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किसान के असली दुश्मन कौन | बेचारा जमींदार

बेचारा जमींदार और किसान के असली दुश्मन कौन

किसान के असली दुश्मन कौन ? पिछले 25 साल में किसानो के बीच जब भी एकता का प्रयास किया गया,

तभी जानबूझकर जाति के नाम पर आरक्षण का मुद्दा उछाल दिया गया | कभी आरक्षण देकर तो कभी उसे हटाकर बार – बार जातिगत भावनाएँ भड़काई गई |

पूरी जाति के ठेकेदार बने जिन नेताओं को घर में भी कोई नहीं पूछता वो अख़बारों में बयानबाज़ी करके समाज को जाति के आधार पर बाटने का काम करने लगे |

आरक्षण के नाम पर कागजी तलवारें चलाकर समाज के इन स्वयंभू नेताओ से समाज का तो कोई भला नहीं हुआ लेकिन इन में से अधिकांश करोडो की संपत्ति के मालिक बन गए |

किसान के असली दुश्मन कौन

 

जाट आरक्षण आन्दोलन 2016 का सच पढने के लिए क्लिक करे 

सारी सरकारी नौकरियां अगर एक ही जाति को दे दी जाएं तो भी उस जाति का ही काम नहीं चलना लेकिन आरक्षण की लड़ाई को ऐसे प्रचारित किया जाता हैं,

हमारे नौजवानों- बुजुर्गो की भावनाओ को ऐसे भड़काया जाता हैं जैसे आरक्षण मिलते ही सभी बेरोजगारों को नौकरी मिल जाएगी, सभी का ब्याह हो जाएगा और फिर सारी जिंदगी बुढा – बूढी मौज मारेंगे |

किसान के असली दुश्मन कौन

खैरात में मिले टुकडो से भला नहीं होता ,

भला तब होगा जब मेहनत करने वाले को उसकी

 मेहनत का सही मोल व समाज में सम्मान मिलेगा |

जब 6 महीने की कड़ी मेहनत से तैयार हुई

अपनी फसल को तो हम मंडियों में साहूकार की

मनमर्जी के भाव पर लुटने से बचा नहीं पाते,

जब धरती का सोना कहलाने वाला अनाज तो

मंडी में गुलामो की तरह बोली लगाकर खरीदा जाता है

तो फिर जाति के नाम पर, इज्जत के नाम पर

बड़े – बड़े ढोल गले में लटकाने का क्या फायदा ?

हम पढ़ रहे है किसान के असली दुश्मन कौन

न तो गरीबी की कोई जाति है और न भूख की, कर्जे के नीचे सिर से पैर तक दब चुके किसान समाज को अब इन जाति के ठेकेदारों को राम – राम कर देनी चाहिए नहीं तो यु ही टुकडो में बटकर सरकारों व साहुकारो की गुलामी करते रहना पड़ेगा |

आज किसान को जाति, धर्म व पार्टी के आधार पर एक दुसरे से दुसरे से लड़ने की बजाय ‘किसान कौम ‘ के रूप में अपने आपको संगठित करना होगा ताकि आने वाली पीढियों का भविष्य सुधारा जा सके |

इस प्रकार हम देखते हैं कि एक तरफ तो आरक्षण कम करने की बात होती रही, वहीं दूसरी ओर आरक्षण बढ़ाने की,

लेकिन भारतवर्ष के किसान विशेषकर जाट किसान जो उत्तरी भारत में हजारों की संख्या में (यदि सही सर्वे किया जाये तो इनकी संख्या लाखों की होगी) आत्म-हत्याएं कर रहे हैं लेकिन इनके आरक्षण के बारे में आज तक सरकार ने कभी नहीं सोचा।

जबकि खुद सरकार के एग्रिकल्चर कमीशन (Agriculture Commission) ने रिपोर्ट दी की जिस किसान की जोत दस एकड़ से कम है वह घाटे का धंधा है |

सरकारी सर्वे रिपोर्ट कह रही है कि 40 प्रतिशत किसान यह धंधा करना नहीं चाहते जबकि सच्चाई यह है कि आज शायद ही कोई किसान इस घाटे के धंधे को करना चाहता हो।

वास्तव में इसके पीछे एक गुप्त प्रचार है, जिससे जाट व किसान भूमि का मोह त्याग दें। इन्हें जमीन की कीमत का लालच देकर आसानी से जमीन को अधिगृहीत व हथियाया जा सके और आनेवाले समय में ये मजदूर बनकर रह जायें।

Real enemy of farmer – Bechara Kisan

किसान-के-असली-दुश्मन

यह बड़ी गहरी चालें हैं। इन्हें हमे समझना होगा। यह विकास के नाम से हमारा (जाट किसानों का) विनाश है।

पहले हम साहूकारों के गुलाम थे, अभी बैंकों के गुलाम हैं। रहे गुलाम के गुलाम। यही बैंक आज किसान मजदूर की कीमत पर साहूकारों के लिए चल रहे हैं।

पं. नेहरू ने देश आजाद होते ही जमीन सरप्लस होने का कानून बनवाया जिससे किसानों की जमीन सरप्लस होती रही और किसान भूमिहीन व बेरोजगार होते रहे, लेकिन क्या कभी किसी अरबपति का एक पैसा भी दूसरे के लिए सरप्लस हुआ है?

