बेचारा जमींदार
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बेचारा जमींदार – एक निबन्ध – जाट गजट – दीनबन्धु सर चौधरी छोटूराम

बेचारा जमींदार

दोस्तों आज का हमारा विषय है बेचारा जमींदार – एक निबन्ध जिसमे हमे भारतीय कृषक की जिन्दगी के बारे में आज से लगभग सौ वर्ष पूर्व पहले दीनबन्धु सर चौधरी छोटूराम द्वारा अपने अख़बार जाट गजट में लिखे गये लेखों में से एक है |

जमींदार भारतीय समाज का सबसे बड़ा कमाऊ पूत हैं, लेकिन टुकड़े – टुकड़े से मुहताज हैं | वह कैसी अच्छी – अच्छी चीजे पैदा करता हैं | दूध, दही, मक्खन इसके घर में ही पैदा होता हैं| गुड, चीनी को तरक्की देने वाला वही हैं | गेहुं, चावल और तमाम दूसरी किस्म की चीजे सब इसी की बदोलत हैं |

बाजारों और मण्डियों की चहल – पहल की रौनक बढ़ाने का खास कारण, ढाका की मलमल और बनारस के गुलबदन का असली मसाला यही पैदा किया करता था, और अब भी यही पैदा करता हैं | नागौरी बैल ओर किसके घर में पैदा होते हैं ?

काठियावाड के तेज चलने वले घोड़ो की पैदायश और किसके अस्तबल में होती हैं? मगर किस कदर दुःख से भरा हाल दुनिया की नजरो के सामने हैं ! सब चीजों का पैदा करने वाला और सब चीजों की हद से अलग दूसरों से मांगने वाला हैं |

तमाम मुल्क की खतिया इसी के पैदा किये हुए अनाज से भरी जाती हैं | रेलगाड़ी इधर से उधर इसी के पैदावार से लदी फिरती हैं | बड़े – बड़े जहाज अपने बोझ के लिए इसी पर निर्भर हैं | मगर बेचारा  जमीदार हैं कि पेट भराई को सूखे अनाज के मिलने का भी भरोसा उसे नहीं होता |

हम पढ़ रहे है बेचारा जमींदार

दूध-घी पैदा करता है मगर कंगाली इस बात की आगया नहीं देती कि इसके बच्चे इन चीजों को रोजाना कहा सके | वे बेचारे कभी त्यौहार के दिन ही इनके जायके जान सकते है | मोटे से मोटा कपड़ा परिवार की जरूरत करने को नहीं मिलता |

गर्मी और वर्ष ज्यो-त्यों गुजार देता है लेकिन जब सर्दी आती है तो मुसीबत बेचारा जमींदार के सिर सवार हो जाती है | अच्छे अच्छे लिहाफ, तोषक और कम्बल उसे सपने में भी नसीब नहीं होते |

अगर रात के लिए मोटे और बगैर रंगे कपड़े की सौड (रजाई) उपर ओढने के लिए और पुराने कपड़ों का बना हुआ कथुला बिछाने को मिल जाये और दिन में खद्दर की चादर या दोहर ओढने को मिल जाये तो बेचारा जमींदार अपने को भाग्यशाली समझता है | मगर इस बेचारे के कुनबे के हर एक आदमी को ये चीजे कहाँ प्राप्त हो सकती है |

सुबह शाम इसके बच्चे धूप की तरफ मुंह करके सर्दी से मुक्ति पाने की कोशिस करते है | जब सोने का वक्त आता है तो एक नई विपत्ति सामने आ जाती है | ओढने को कपड़ा नाकाफी होता है | इसलिए एक -एक चारपाई पर दो- दो तीन – तीन सोते है |

चारपाई को तंग और अँधेरे कमरे में बिछाते है ताकि ठंडी हवा अंदर न जा सके | बार – बार नीचे बिछाने की कमी को इस तरह पूरा करते है कि नीचे जमीन पर फूंस बिछाते है और जमीन पर सोकर फूंस से अमीरों के तोषक का काम लेते है |

महलों में रहने वाले मालदार आदमी इस गरीब बेचारा जमींदार की मुसीबत का अंदाजा क्या जान सकता है ? जो कंगाली की राह नहीं जानता वह बेचारा जमींदार की मुसीबत को क्या जाने ? मगर ए लाड – चाव से पले हुए अमीरों ! ए मुसीबतों को न जानने वाले लखपतियों ! ए मालदार शहर वालों !

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बेचारा जमींदार गरीब देहाती, हलपति जमींदार मुसीबतों की न में जकड़ा हुआ है | इसकी ईद, ईद नहीं है | इसकी शुबरात, शुबरात नहीं है | सबको भुला हुआ है | इसका दशहरा आराम का दशहरा नहीं, रंज और मेहनत का दशहरा है | इसकी होली रंग-रेलियों की होली नहीं है, आंसू बहाने की होली है |

तुम तरह -तरह के मजेदार पकवान खाते हो, वह लाल शक्कर और मोटे चावल के लिए शायद अपना बेला तक गिरवी रखने की फ़िक्र में है | तुम कीमती चटकीले कपड़ों में सजे फिरते हो, वह अपने मोटे खद्दर के कपड़ों को धोबी से धुलवाने और रंगरेज से रंगवाने की जरूरत नहीं रखता |

तुम्हारी औरते सोने के आभूषण से बोझ मरती है, वह बेचारा जमींदार अपनी औरत को किसी एक कम कीमत चांदी की टूम उतरवाने पर रजामंद करने में लगा रहता है ताकि त्यौहार के दिन अपने बच्चों का मुंह किसी तरह मीठा करवा सके |

तुम मेलों में गैसदार पानी ( सोडा वाटर), चाय, कहवा आदि से अपने बिगड़े हुए मिजाज की खातिर करते हो | अगर बेचारा जमींदार अपने गरीब बच्चों को भुनी हुई मूंगफली खरीदने के लिए पैसा दे सके तो वह ईश्वर को धन्यवाद देता है कि मेले में इसका बच्चा भी आराम के सामान से खाली न रहेगा |

परेशानी और फ़िक्र हर वक्त बेचारा जमींदार और उसके सर पर खड़ी रहती है, कभी साहूकार का तकाजा है कभी नम्बरदार का |

दोस्तों यह था हमारा आज का लेख बेचारा जमींदार आपको जरुर अच्छा लगा होगा |

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धन्यवाद, जय हिन्द, जय किसान

आपका भाई चौधरी रणधीर देशवाल जिला रोहतक हरियाणा

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