जाट समाज की मुख्य पत्र / पत्रिकाएं / स्मारिकाएं

जाट समाज की मुख्य पत्र / jat patrika / स्मारिकाएं

jat patrika – जाट पत्रिका स्मारिकाएं एक ऐसा विषय है जो किसी भी समाज की चेतना उनके ज्ञान से सीधा जुडा हुआ मुद्दा है |

किसी भी समाज को अपने ऐतिहासिक व वर्तमान गौरव की जानकारी होना उतना ही जरूरी है जितना अन्य जमीनी जरूरतों का |

क्योंकि चौधरी छोटूराम ने भी एक बार कहा था जो कौम अपना इतिहास भूल जाति है वो अक्सर मिट जाया करती है |

वीर तेजाजी के भजन पढने के लिए यहाँ क्लिक करे 

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आइये जानते है हमारे समाज की कितनी व कहाँ से jat patrika व स्मारिका इस समय प्रकाशित होती है :-

  1. जाट गजट चौ. रणधीर देशवाल नांदल भवन, मस्तनाथ नगर रोहतक phone 8816052038
  2. ‘जाट चेतना (मासिक) सम्पादक प्रेमपाल संधू पता संधू भवन, 700 -ए सेक्टर-7 करनाल, फोन – 2282991
  3. ”जाट लहर  मासिक सम्पादक जाट सभा चंडीगढ़ जाट भवन सेक्टर 27 मध्य मार्ग चण्डीगढ़ 160019
  4. जाट’ गरिमा राधेश्याम लाकड़ा पता – 7 बसंत बिहार मंगला बट्टू रोड मेरठ फोन – 2647419
  5. जाट” बन्धु सम्पादक श्रीकिशन फौजदार  31 ए सुभाषपुरम बोदला आगरा -7
  6. तेजाजी एक्सप्रेस  सम्पादक गजराज सिंह चौधरी वीर तेजा नगर खजवाना नागौर
  7. जाट. परिवेश मोहन कम्प्यूटर सेंटर चौथी पट्टी लाडनू नागौर राजस्थान
  8. जाट”’ हलचल श्री पुरखा राम चौधरी 17 कुड़ी भगतासनी हाउसिंग बोर्ड जोधपुर
  9. सूरज सुजान मासिक महाराजा सूरजमल संस्थान सी-4 जनकपुरी दिल्ली
  10. जाट समाज सी-20 न्यू आगरा, सम्पादक श्री राजेन्द्र फौजदार
  11. जाट दर्शन पत्र डॉ जिले सिंह राणा 6-बी जाट धर्मशाला काम्प्लेक्स हिसार
  12. हम है जाट सम्पादक चौ. चन्द्रप्रकाश डूडी पहला चौराहा किशनपोल बाज़ार जयपुर
  13. जाट पत्रिका ज्योति  जाट बायोग्राफिकल सेंटर रामकृष्ण बिहार आई.पी. एक्टेंशन दिल्ली
  14. नव जाट वीर सम्पादक प्रेम सिंह डॉ राजेन्द्र प्रसाद कालोनी तानसेन मार्ग ग्वालियर
  15. जाट- पत्रिका सेवक सम्पादक श्री दिलीप सिंह बेनीवाल पता बेनीवाल ट्रेवल्स जयपुर
  16. पुरषार्थ  सम्पादक श्री संतोष ठाकुर तुलसीनगर, जाट सभा भोपाल
  17. जाट’ पत्रिका जागृति  सम्पादक गणपत सिंह कंवर मध्य प्रदेश जाट विकास संघ उज्जैन

जाट पत्रिका – jat patrika स्मारिकाएं 

सभी कौम अपने इतिहास विरासत व अधिकारों के प्रति जागरूक होती है और ऐसा होना भी चाहिए क्योंकि इतिहास सिर्फ भूतकाल की कहानियाँ नही बल्कि हमारे भविष्य का रहबर (गाइड) भी होता है |

  1. स्मारिका वार्षिक  सम्पादक प्रेम सिंह डॉ राजेन्द्र प्रसाद कालोनी तानसेन मार्ग ग्वालियर
  2. जाट, गौरव  सम्पादक रत्न सिंह वर्मा अधिकार सोसायटी साबरमती अहमदाबाद गुजरात

जाट समाज की अनमोल धरोहर जाट धर्मशाला कुरुक्षेत्र के बारे में पढने के लिए यहाँ क्लिक करे 

