सर छोटूराम का जाट गजट अख़बार

चौधरी छोटूराम का जाट गजट

 

झूठी कविताए लिखने से कोई साहित्य प्रधान नही होता
जाने क्यूँ इन कलमकारों की भाषा मे किसान नही होता ।

चौधरी छोटूराम ग्रामीण जनता तक हर प्रकार की सूचना देने के लिए एक अखबार की जरूरत भी थी।

दिल्ली में, कालेज पढ़ते समय बालक छोटूराम जो स्वयं अच्छे लेखक भी थे।

वैसे वह ‘पाक्षिक इम्परियल’ पत्र के लिए आर्थिक सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर लेख लिखा करते थे लेकिन तब संस्कृत के प्रोफेसर रघुवरदयाल ने उन्हें इन विषयों पर लिखने से मना कर दिया था।

“दी इम्प्रूवमेंट ऑफ इंडिया” यानी भारतीय ग्रामीण जीवन की तरक्की लेख उनके रचनात्मक लेखन की गवाही देता है।

देश के अन्य लोगों से , गांव के लोगो को अलग पड़ जाने की खास बात भी चौधरी छोटूराम ने देखी थी।

इस अलगाव का कारण चाहे कुछ भी हो यह उनके गले नही उतरता था ।

चौधरी छोटूराम के अनुसार देश के प्रगतिशील जागरूक समाज के लिए एक पिछड़ा हुआ गांव जिस प्रकार अस्तित्वहीन होता है उसी प्रकार अंधकार में पड़े गांव के लिए भी जागरूकता और तरक्की का कोई अस्तित्व नहीं होता।

इसका परिणाम यह होता था कि दोनों एक दूसरे से अपरिचित रहते थे । चौधरी छोटूराम का ”जाट गजट” इन दोनों को ही जोड़ने का साधन था ।

चौधरी छोटूराम ने सोचा,

यदि जाटों की दशा को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप में सुधारना है तो एक अखबार प्रकाशित करना जरूरी है। ठीक उसी समय, मातनहेल के चौधरी कन्हैया लाल सिहाग उनके साथ आ गए ।

चौधरी छोटूराम जैसे व्यक्ति के लिए अपने खुद के साधनों से अखबार निकालना बहुत मुश्किल था क्योंकि वह सालभर में मुश्किल से एक हजार की मामूली राशि कमाते थे जिसमें से उन्हें साहूकार को नियमित ब्याज भी अदा करना पड़ता था।

ऐसे मे यह बची हुई रकम उनके परिवार के भरण पोषण के लिए भी काफी न थी ।

चौधरी कन्हैया लाल सिहाग ने इन कठिन परिस्थितियों में चौधरी साहब को पन्द्रह सौ रुपये चन्दा देकर जाट गजट अखबार निकालने का काम शुरू करा दिया।

उसके बाद चौधरी साहब और उनके अखबार ने पीछे मुड़ के नही देखा बल्कि दोनो ही रोज नई ऊंचाइयों को छूते चले गए ।

 

jat gajat

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Randhir Deswal

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