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किसान की एकता का विरोधी कौन? | पूंजीपति धार्मिक लुटेरे

असली लुटेरे कौन

किसान की एकता

किसान की एकता कोई भी राजनैतिक पार्टी नहीं चाहती | जब भी कोई आन्दोलन चलता है , ऊपर से दिखावे के लिए सभी पार्टिया समर्थन करती दिखाई देती है लेकिन यह सारी पार्टिया नीचे ही नीचे अपने चेलो को आन्दोलन तोड़ने के काम पर लगा देती है |

चाहे सरकार में हो, चाहे विपक्ष में हर पार्टी किसानो के नाम पर सिर्फ राजनीती करती है, सच्चाई से किसानो की एकता हो यह कोई नहीं देखना चाहती | किसानो की एकता में सबसे बड़ी रूकावट ये राजनैतिक पार्टिया और उनके चेले-चपाटे ही डालते है |

किसान की एकता के दुसरे सबसे बड़े विरोधी धर्म व

जाति वो ठेकेदार है जो सदा से समाज को तोड़ते आए है |

धर्म के ठेकेदारों में अधिकांश तो पूंजीपति वर्ग से ही  हैं

जिनका मकसद है किसान व मजदुर का ध्यान

उसके साथ हो रही ठगी व लूट से भटकाकर,

उसे धर्म के नाम पर आपस में ही लड़ा देना हैं |

 कहीं मंदिर के मुद्दे पर तो कहीं मस्जिद के मुद्दे पर समाज को बाटनें वाले धर्म के ठेकेदार कर्जे और हर साल के घाटे से जहर खाकर जान देने वाले किसान के लिए कभी  झूठी सांत्वना देने भी नहीं आते, लेकिन मंदिर के या मस्जिद के आगे अगर दुसरे मजहब का जुलुस निकलता है तो सारे देश में आग लगाने पर तुल जाते हैं |

धर्म के नाम पर अधिकांश संगठन उन पूंजीपतियो के पैसे से चल रहे हैं जो कि सरेआम किसान की मेहनत को मंडियों में लूटते हैं । किसानों की मेहनत से लूटा गया यह पैसा ही वो किसान का ध्यान असली लूट से भटकाकर उसे धर्म के नाम पर आपस में लड़ाने में खर्च करते हैं ।

हम पढ़ रहे है किसानो की एकता का विरोधी कौन 

हम भारतीय सभ्यता, संस्कृति के अनुसार धर्म का मकसद आत्मा को परमात्मा से मिलना हैं, समाज को आपस में जोड़ना हैं । ऐसा पंथ जो भाई को भाई हैं जो सरेआम किसान की मेहनत को मंडियों में लूटते हैं ।

किसानों की मेहनत से लूट गया यह पैसा वो

किसान का ध्यान असली लूट से भटकाकर

उसे धर्म के नाम पर आपस में लड़ाने में खर्च करते हैं ।

हम भारतीय सभ्यता, संस्कृति के अनुसार

धर्म का मकसद आत्मा को परमात्मा से मिलना हैं,

उस देश के सभ्य समाज को आपस में जोड़ना हैं ।

ऐसा पंथ जो भाई को भाई से लड़ने का काम करे, वो धर्म नहीं बल्कि पाखण्ड हैं । किसान समाज को ऐसे पाखण्ड से बचना होगा ।
जाती के नाम समाज में जहर घोलने वाले भी किसान की एकता के दुश्मन हैं ।

कहीं अपनी जातिगत श्रेष्ठता को दिखाने के नाम पर

तो कहीं आरक्षण लेने व हटाने के नाम पर

जो समाज को बाटे रखने की कोशिश हो रही हैं,

उसकी तह तक जाकर हमें सच्चाई का पता लगाना होगा

कि इस साजिश का सूत्रधार कौन हैं ? 

1947 से लेकर 1980-85 तक देश में

किसानों के मुद्दे से देश की राजनीति चलती थी ।

किसान ही देश की राजनीति का केंद्र बिंदु था

 किसान के हक की बात करने वाली ही देश में नेता बनते थे ।

जब किसान के घर में पैदा होकर संघर्ष करके व्यक्ति देश के प्रधानमंत्री पद तक पहुचने लगे तो सालों से एयर कंडीशन कमरों में बैठकर देश के राज का मजा लूट रहे सत्ताधारियों एवं उनकी पूंजीपति मित्रमंडली को बड़ी तकलीफ महसूस हुई। देश के किसान की एकता को खंडित करने के लिए उन्होंने 1989 में पिछड़ा वर्ग आरक्षण के नाम पर किसान जातियों में फूट का बीज बो दिया । 

किसान को गर्त से निकालने का काम सिर्फ सर छोटूराम ने किया

आरक्षण देना ही था तो जाति के आधार पर बाटने की बजाय

आर्थिक रूप से पिछड़े छोटे किसानो दिया जाना चाहिए था

लेकिन उस समय के घटिया सत्ताधारियों का मकसद तो

किसान की एकता को तोड़कर उसे जाति के नाम पर लडाना था,

असल में यह झुनझुना यानि आरक्षण का तो सिर्फ बहाना था,

असलियत में उन फ्री की मलाई खाने वालो को किसान की एकता से डर लगने लगा था |

पिछले 25 साल में किसानो के बीच जब भी एकता का प्रयास किया गया,

तभी जानबूझकर जाति के नाम पर आरक्षण का मुद्दा उछाल दिया गया |

Randhir Deswal

Hi, I am Randhir Singh a Solo Travel Blogger form Rohtak Haryana. I am a writer of Lyrics and Quotes.

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