटरसाईकिल पर बैठकर चला त्योंही सामने से रिवाल्वर की गोली उसके सीने में आकर लगी। वह घायल होकर नीचे गिर पड़ा। पड़ते ही दो गोली और आकर लगीं। काम समाप्त हो गया।

ये तीनों उसे मारकर वापिस आ गए।

इन तीनों वीरों के नाम ये थे –

श्री वीरवर भगतसिंह, श्री राजगुरु, श्री चन्द्रशेखर आजाद।

तीनों साण्डर्स को यमलोक में पहुंचाकर

वहीं से डी० ए० वी० कालेज के भोजनालय में गये।

वहां पर्याप्त समय रहकर वहां से चल दिए।

दूसरे दिन लाहौर में सभी प्रमुख स्थानों पर लाल रंग के छपे हुए इश्तिहार लगे हुए थे जिनमें लिखा हुआ था – “साण्डर्स मारा गया। लालाजी की मृत्यु का बदला ले लिया गया। इन्कलाब जिन्दाबाद।”

हम पढ़ रहे है 23 March Shaheed Bhagat Singh

इस घटना से सरकारी अधिकारियों में बड़ी हलचल मच गई। अपराधियों को शीघ्रातिशीघ्र खोज करने का कड़ा आदेश दिया गया। तत्काल ही लाहौर से बाहर जाने वाली सभी सड़कों तथा स्टेशन पर अपना राज्य जमा लिया। उस समय दल के लगभग सभी सदस्य लाहौर में थे।

साण्डर्स के वध के बाद अधिकांश सदस्य वहां से निकल गए थे,

पर समस्या भगतसिंह को बाहर निकालने की थी।

इसको हल किया दुर्गा भाभी ने।

दुर्गा भाभी के पति भगवतीचरण स्वयं क्रांतिकारी थे।

उसने लाहौर से कलकत्ता के लिए फर्स्ट क्लास का कूपे रिजर्व कराया।

भगतसिंह ऊंचे कालर का ओवरकोट पहने, तिर्छा फ्लैट हैट लगाए, बाईं तरफ भाभी के बेटे को गोद में लिए, दुर्गा भाभी को पत्नी के रूप में साथ लेकर पांच बजे की गाड़ी में सवार हुए। बिस्तर बन्द लेकर नौकर की तरह राजगुरु चले और कलकत्ता पहुंच गए।

विशेष घटना है कि जब दिनांक 12.12.1928 को लाहौर में अंग्रेज पुलिस अधिकारी साण्डर्स की हत्या करने के बाद भगतसिंह, राजगुरु तथा दुर्गा भाभी रेल द्वारा कलकत्ता पहुंचने पर सीधे सेठ चौ० छाजूराम की कोठी पर पहुंचकर उन्होंने इस घटना का ब्यौरा सेठ चौ० छाजूराम की धर्मपत्नी लक्ष्मीदेवी को बतलाया तो देवीतुल्य लक्ष्मीदेवी ने खुश होकर इन तीनों को सात दिनों तक अपने हाथों से खाना खिलाया।

इसके बाद सुखदेव तथा दुर्गा भाभी तो दूसरी जगह चले गये

लेकिन भगतसिंह लगभग ढाई महीने वहीं पर रहे।

उस समय उनको अपने घर में रखना कितना बड़ा जोखिम का काम था,

कोई भी सहज से अंदाजा लगा सकता है।

लेकिन इस शेर-ए-दिल जाट परिवार ने ऐसा किया।

इसलिए कम से कम हमें उन्हें उनके निर्वाण दिन 7 अप्रैल को प्रतिवर्ष श्रद्धांजलि अर्पित करनी चाहिए। क्योंकि ऐसा करना हम सभी का कर्त्तव्य और धर्म है।

(पुस्तक – अमर शहीद – भगतसिंह, लेखक – विष्णु प्रभाकर)

जननी जने तो भक्त जनै या दाता या शूर।
नहीं तो जननी बांझ रहे, काहे गंवावै नूर।।

लाहौर स्टेशन तथा देहली आदि अनेक स्टेशनों पर सरकारी पुलिस इन वीर क्रान्तिकारियों को बिल्कुल नहीं पहचान सकी। भगतसिंह तथा उनके साथियों का पुलिस तथा सी० आई० डी० को चकमा देकर निकल जाना उतना ही सराहनीय है जैसे ‘जानी चोर’ तथा नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के चकमे।

दिल्ली की असेम्बली में धमाका –  23 March Shaheed Bhagat Singh

असेम्बली में ‘पुब्लिक सुरक्षा बल’ तथा ‘ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल’ पास हो रहे थे। यह जनता के लिए अच्छे न थे। इनसे जनता अत्यधिक असन्तुष्ट थी। अतः इनका विरोध करने की ठानी।