JAT DHARAMSHALA KURUKSHETRA

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एन.सी.ई.आर.टी. अर्थात् नेशनल कोंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एण्ड ट्रनिंग, जो केन्द्र सरकार के अधीन पूरे देश में शिक्षा की एक जिम्मेवार संस्था है, जिसका मुख्यालय नई दिल्ली में है।

यही संस्था सारे देश में केन्द्रीय विद्यालयों के लिए पाठ्यक्रम तैयार करती है। छठी कक्षा की इतिहास की पुस्तक तथा 10+2 कक्षा की इतिहास की पुस्तक में जाट जाति को डाकू व लुटेरा लिखा गया।

यह कई वर्षों से लिखा चला आ रहा है। इस प्रकार की विचारधारा वाले लेखकों की एक मण्डली रही है जिसमें विशेष रूप से विपिनचन्द्र, डॉ. रोमिला थापर व मैडम दत्ता आदि जैसे कम्यूनिस्ट तथा ब्राह्मणवादी विचारधारा के लेखक रहे हैं,

जिन्होंने जाटों के विरुद्ध ऐसी टिप्पणियाँ सरकारी तौर पर लिखकर बच्चों को जाटों के बारे में अनुचित जानकारी देने का प्रयास किया है।

इन लेखकों से मेरे कुछ निम्नलिखत प्रश्न हैं कि –

i) प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सन् 1857 में अम्बाला व मेरठ आदि अंग्रेजी सैनिक छावनियों के शस्त्रगृहों से हथियार व गोला बारूद लूटने वाले क्रान्तिकारी क्या डाकू व लुटेरे थे?

ii) 9 अगस्त सन् 1925 को हरदोई से लखनऊ जाने वाली 6 डाउन यात्री रेलगाड़ी से काकोरी रेलवे स्टेशन पर इस गाड़ी में लदा अंग्रेजों का खजाना लूटनेवाले रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, रोशनसिंह व मन्मथनाथ गुप्त आदि क्या डाकू व लुटेरे थे?

iii) देश की आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों के अधीन पुलिस से हथियार व गोला बारुद लूटनेवाले सरदार अमर शहीद भगतसिंह संधु के साथी सरदार करतारसिंह ग्रेवाल व सरदार बन्तासिंह आदि क्या डाकू व लुटेरे थे?

यदि आप स्वीकार करते हैं कि ये सभी डाकू व लुटेरे थे तो मेरा कहना है कि आज भारत में रहने वाले लगभग 6 करोड़ 80 लाख जाट जो अपने लगभग 4800 गोत्रों, 600 खापों के साथ लगभग 25000 गाँवों व कस्बों में रहने वाले सभी के सभी जाट डाकू व लुटेरे हैं, जिसका मुझे तथा मेरी जाति को गर्व है।

यदि नहीं, तो फिर आप अंग्रेजों के हथियार, गोलाबारूद व खजाना लूटनेवालों को क्रान्तिकारी और देशभक्त मानते हैं तो आपने मुगल शासकों व नवाबों के हथियार, असबाब व खजाना लूटने वाले जाटों को लुटेरा कैसे लिख दिया?

जाटों ने मोहम्मद गजनी (सन् 1025) से लेकर बहुझौलरी के अदना नवाब (सन् 1865) तक व उनके सहायक, शुभचिन्तक व पिट्ठुओं तक को जी भरकर लूटा।

एक बार नहीं, बार-बार लूटा और पीटा। एक दिन नहीं, लगभग 800 सालों तक लूटा-पीटा।

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम या सन् 1857 का गदर कहें, जाटों ने अंग्रेजों के विरुद्ध उत्तर भारत में भयंकर लड़ाई लड़ी और अंग्रेजों को लगभग 9 महीने तक चैन से नहीं बैठने दिया।

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ये अपने आप में एक बहुत विशाल इतिहास है जिसका संक्षेप में वर्णन इस वेबसाइट में आगे भी किया गया है।

जब संग्राम विफल हो गया तो अंग्रेजों ने केवल वर्तमान हरयाणा क्षेत्र में ही 134 गाँवों को जला दिया तथा 51 गाँवों को नीलाम कर दिया था। हजारों लोगों को सामूहिक फांसियों पर लटकाया गया।

