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किसान की कमजोरियां और उनका सुधार | एक किसान चिंतक का आत्ममंथन

दोस्तों हमारा आज का विषय है किसान की कमजोरियां और उनका सुधार : – गर्मी, सर्दी, धुप छाँव में कड़ी मेहनत करके देश का पेट भरने वाला एवम् देश की सीमाओं की सुरक्षा करने के लिए अपने बहादुर बेटों को समर्पित करने वाला किसान अपने स्वयं के हक के लिए एकता क्यों नही कर पाता, यह प्रश्न हैरान करने वाला है |

किसान की कमजोरियां

हम सारा दोष सरकारों को देकर अपनी उन कमजोरियों के प्रति आँख नहीं मुंद सकते जिनके कारण हम हर प्रकार से समर्थ होने के बावजूद आज तक हम किसान साहूकारों व सरकारों के चुंगल से आज़ाद नहीं हो पाए |

यही हम अपनी कमजोरियों को पहचान कर उन्हें दूर नहीं कर पाए तो यह कमजोरियां फिर हमारे रास्ते का रोड़ा बनकर हमारे संघर्ष को अंजाम तक नहीं पहुंचने देंगी |

इसलिए हमे सबसे पहले इन कमजोरियों को ही जड से खत्म करना होगा तभी एक टिकाऊ व मजबूत आन्दोलन खड़ा हो पायेगा |

आइये हम जानते है मुख्य किसान की कमजोरियां क्या क्या है :-

  1. आपसी जलन – किसान समाज में आपस की जलन के कारण कभी टिकाऊ एकता नहीं हो पाती | जब भी कोई सच्चा आदमी किसान समाज में एकता करके उसकी हालत सुधारने की कोशिश करता है, बिना बात के ही हजारों के मन में जलन हो जाती है कि उस व्यक्ति को कैसे नीचा गिराया जाये |

हर बात पर उस अच्छे और सच्चे आदमी में कमियां निकालकर

उसे समाज की नजरों में नीचे गिराने की कोशिश शुरू हो जाती है |

ना तो कोई खुद आगे आकर अच्छा काम करना चाहता है और

ना ही किसी दुसरे को करने देना चाहता है |

आपस की इसी जलन की वजह से हम हजारों साल तक

गुलामी की जंजीरों में जकडकर इस्कते रहे |

अगर किसान समाज को अपनी हालत में कोई सुधार करना है

तो सबसे पहले इस आपस की जलन को खत्म करना होगा |

यही किसान की कमजोरियां दूर करने का पहला इलाज है |

  1. अच्छे के समय पर साथ ना देना – हमारे देश का इतिहास इस बात का गवाह है कि जब भी जुल्म, अत्याचार और नाइंसाफी के खिलाफ किसी ने लड़ाई का झंडा उठाया है तो समाज ने सही समय पर उसका साथ नही दिया |

चाहे वो सरदार भगत सिंह संधू हो या राजा महेंद्र प्रताप ठेनुआ या फिर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, इसके जीते-जी इन्हें समाज से पूरा समर्थन नहीं मिल पाया |

आज बेशक सारा देश इन्हें पूजता हो लेकिन जब राजा महेंद्र प्रताप ने सारा देश ही नही बल्कि विदेशों तक में घूमकर जनता से अंग्रेजों के खिलाफ सीधी लड़ाई लड़ने का आह्वान किया तो जनता ने इनकी बात मानने की बजाये गाँधी अजी के बहकावे में आकर शांति- शांति रटना जारी रखा |

मजबूर होकर उन्हें देश बद्र होकर भारत की आज़ादी के लिए पुरे 35 साल विदेशो में ही आज़ादी की लड़ाई के लिए संघर्ष करना पड़ा |

आज हम पढ़ रहे है किसान की कमजोरियां और उनका सुधार

जीते -जी भगत सिंह को क्रांति के रास्ते पर साथ देने वाले मुट्ठी भर साथी भी मुश्किल से मिल पाए लेकिन उनके फांसी पर चढ़ जाने के बाद उन्हें कंधा देने के लिये लाखों लोग आ गये |

अच्छे और सच्चे लोग जब भी संघर्ष क्र रहे होते है तो समाज का साथ ना मिलने के कारण बुराई द्वारा ताकत के जोर से उन्हें दबा दिया जाता है |