विरोध इस प्रकार का था कि जब यह बिल पास हों तब सभा भवन में बम्ब फैंका जाय। इस कार्य के लिए वीर भगतसिंह तथा उनके मित्र बटुकेश्वर दत्त को चुना गया।

8 अप्रैल, 1929 को इन दोनों बिलों पर मत पड़ने वाले थे।

उसी दिन ये दोनों वीर वहां जा धमके।

ठीक ग्यारह बजे अध्यक्ष ने घण्टी बजाकर दो विभागों में बांटने को कहा।

यह स्मरण रहे कि यह बिल अध्यक्ष महोदय ने पहले भी ठुकराए थे।

परन्तु कौंसिल ऑफ स्टेट ने इन्हें फिर विचारार्थ भेजा था।

श्रीयुत अध्यक्ष पटेल ने बड़ी मर्म वेदना के साथ यह देखकर कि विरोधियों की संख्या अधिक है, अतः अपने रुंधे हुए कण्ठ से कहा “ये बिल पास”। इतने में एक बम्ब धमाका हुआ। फिर दूसरा बम्ब भी फैंका गया। सभा भवन धुएं से भर गया, इस आवाज़ से सदस्य वर्ग में भगदड़ मच गई।

अध्यक्ष के पास बैठे हुए सर जॉन साइमन पल भर में छिप गये।

होम मेम्बर सर जेम्स का सिर कुर्सियों के नीचे छिप गया।

केवल दो सदस्य अपने स्थान पर बैठे रहे –

पं० मोतीलाल नेहरू और मदनमोहन मालवीय।

ये बम्ब ऐसी जगह फैंके गए कि किसी को चोट न आए।

यदि ये वीर चाहते तो निकल सकते थे, लेकिन वहीं खड़े रहे।

काफी देर बाद सार्जन्ट टेरी और इन्सपेक्टर जॉनसन उनके पास आए जो घबराए हुए थे। भगतसिंह तथा दत्त ने भरे हुए पिस्तौल निकालकर डेस्क पर रख दिए। वे गिरफ्तार हो गये। बम्ब फैंकने के बाद सभा में कुछ शान्ति हुई, तब दोनों ही वीरों ने लाल पर्चे बांटने शुरु कर दिये

जिसका प्रथम वाक्य था “बहरों को सुनाने के लिए जोर से बोलना पड़ता है।” और इसके नीचे “हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन” के अध्यक्ष के हस्ताक्षर थे।

जब पुलिस दोनों को कोतवाली ले जा रही थी तब इन युवकों ने चलते समय “इन्कलाब जिन्दाबाद”, “साइमन का नाश हो” इन नारों से आकाश गुंजा दिया। इस समय उनके मुख पर कोई भय न था और अन्त तक कभी नहीं आया। ये मुस्कराहट के साथ अपने कार्य को सुचारू रूप से कर सकने पर सन्तोष प्रकट कर रहे थे।

दिल्ली की अदालत भगतसिंह की पेशी – 23 March Shaheed Bhagat Singh

इन तीनों वीरों पर मुकदमा चलाया गया। 7 मई से मुकदमा चला, जो 12 जून, 1929 को सेशन में जाकर समाप्त हो गया। भगतसिंह और दत्त ने अदालत में एक मिला जुला वक्तव्य दिया “क्रान्तिकारी दल का उद्देश्य देश में मज़दूरों तथा किसानों का समाजवादी राज्य स्थापित करना है। क्रान्तिकारी समिति जनता की भलाई के लिए लड़ रही है।”

वीरवर भगतसिंह और दत्त ने जो संयुक्त वक्तव्य अदालत में दिया, वह बहुत ही विद्वत्तापूर्ण था। इससे पूर्व किसी भी क्रान्तिकारी ने अदालत में खड़े होकर ऐसा वक्तव्य नहीं दिया। भगतसिंह जिस समय अदालत में आते, उस समय ‘इन्कलाब जिन्दाबाद’ का नारा लगाते।

 

आज़ादी के गीत गाते और फिर उसके बाद क्रान्तिकारी शहीदों का प्रसिद्ध गीत गाते –  23 March Shaheed Bhagat Singh

सर फरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है !
देखना है ज़ोर कितना बाजुए कातिल में है !
वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमां,
हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है।

12 जून, 1929 को, अपने 41 पृष्ठ के फैसले में जज ने दोनों को आजीवन कारावास की सजा सुना दी। इसके बाद भगतसिंह को लाहौर सेण्ट्रल जेल तथा बटुकेश्वर दत्त को मियांवाली जेल में भेज दिया गया। मुकदमे के बीच पहले 15 दिन का अनशन भगतसिंह ने किया। उसका उद्देश्य राजनैतिक कैदियों को जेल में विशेष सुविधाएं देने की मांग थी।