पूर्व प्रधानमन्त्री श्री मनमोहनसिंह जी सेज (SEZ) का जो अलाप कर रहे हैं ये सब बड़े व्यापारियों व विदेशी कम्पनियों के लिए है।

वर्तमान प्रधानमन्त्री मोदी को ही देख लीजिये बड़े बड़े उद्योगिक घरानों को तो अरबों की छुट पर एक किसान के दो हजार के कर्ज़ के पीछे बैंक, पटवारी, नम्बरदार और सरकार कुत्ते की तरह पड़ी है |

किसानों के लिए इसका अर्थ है (Suck Every Zamindar) अर्थात् प्रत्येक किसान को चूस लो।

Real enemy of farmer – Bechara Kisan

 

किसान को उसकी फसल की कीमत देने को तैयार नहीं। परिणामस्वरूप किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं।

सभी ने सल्फास तथा एल्ड्रीन खा व पीकर आत्महत्याएं कीं, जो दोनों फसल की दवाइयां हैं।

कानूनी पचड़ों से बचने के लिए कई बार कहा गया कि गलती से सल्फास की गोली व एलड्रीन पी ली गई, जबकि ऐसा होना बिल्कुल असंभव है।

क्योंकि दोनों ही दवाइयां बेहद कड़वी हैं जो गलती से भी कोई व्यक्ति अन्दर नहीं गटक सकता है।

ऐसी भी आत्महत्याएं हैं जिनको पेट दर्द या छाती दर्द बोलकर श्मशान घाट पहुंचा दिया जाता है।

आम तौर पर प्रचार किया जाता है कि शराब पीकर या गोली खाकर मर गया। लेकिन इस बात पर कभी भी गम्भीरता से विचार नहीं किया जाता कि गांव के किसान का 22 साल का लड़का आज क्यों इतनी शराब पीने पर मजबूर हो गया है?

इसका मुख्य कारण आर्थिक तंगी और बेरोजगारी ही है जिसमें सबसे पहले बेरोजगार के जीवन में हताशा पैदा होती है

फिर यही हताशा एक दिन निराशा में बदल जाती है, जिसका सीधा रास्ता आत्महत्या की तरफ खुलता है।

एक बड़ी आम कहावत है ‘टोटे में तो लठ ही बजते हैं।’ इस सभी के पीछे सरकार द्वारा किसानों की अनदेखी, सरकार की ‘उदार आर्थिक नीति’ व WTO (वर्ल्ड ट्रेड ओर्गेनाईजेशन) जिसे मैं Workers Totally Out अर्थात् सरकार की वह नीति जिसमें कमेरे वर्ग को पूर्णतया बाहर कर दिया गया, कहता हूँ।

इसी से बहुत सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि जब एक साधारण जन-संख्या वाले गाँव में इस नीति के लागू होने के बाद से (सन् 1991) 28 जाट किसानों के लड़कों ने आत्महत्याएं कीं तो फिर 35000 गाँवों व कस्बों में कितने जाटों ने व दूसरे किसानों ने आत्महत्याएं की होंगी।

किसान-के-असली-दुश्मन

Real enemy of farmer – Bechara Kisan

इस उदार आर्थिक नीति को सरदार मनमोहनसिंह कोहली (सिक्ख खत्री पंजाबी) ने सन् 1991 में लागू किया जब वे श्री नरसिंह राव (तेलगू-ब्राह्मण) के प्रधानमंत्री काल में वित्तमंत्री थे।

यह उदार नीति केवल बड़े व्यापारियों के लिए ही उदार है, छोटे व्यापारी, किसान व मजदूर के लिए नहीं।

क्योंकि हमारे प्रधानमन्त्री श्री मनमोहनसिंह कोहली के पिता जी सूखे मेवों के व्यापारी थे न कि किसान व मजदूर।

आज मोदी हमारे प्रधानमन्त्री है जिनके बनिया परिवार का किसानी से दूर दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं रहा |

इसलिए इन्होंने किसानों की सब्सिडी समाप्त करके किसानों के साथ विश्वासघात किया और इसका लाभ खाद बनाने वालों को दिया गया।

हम जानते हैं कि आज (अगस्त सन् 2007) भारत सरकार के पास 222 लाख अरब रुपये की विदेशी मुद्रा का भण्डार है

जिससे सरकार अनाज व आधुनिक हवाई जहाज खरीद रही है जिससे आज न तो भारतीय किसान की आवश्यकता रहेगी और न ही भारतीय जवान की।

यह तो कारगिल युद्ध था जिसमें पैदल सेना जवान के महत्त्व का फिर से पता चला, वरना कहना शुरू कर दिया था कि आज के युग में ऐसे आधुनिक हथियार आ गए हैं कि पैदल सेना का कोई विशेष महत्त्व नहीं रहा है।

लेकिन जवान की कहानी भी ऐसी ही है जैसे किसान की। वह हताश होकर आत्महत्या कर रहा है या फिर अपने ऊंचे अधिकारी को मार रहा है।

किसान की भूखमरी का सबसे बड़ा कारण उसकी मेहनत न देना अर्थात् फसल की कीमत न मिलना, उसकी लागत बढ़ना और सब्सिडी समाप्त करना है जबकि अमेरिका अपने किसान को 160 प्रतिशत तक सहायता कर रहा है।

गैरों के राज में था गुलामी का रंज।
नाकों चने चबा दिये, अपनों के राज ने॥

यह भी पढ़े किसान शक्ति का अडिग स्तम्भ जननायक चौधरी देवीलाल 

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जय हिन्द जय किसान |

Real enemy of farmer – Bechara Kisan

Randhir Deswal

Hi, I am Randhir Singh a Solo Travel Blogger form Rohtak Haryana. I am a writer of Lyrics and Quotes.

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