महम में चौ० आशाराम के नेतृत्व में जो क्रान्ति की लड़ाई लड़ी गई, विफल होने पर चौ० आशाराम व उनके साथियों को चौराहे पर फाँसी दे दी गई।

इसी स्थान को आज आजाद चौक के नाम से जाना जाता है। सोनीपत जिले के गांव लिबासपुर के जाट उदमीराम की अगुवाई में इसी गांव के जाट वीर गुलाब, जसराम, रतिया आदि अनेक जाटों ने अंग्रेजों की ईंट से ईंट बजाई।

मुरथल के वीर योद्धा सुरताराम व उनके बेटे जवाहर, बाजा नम्बरदार, पृथ्वीराम, मुखराम, राधे तथा जैमल आदि ने अंग्रेजों पर कहर बरपाया।

इसी प्रकार खामपुर, अलीपुर, हमीदपुर व सराय आदि सैकड़ों गांवों का यही इतिहास है।

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अलीपुर के हंसराम व तोताराम की बहादुरी को भी भुलाया नहीं जा सकता। लेकिन जाटों के इस स्वर्णिम और गौरवशाली इतिहास को पं० नेहरू व इसकी चाटुकार सरकार की नीतियों ने दफन कर दिया।

देश आजाद होने पर भी अंग्रेजों को खुश रखने के लिए उन ऐेतिहासिक घटनाओं पर पानी फेर दिया। जबकि सैकड़ों गांवों के इन जाट वीरों को बेघर कर दिये जाने पर भी इतिहास में उनकी कभी कोई बात नहीं की गई।

इसी प्रकार हांसी में एक सड़क का नाम ही खूनी सड़क या लाल सड़क पड़ा। यही कहानियाँ करनाल, जीन्द, हिसार, रोहतक व झज्जर आदि की हैं।

उत्तर प्रदेश के जाटों का 1857 के विद्रोह में महान् योगदान था जिसका सम्पूर्ण इतिहास अलग से लिखा जा सकता है।

इन्हीं कारणों से मुगलों व अंग्रेजों ने अपने ‘तारीखों’ तथा ‘गजटों’ में बार-बार जाटों को डाकू व लुटेरा लिखा है।

जाटों के सांगवान गोत्र के प्रवर्तक चौ० संग्रामसिंह उर्फ सांगू को नवाब हिसार व झज्जर के तारीखों में एक खूंखार डाकू लिखा है

क्योंकि उन्होंने मुगलों के खजाने दादरी क्षेत्र (हरयाणा) से पश्चिम में आने-जाने पर लूट लिये थे।

(सांगवानों का मूल गोत्र कश्यप है) jat patrika

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प्राचीन हरयाणा का अर्थ मुगलों व अंग्रेजों ने ‘हर-लेना’ निकाला अर्थात् लुटेरों का प्रदेश कहा। जबकि अर्थ है ‘हर+आना’ अर्थात् वह क्षत्रे जहाँ सबसे पहले हर (शिव) का आगमन हुआ।

प्राचीन हरयाणा में इसका प्रवेशद्वार हरद्वार था, इसकी पूरी परिभाषा ही बदल डाली तथा सन् 1857 के बाद इस प्रदेश को छिन्न-भिन्न कर दिया गया।

अंग्रेजों ने बंदरबाट में प्राचीन हरयाणा क्षेत्र के बावल क्षेत्र को नाभा रियासत, नारनौल क्षेत्र को पटियाला रियासत तथा दादरी क्षेत्र को जीन्द रियासत को इनामस्वरूप दे दिया गया।

जमना पार का क्षेत्र (दोआबा क्षेत्र को) यूनाईटिड प्रोविन्स राज में मिला दिया गया तथा दिल्ली, गुडगांव, रोहतक, हिसार व अम्बाला क्षेत्र को अंग्रेजों ने सीधे तौर पर अपने अधीन रख लिया।

जिसका एक भाग 108 वर्ष बाद प्रथम नवम्बर 1966 को पुनः जीवित किया। आज की दिल्ली इसी प्राचीन हरयाणा का एक जिला था।

इसी जिले को जार्ज पंचम के सन् 1911 में भारत आगमन पर अंग्रेजों ने कलकत्ता की जगह दिल्ली को अपनी राजधानी बनाया और उसी साल उन्होंने सर्वे करवाया।

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Randhir Deswal

Hi, I am Randhir Singh a Solo Travel Blogger form Rohtak Haryana. I am a writer of Lyrics and Quotes.

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