15 जून, 1929 से दूसरा अनशन किया जिसकी सहानुभूति में 30 जून को ‘सिंह दत्त दिवस’ मनाया गया। अनशन के दिनों में ही मियांवाली जेल से लाकर इन्हें “लाहौर षड्यन्त्र केस” में सम्मिलित किया गया। अनशन ज्यों-ज्यों लम्बा पड़ता गया, देश में भगतसिंह आदि के साथ सहानुभूति बढ़ती गई।

52 दिन बीतने पर स्व० मोतीलाल नेहरू ने 4 अगस्त को सार्वजनिक सभा द्वारा सरकार की न झुकने वाली मनोवृत्ति की निन्दा की।

पं० जवाहरलाल नेहरू लाहौर आकर भगतसिंह आदि से मिले और अनशन छोड़ देने की सलाह दी और सच्चाई जानी। पंजाब सरकार के समर्थन से भारत सरकार ने पूर्ण आश्वासन दिया कि सब प्रान्तों में जांच और सुधार कमेटियां नियुक्त की जायेंगी। बहुत शीघ्र पंजाब जेल कमेटी बनी। इस प्रकार 15 दिन के बाद अनशन तोड़ दिया गया।  23 March Shaheed Bhagat Singh

उस समय से पहले जेलों की बड़ी दुर्दशा थी।

भगतसिंह ने व्यापक आन्दोलन उठाकर जो सफलता प्राप्त की

वह उसके जीवन की सबसे बड़ी घटना मानी जाती है।

सरदार भगतसिंह ने भारतीय क्रान्तिकारियों को एक नई देन दी कि

स्वाधीनता के लिए संघर्ष अपराध, नहीं, कर्त्तव्य है।

इसलिए उसे स्वीकार कर लेना निर्भीकतापूर्ण साहस है।

उन्होंने क्रान्ति को धर्म के आधार से राजनीति न करने का आधार दिया। “इन्कलाब जिन्दाबाद”, “साम्राज्यवाद का अन्त हो” “क्रान्ति चिरंजीवी हो” के नारे देकर, देश को समाजवाद के मार्ग पर चलने को ललकार दी। उसका विश्वास था कि देश सशस्त्र क्रान्ति से, चाहे आतंकवाद से, शीघ्र स्वाधीन होना चाहिए जबकि महात्मा गांधी अहिंसा के आधार पर देश की स्वतन्त्रता प्राप्ति चाहते थे।

अदालत में भगतसिंह खूब ज़ोर से बोलते ताकि बाहर खड़े लोग उनकी बातें सुनें, उनकी पार्टी के दर्शन को जान लें और भली प्रकार समझ लें कि वह खूनी नहीं, देश की आजादी तथा तरक्की के दीवाने हैं। वे अदालत में ही गाते –

कभी वह दिन भी आएगा कि जब आजाद हम होंगे,
ये अपनी ही जमीं होगी, ये अपना ही वतन होगा।
शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा॥

कानपुर में 23 अक्तूबर सन् 1928 को जो बम्ब दशहरा के मेले पर फटा था, उससे दस लोगों की मृत्यु हुई तथा 30 घायल हो गये। नौकरशाही ने इस मामले की छानबीन की, जिसके फलस्वरूप पता लगा कि मि० साण्डर्स की हत्या करने में वीरवर भगतसिंह का हाथ भी था। इस सम्बन्ध में 16 व्यक्तियों पर केस चला। 23 March Shaheed Bhagat Singh

सरकार ने एक आर्डिनेन्स गजट प्रकाशित किया।

मुकद्दमा मजिस्ट्रेट से हटकर तीन जजों के एक ट्रिब्युनल के सामने आया।

जस्टिस जी० सी० हिल्टन अध्यक्ष थे

और जस्टिस अब्दुल कादिर तथा जे० के० टैम्प सदस्य थे।

इन तीन जजों की अदालत को यह अधिकार दिया गया था कि

अभियुक्तों की अनुपस्थिति में भी उन पर मुकद्दमा चलाया जाये।

अक्तूबर 1930 को सुबह लाहौर जेल में जाकर ट्रिब्युनल ने इस मुकदमे का फैसला इस प्रकार सुनाया – 23 March Shaheed Bhagat Singh राजगुरु और सुखदेव को फांसी; कमलनाथ तिवारी, विजयकुमार सिन्हा, जयदेव कपूर, शिवशर्मा,