जब सच्चाई के रास्ते पर चलते हुए यह कुर्बान हो जाते है

तो फिर यही समाज उनकी जय-जयकार करने लगता है,

लेकिन मरने के बाद इस जय-जयकार का कोई फायदा नही होता |

सच्चाई के रास्ते पर चलने वालों का अगर सही समय पर

साथ नहीं दिया जायेगा तो फिर बार-बार यूँ ही पछतावा करना पड़ेगा |

3. नौजवान के नेतृत्व पर भरोसा न करना –

जब भी इतिहास में बड़े बदलाव आये है, बड़ी क्रांतियाँ हुई है उनके पीछे हमेशा ही नौजवान नेता रहा है | हमारे देश में आज़ादी की लड़ाई में बड़ा बदलाव नेताजी सुभाष, भगत सिंह, करतार सिंह सराबा, चन्द्रशेखर आज़ाद और असफाक उल्ला जैसे नौजवानों ने आज़ादी का झंडा उठाया |

उनसे पहले के आंदोलनकारी तो अंग्रेजों से छोटे-मोटे सुधारों के

आश्वासन लेकर ही काम चला रहे थे, लेकिन इन नौजवान क्रांतिकारियों ने

टुकड़े की लड़ाई को छोडकर सम्पूर्ण आज़ादी की मांग की |

इन्होने कहा कि हमारा पहला नारा आज़ादी है और इसके लिए ही आड़े का संघर्ष होगा |

इन नौजवानों के दबाव में गाँधी जी ने पूर्ण स्वराज को अपने आन्दोलन का ध्येय बनाया

वरना वो भी पहले तो अंग्रेजों के टुकडो में के सुधारों से ही संतुष्ट थे |

आज सारा देश भी इस बात को मानता है कि देश को आज़ादी दिलाने में सबसे बड़ा योगदान सरदार भगत सिंह और नेताजी सुभाष जैसे नौजवानों का था, लेकिन आज जब एक नौजवान के नेतृत्व में कौमी या फिर किसान का यह आन्दोलन चलाने बात आती है तो अपने आपको समाज के बड़े बुजुर्ग ठेकेदार बताने वाले कुछ दल्ले सवाल उठाने लगते है |

आज किसान को अपनी आज़ादी के लिए नौजवान नेतृत्व की सख्त जरूरत है, जो उसे सही दिशा में ले जा सके और वक्त पड़ने पर कुर्बानी भी दे सके |

किसानों को नौजवान नेतृत्व पर भरोसा करना होगा तभी किसान की कमजोरियां दूर होंगी व उसकी हालत में सुधार आ सकेगा और जड़मूल परिवर्तन की यह लड़ाई सफल हो सकेगी |

4. धर्म का त्याग

जब भी कोई समाज, जाति या देश पूरी दुनिया को चलाने वाले उस परम परमात्मा के नाम पर ठगी करने लगता है तो उस समाज के कुछ पुरोहित, मौलवी और ग्रन्थि ठेकेदार बन जाते है जो किसान की कमजोरियां भांपकर उनके अधिकारों की लड़ाई के हर समय रोड़े अटकाने लगते है | जब भी गरीब किसान समाज अपने हक क्व प्रति जागरूक होता है तो यह ठेकेदार उसको धर्म का किलोरोफोर्म सुंधा कर चित कर देते है |

किसान एकता में दूसरी सबसे बड़ी रुकावट यही पुरोहित लोग है

जो उसे समर्थ बनने की जगह भाग्य के भरोसे रहने का पाठ पढाते है |

गंगोत्री उत्तराखंड से लेकर फरक्का बाँध बंगाल तक गंगा नदी के दोनों तरफ

यह पाखंडी अपनी दुकाने सजा कर बैठे हुए है

जो हमे पूजा पाठ व धर्म के नाम पर भाग्य के भरोसे रहने का उपदेश तो देते है |

यज्ञ तर्पण करके खुद तो मलाई खाते है पर दूसरों को ईश्वर के भरोसे रहने का संदेश देते है कि परमपिता इनकी हालत को खुद तब ही सुधारेंगे जब ये लोग इन पाखंडियों को दान दक्षिण देकर अपने पाठ धुलवा लेंगे जबकि हकीकत यह है कि इसी गंगा के किनारे भारत के सबसे गरीब लोग रहते है उनके पाप धुले या नहीं यह तो पता नही पर गरीबी तो धूल नहीं पाई |