गयाप्रसाद, किशोरीलाल और महावीरसिंह को आजीवन काला पानी; कुन्दनलाल को सात वर्ष की सजा; प्रेमदत्त को तीन साल की कैद और मास्टर आशाराम, अजय घोष, देशराज, सुरेन्द्रनाथ पाण्डेय और जितेन्द्रनाथ सान्याल को बरी कर दिया गया।

वीरवर भगतसिंह की फांसी के समाचारों पर देश के कोने-कोने से रोष प्रकट किया गया। हड़तालें हुईं। 11 फरवरी सन् 1931 को प्रीवी कौंसिल में इस मुकदमे की अपील की गई, किन्तु वह रद्द कर दी गई।

अन्तिम दृश्य –

फांसी वाले दिन तीनों भगतसिंह, राजगुरु तथा सुखदेव लाहौर की जेल काल कोठरी से बाहर आए। तीनों हंसते-हंसते एक दूसरे से मिलकर चले। भगतसिंह ने गाना शुरु किया – “दिल से निकलेगी न मरकर भी वतन की उल्फत, मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आएगी।”

फिर तीनों फांसी के फंदों के पीछे खड़े हो गये।

फिर तीनों ने नारा लगाया –

“इन्कलाब जिन्दाबाद, साम्राज्यवाद मुर्दाबाद।”

इसके बाद फंदों को चूमा।

अपने हाथों से गलों में डालकर जल्लाद से कहा

“इनको ठीक कर लो।”

लाहौर में 23 मार्च सन् 1931 को सायंकाल,

7 बजकर 33 मिनट पर तीनों को फांसी दे दी गई।

यों तो कानून सवेरे फांसी देने का है।

किन्तु इनके लिए इस नियम को भंग किया गया।

23 March Shaheed Bhagat Singh

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उनकी लाशें सम्बन्धियों को नहीं दी गईं तथा उन्हें बड़ी बेपरवाही से मिट्टी का तेल डालकर जला दिया गया। उनके फूल अनाथों के फूलों की भांति सतलुज में डलवा दिए गए।

उन देशभक्त पुरुषसिंहों की अंग्रेज सरकार ने इस प्रकार हत्या कर डाली!

कितना बड़ा अत्याचार, अन्याय तथा अपराध था यह?

कितना बड़ा अत्याचार अन्याय तथा अपराध था यह?

सरकार जनमत की कितनी परवाह करती है?

यह एक इसी बात से वर्तमान भाजपा नेताओं पर जाहिर हो जानी चाहिए थी, किन्तु क्रूर ब्रिटिश सरकार ने इन क्रान्तिकारियों के प्राण लेकर मिटाने की कौशिशें कीं और गांधीवादियों + संघियों ने 23 March Shaheed Bhagat Singh भुलाने की साजिशें कीं, लेकिन क्या वह मिटे?

ब्रिटिश सरकार को भारतीयों के इस तरह के क्रान्ति संघर्ष को देखकर यह निश्चय हो गया था कि “यदि गांधीजी सफल होते हैं तो भारत में अंग्रेज कुछ समय और ठहर सकते हैं, किन्तु वीरवर भगतसिंह सफल होते हैं तो अंग्रेजों की विदाई तुरन्त निश्चित है।”

इन उदाहरणों से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि

देश की स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए कांग्रेस के

गांधीवादी बड़े से बड़े नेताओं की भी तुलना में,

वीरवर जाट भगतसिंह की देशभक्ति, बलिदान,

स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए योगदान आदि महान् कार्य, बहुत बढ़ चढ़कर हैं।

लम्बे समय तक जीवित रहते तो

अंग्रेजों को देश से निकालकर सन् 1947 से बहुत पहले ही आजाद करा देते।

भगतसिंह के शहीद होने की याद में 23 मार्च को

उनके गांव बंगा में प्रतिवर्ष मेला लगता है।

अब भगतसिंह दिवस सम्पूर्ण देश में मनाया जाता है।

देश के अनेक नगरों में आपकी प्रतिमा स्थापित हैं।

आप तीनों शहीदों का स्मारक जि० फिरोजपुर में हुसैनीवाला के स्थान पर सतलुज नदी के तट पर स्थापित किया गया है जिसका उद्घाटन प्रधानमन्त्री श्री राजीव गांधी जी ने अपने करकमलों द्वारा 23 मार्च 1987 को किया था।

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आधार पुस्तक : जाट वीरों का इतिहास 

लेखक : केप्टन दिलीप सिंह अहलावत

आपका भाई चौधरी रणधीर देशवाल जिला रोहतक

Randhir Deswal

Hi, I am Randhir Singh a Solo Travel Blogger form Rohtak Haryana. I am a writer of Lyrics and Quotes.

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