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5. राजनितिक पार्टीबाजी

सभी राजनितिक पार्टियों ने किसान के बीच अपने कुछ पालतू कुत्ते छोड़ रखे जो सही गलत कहने की बजाए वाही कहते है जो इनके आका और उनकी पार्टी के फायदे में हो और दुसरे के नुकसान में |

जब भी किसान समाज को एकता के सूत्र में बाँधने की कोशिश होती है

तो यह राजनितिक पार्टियों के दल्ले अपनी अपनी चल चलने लगते है

और अपने आपको सच्चा पार्टी कार्यकर्ता कहने वाले लोगों के द्वारा

किसान की कमजोरियां पकडकर किसानों की एकता में सेंध लगाई जाती है |

जिस पार्टी की सरकार हो उसके कार्यकर्ता आन्दोलन के नेता को बदनाम करने में लग जाते है

ताकि यह आन्दोलन फेल हो जाये और उनकी पार्टी की सरकार बनी रहे |

किसानों को बहकाने के लिए यह हर प्रकार के ओछे हथकंडे

और झूठे आरोप का सहारा लेने से भी नहीं हिचकते |

वही विपक्ष पार्टियों के कार्यकर्ता आन्दोलन को भड़काने में लग जाते है ताकि यह आन्दोलन हिंसक हो जाये और स्र्क्लर से टकराव में जान -माल का नुकसान हो जिससे उस सरकार की छवि खराब हो |

यह विपक्षी पार्टियों के कार्यकर्ता सोचते है कि अगले चुनाव में उनकी पार्टी को फायदा हो जायेगा, उनकी पार्टी की सरकार बन जाएगी |

किसान एकता को भी राजनितिक पार्टी नही चाहती

जब अगले चुनाव में उनकी पार्टी की सरकार आ जाती है तो वो भी पाला बदल लेते है, अब वो किसान के आन्दोलन का समर्थन करना छोडकर उसके विरोधी हो जाते है और कहते है यह विपक्ष की सरकार को बदनाम करने की चाल है |

इस प्रकार विरोध व समर्थ का खेल चलता रहता है जिसमे चेहरे बदल बदल कर सरकार बनती है पर किसान वही अपने दुर्भाग्य के साथ गर्त में खड़ा मिलता है |यही तो किसान की कमजोरियां है |

यदि किसान समाज अपनी एकता कायम करना चाहता है

तो उसे इन घटिया राजनितिक पार्टियों का पिछलग्गू बनना छोडकर

”किसान कौम” के हक की खातिर सच्चे लोगों का साथ देना होगा |

राजनैतिक पार्टियों के लिए लड़ाई लड़ते और उनको वोट डालते हुए

आज लगभग 71 वर्ष बीत चुके है पर किसान की हालत

गुलामी के दौर से भी बदतर होती जा रही है |

अंग्रेजों के समय में भी किसान इतने शोषण का शिकार नही था जितना वह आज भुगत रहा है | इसी लिए रहबरे आजम चौधरी छोटूराम ने कहा था , ‘हम गोरे बनियों का राज़ बदलकर काले बनियों की सरकार नही चाहते हमारी कोशिश है कि देश में गरीब किसान मजदूर की सत्ता हो ” | यही बात एक बार शहीदे आजम भगत सिंह ने भी कही थी |

आज उनकी कही बात अक्षरशः सही साबित हो रही है आज देश से गोरे अंग्रेज़ चले गये पर काले अंग्रेजों ने गरीब किसानों मजदूरों व बहुसंख्यक कमेरी जनता को लुटकर शोषण की हदे पार कर दी है | इस विषय में एक शायर का शेर याद आता है जो इस प्रकार है :-

गैरों के राज़ का हमें गम बड़ा था ग़ालिब
पर नाकों चने चबवा दिए इन अपने के राज़ ने

दोस्तों मुझे किसान के विषय में जो जो मंथन किया था जो महसूस हुआ वह इस लेख में लिख दिया है उम्मीद है आपको यह पसंद आएगा,

आपको हमारा लेख किसान की कमजोरियां और सुधार कैसा लगा

अगर आपके पास भी कोई जानकारी है

जो हमारे पाठकों से शेयर करना चाहते है

तो हमे कमेन्ट में जरुर बताये

जय किसान जय हिन्द

 

आपका अपना चौधरी रणधीर देशवाल जिला रोहतक हरियाणा

Randhir Deswal

Hi, I am Randhir Singh a Solo Travel Blogger form Rohtak Haryana. I am a writer of Lyrics and Quotes.

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